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कौन हैं कल्याण सिंह रावत, जिन्हें दिया जाएगा पदमश्री

उत्तराखंड के कल्याण सिंह रावत को इस बार पदमश्री सम्मान देने का निर्णय लिया है। आइए, उनके बारे में जानते हैं

By Varsha Singh

On: Sunday 26 January 2020
 
कल्याण सिंह रावत, जिन्हें पदमश्री पुरस्कार के लिए चुना गया है। फोटो: वर्षा सिंह
कल्याण सिंह रावत, जिन्हें पदमश्री पुरस्कार के लिए चुना गया है। फोटो: वर्षा सिंह कल्याण सिंह रावत, जिन्हें पदमश्री पुरस्कार के लिए चुना गया है। फोटो: वर्षा सिंह

शादी के बाद विदा होने से पहले बेटी मायके में एक पौधा लगाएगी, जो परिवार में बेटी के जाने से रिक्त हुई जगह को भरेगा। मां उस पेड़ को जरूर सींचेगी, जो उसकी बेटी की यादों से जुड़ा है। पेड़ को बेटी से जोड़ कर उसकी रक्षा का वचन दिलाता मैती आंदोलन आज देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी अपनी पहचान बना चुका है। पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मैती आंदोलन को शुरू करने वाले कल्याण सिंह रावत को इस वर्ष पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। डाउन टु अर्थ ने इस अवसर पर उनसे बात की।

जीव विज्ञान के प्रवक्ता रह चुके कल्याण सिंह बताते हैं कि वर्ष 1995 में चमोली के ग्वालदम क्षेत्र से इस आंदोलन की शुरुआत हुई। वह कहते हैं कि जब तक हम भावनात्मक रूप से पेड़ों से नहीं जुड़ेंगे, वे जिंदा नहीं रह पाएंगे। पौधरोपण के अभियानों में हम अखबारों में आंकड़ा दिखाते हैं कि इतने पेड़ लगाए लेकिन उन्हें बचाना भूल जाते हैं। मैती आंदोलन का विचार ये है कि जब लड़का-लड़की की शादी होती है तो वे लड़की के घर में पेड़ लगाते हैं। इस भावनात्मक आंदोलन में मां-बेटी के प्यार को पेड़ से जोड़ा है। जो बेटी हमेशा मां के साथ रही, उसके साथ जंगल गई, खेत-खलिहान गई, जब वो विदा हुई तो सबसे ज्यादा दुख मां को होता है। बेटी के विदा हो जाने के बाद मां अपनी बेटी की याद को सूखने नहीं देगी। भाई-पिता भी उसकी देखभाल करेंगे। कल्याण सिंह कहते हैं कि हमने देखा कि वास्तव में ये पेड़ कहीं नहीं सूखे। पेड़ लगेंगे तो गांव में पानी नहीं सूखेगा, चारा-पत्ती का इंतज़ाम होगा, फल मिलेंगे, छाया मिलेगी, गांव में समृद्धि पैदा होगी, ये बेटी के नाम पर पेड़ लगाने से हुआ।

मैत का मतलब होता है लड़की का मायका। इस आंदोलन के तहत करीब पांच लाख पेड़ लगाए जा चुके हैं। कल्याण सिंह बताते हैं कि चमोली के नंदासैंण क्षेत्र में 10 हेक्टेअर का बांज का जंगल बना चुके हैं। चिपको आंदोलन से प्रभावित होकर मैती संगठन ने गौरा देवी के नाम पर भी एक जंगल बसाया है।

समय के साथ ये आंदोलन विस्तार ले चुका है। 18-19 राज्यों में चल रहा है। गुजरात, राजस्थान, हिमाचल ने अपने यहां ये नियम के तौर पर लागू कर दिया है कि शादी पर एक पेड़ जरूर लगाना है। उत्तराखंड के गांवों में लड़कियों के मैती संगठन भी बने हैं। कल्याण सिंह बताते हैं कि कनाडा की पूर्व विदेश मंत्री ने एक बातचीत के दौरान इस आंदोलन को न सिर्फ सराहा, बल्कि इसे अपने देश में शुरू करने का भरोसा दिलाया। इंडोनेशिया में कुछ जगहों पर ये कायदा बनाया कि शादी करने से पहले पेड़ लगाने का प्रमाण पत्र देना होगा। नेपाल में ये अभियान मैती नेपाल के नाम से चल रहा है। इस तरह कई देशों में ये आंदोलन बढ़ चुका है।

मैती अभियान के तहत पौधा लगाते दूल्हा-दुल्हन। फोटो: वर्षा सिंह

वह बताते हैं कि एक बार इस मुहिम के तहत बांज के पेड़ लगाने को लेकर मुश्किल आई, जब लोगों ने कहा कि बांज क्यों लगा रहे हो, इसका मतलब बच्चा न होने से जुड़ा है। लेकिन हमने दिखाया कि बेटी अपनी गोद में बच्चा लेकर मायके आयी। शुरू में इस तरह की छोटी-छोटी बाधाएं भी आईं लेकिन ये आंदोलन अपने मूल विचार के चलते बढ़ता रहा। कल्याण सिंह ख़ुशी जताते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पत्र लिखकर इस अभियान की सराहना की।