Sign up for our weekly newsletter

क्यों कम हो रही हैं उत्तराखंड के जंगलों में आग लगने की घटनाएं?

पिछले वर्ष 3 मई तक 99 हेक्टेअर जंगल आग की भेंट चढ़ चुके थे, लेकिन इस साल 11 हेक्टेअर में ही आग लगी है

By Varsha Singh

On: Thursday 07 May 2020
 
उत्तराखंड, टिहरी के जंगल से सूखी पत्तियां उठाते लोग। फोटो: वर्षा सिंह
उत्तराखंड, टिहरी के जंगल से सूखी पत्तियां उठाते लोग। फोटो: वर्षा सिंह उत्तराखंड, टिहरी के जंगल से सूखी पत्तियां उठाते लोग। फोटो: वर्षा सिंह

मौसम और लॉकडाउन ने इस बार राज्य के जंगलों को राहत पहुंचाई है। पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष उत्तराखंड में अब तक जंगल में आग की घटनाएं कम हुई हैं। मार्च और अप्रैल की बारिश के साथ लॉकडाउन के चलते मानवीय गतिविधियों में आई कमी को इसका श्रेय दिया जा सकता है। उत्तराखंड वन विभाग का दावा है कि जंगल को महफूज रखने के लिए नई तकनीक, चेकडैम के साथ जागरुकता अभियान की वजह से घटनाएं कम हुई हैं। 

इस वर्ष 3 मई तक राज्य में फायर सीजन में आग लगने की 12 घटनाओं में 11.03 हेक्टेअर जंगल आग की चपेट में आ चुका है। जबकि पिछले वर्ष 3 मई तक 99.29 हेक्टेअर जंगल आग की भेंट चढ़ चुके थे और उसके अगले हफ्ते में 191.9 हेक्टेअर। इस वर्ष अप्रैल के पहले हफ्ते में बागेश्वर में जंगल की आग की चपेट में आकर दो महिलाओं की मौत भी हुई है। आग लगने की 6 घटनाएं रिजर्व फॉरेस्ट में हुई हैं और बाकी 6 मामले सिविल सोयम-वन पंचायतों के जंगल में हैं। वन विभाग लगातार इस बात पर जोर देता है कि जंगल में आग लगने की घटनाएं सड़कों के आसपास और ग्रामीण इलाकों के नजदीक ज्यादा होती हैं। ऐसा कहा जाता है कि लोग चारे के इंतजाम के लिए जानबूझ कर आग भड़काते हैं, जो बाद में बेकाबू हो जाती है।

बारिशों का दौर थमने के साथ ही वन विभाग की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं। तकनीक के साथ विभाग फायर फाइटिंग की तैयारी कर रहा है। नासा के सैटेलाइट फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया को 11 बजे और 4 बजे आग लगने की घटनाओं की सूचना जारी करते हैं। जिसके बाद एफएसआई देशभर के वन विभाग को अलर्ट जारी करता है। रुद्रप्रयाग में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर एक ऐप तैयार किया गया है, जिसके जरिये स्थानीय लोग भी आग लगने की सूचना दर्ज करा सकते हैं।

रुद्रप्रयाग के डीएफओ वैभव सिंह बताते हैं कि लोग आग लगने की जानकारी विभाग को दे सकें और रिस्पॉन्ड टाइम कम किया जा सके, इस उद्देश्य से ये ऐप तैयार किया गया है। स्मार्ट फोन रखने वाला व्यक्ति जियो टैगिंग के ज़रिये हमें उस जगह की तस्वीर भेज सकता है, मास्टर कंट्रोल रूम सूचना की सत्यता की जांच करेगा और घटना को ऐप पर अपडेट करेगा। ऐप रियल टाइम में रुद्रप्रयाग में एक्टिव फायर की जानकारी देगा। इसके लिए जिले के सभी जंगलों, नर्सरी, पौधरौपण क्षेत्र की मैपिंग की गई है। साथ ही, तीन मोबाइल क्रू स्टेशन भी बनाए गए हैं। जो ऐसी सूचना पर तुरंत कार्रवाई करेंगे। 45 दिनों तक इस ऐप का ट्रायल किया जा रहा है। परफॉर्मेंस के आधार पर राज्य में इसे लागू किया जाएगा।

इसके साथ ही जंगल में मिट्टी की नमी और भूजल स्तर को बनाए रखने के लिए पाइन-नीडल चेकडैम बनाए जा रहे हैं। हल्द्वानी में पश्चिमी वृत्त के वन संरक्षक डॉ पराग मधुकर धकाते बताते हैं कि पिछले पांच वर्षों से मध्य हिमालयी क्षेत्र के जंगलों में इस तरह के चेकडैम पर ज़ोर दिया जा रहा है। इससे वन पंचायतों को रोजगार भी मिलता है।

मध्य हिमालयी क्षेत्र में ज्यादातर चीड़ के पेड़ हैं। इनसे गिरने वाला पीरूल ही आग के लिए ईधन का काम करता है। चीड़ की इन पत्तियों को इकट्ठा कर, जाल में बांधकर, पाइपनुमा आकार बनाया जाता है। जंगल की ढलानों पर पानी रोकने के लिए 5-10 मीटर की दूरी पर इसी पीरूल पाइप का घेरा बना दिया जाता है। पीरूल की घेरबाड़ से तालाब सा बन जाता है। जो मिट्टी को बहने से रोकता है और भूजल स्तर को बढ़ाता है।

मिट्टी में नमी होगी तो जंगल की आग ज्यादा नहीं फैलेगी। जंगल के आसपास रहने वाले लोग इस काम को करते हैं। उन्हें दो रुपये प्रति किलो पीरूल के हिसाब से भुगतान किया जाता है। डॉ धकाते कहते हैं कि फायर ट्राएंगल में तापमान और हवा को नियंत्रित करना हमारे बस में नहीं है। ज़मीन पर पड़े ज्वलनशील पदार्थ को उठा कर आग को मिलने वाला ईधन हम कम कर सकते हैं। इससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है। रुद्रप्रयाग में जंगल की आग के प्रति लोगों में जागरुकता लाने के लिए फिल्मी डायलॉग-पोस्टर भी जगह-जगह लगाए गए हैं।