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संकट में सांता क्लॉज की सवारी रेंडियर

रेंडियरों का अस्तित्व जलवायु परिवर्तन, उसके बढ़ते शिकार और तमाम तरह की बीमारियों के कारण खतरे में है। 1995 से अब तक 26 लाख रेंडियर खत्म हो चुके हैं 

By Anil Ashwani Sharma

On: Monday 24 December 2018
 

Credit: Max Pixelआज रात बारह बजने का इंतजार बच्चों के बीच बेसब्री से होगा। बारह बजते ही क्रिसमस का त्योहार शुरू होगा। बच्चे मानते हैं कि सांता क्लॉज उनके लिए उपहार का लेकर आएगा। इस किवदंती से बच्चे खूब परिचित हैं कि रेंडियरों (बारहसिंगा) से खिंचने वाली अपनी स्लेज गाड़ी में सांता उपहार भरकर दुनिया भर के बच्चों के बीच बांटते हैं। आभासी दुनिया में सांता के मनोरम किस्से भरे पड़े हैं। 

आंकड़े बता रहे हैं कि सांता की स्लेज खींचने वाले रेंडियर की संख्या दुनियाभर में कम हो रही है। बर्फीले रास्तों के बीच स्लेज खींचने वाले रेंडियर के अस्तित्व पर जलवायु परिवर्तन का एक बड़ा खतरा मंडराता दिखने लगा है। इस खतरे के प्रति आगाह किया है अमेरिकी संगठन “नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेयरिक एडमिनिस्ट्रेशन” ने। इस संगठन की रिपोर्ट में बताया गया है कि बर्फीले रास्ते में सांता के साथी के रूप में पहचाने जाने वाले रेंडियरों का अस्तित्व जलवायु परिवर्तन, उसके बढ़ते शिकार और तमाम तरह की बीमारियों के कारण खतरे में है। 1995 से अब तक 26 लाख रेंडियर खत्म हो चुके हैं। सिर्फ रूस में ही 2013 में 61 हजार रेंडियरों की मौत भूख से हो गई। स्वीडन का हाल यह है कि वहां कम बर्फ होने के कारण रेंडियर पलायन कर रहे हैं।

ध्यान रहे कि रेंडियर अपनी शानदार घुमावदार सिंग के कारण जाने जाते हैं। इसे हिरण प्रजाति में शारीरिक रूप से सबसे बड़ा जानवर माना जाता है। यही नहीं, भोजन की तलाश में ये रेंडियर प्रतिवर्ष औसतन एक लाख मील की दूरी तय करते हैं। 1990 के दशक के बाद से अब तक इनमें 56 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। 1995 में इनकी जनसंख्या 47 लाख थी और 2018 में केवल 21 लाख बची है। रिपोर्ट के अनुसार कनाडा के अलास्का क्षेत्र में तो रेंडियर की जनसंख्या में 90 प्रतिशत कमी दर्ज की गई है। 

रिपोर्ट के प्रमुख लेखक पारिस्थितिकी विज्ञानी डॉन रसेल का कहना है कि रेंडियर के झुंडों में लगातार कमी हो रही है। पिछले दो दशक में जलवायु परिवर्तन के कारण बफीर्ले इलाके गर्म हो रहे हैं और इस कारण इनका ऐसे वातावरण में अपने को बचा पाना मुश्किल होता जा रहा है। लेकिन ऐसा लगता है कि आर्कटिक का ग्रीष्मकाल रेंडियरों पर भारी पड़ रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है तापमान बढ़ रहा है, नतीजतन वहां ज्यादा बारिश होती है और बर्फ जम जाती है। ऐसे में रेंडियर अपना आहार नहीं खोज पाते, वे भूखे रह जाते हैं। वे अपने छोटे बच्चों को पीछे छोड़ देते हैं या बहुत ही दुबले बच्चे जन्म देते हैं। कई इलाकों में इनका वजन 12 फीसद तक घटा है। पर्यावरण असंतुलन इनकी घटती संख्या की अहम वजह है। इनके आवासीय इलाके गर्म हो रहे हैं जिससे ये कमजोर और बीमार हो रहे हैं। इसके अलावा बदलते मौसम में पनप रही मक्खियां और परजीवी भी इन्हें बीमार कर रहे हैं। 

रेंडियर को लेकर दुनियाभर में लोगों के बीच भ्रांति है कि अन्य जानवरों के मांस की तुलना में इनका मांस कम चर्बीयुक्त और अधिक स्वास्थ्यवर्धक होता है। लिहाजा इनकी विलुप्ति के अहम कारणों में शिकार भी शामिल है। आर्कटिक जैसे ठंडे इलाकों के अलावा ये अलास्का, कनाडा, स्कैंडिनेविया और उत्तरी रूस में भी रहते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में इन्हें अलग-अलग नाम से पहचाना जाता है। उत्तरी अमेरिका में पाए जाने वाले रेंडियर को कारिबू कहा जाता है और यूरोप और साइबेरिया में रहने वालों को रेंडियर कहा जाता है। अधिकतर ये जंगली जीव होते हैं, लेकिन उन्हें स्लेज और कैरिज खींचने के लिए पालतू बनाया जाता है।

हिरण की अन्य प्रजातियों से इतर इनकी मादाओं के भी लंबे और घुमावदार सींग होते हैं। इनके खुर घुमावदार होते हैं जो दौड़ते समय इनके वजन को संतुलित रखते हैं। ये अपनी नाक के जरिए शरीर का तापमान नियंत्रित रखते हैं। इनकी आंखों में एक खास क्षमता होती है जिसकी मदद से ये चारों तरफ बर्फ की सफेदी में भी गहराई तक चीजें देख सकते हैं। रेंडियर के शरीर में एक खास रक्त परिसंचरण तंत्र होता है जो कम ऊर्जा खर्च में भी इनके शरीर को गर्म रखता है। ये क्षमता बेहद ठंडे इलाकों में उन्हें जीवित रखने में मददगार होती है। मनुष्यों के मुकाबले इनकी नाक में 25 फीसद ज्यादा रक्त वाहिकाएं होती हैं जो बर्फीली हवाओं को गर्म करने में सक्षम होती हैं। सांस लेने पर इनके शरीर के अंदर प्रवेश करने वाली हवा को वे गर्म कर देती है इसीलिए इनकी नाक गुलाबी रंग की नजर आती है।