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कैसे मान लें कि विलुप्त हो रही हैं प्रजातियां, वैज्ञानिक ढूंढ़ रहे फार्मूला

हमें जानना होगा कि पूर्व में कितने शेर रहे होंगे और कितनों का शिकार हुआ होगा, अब कितने बचे हैं

By Dayanidhi

On: Monday 20 January 2020
 
Photo credit: wikipedia
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अमेरिका की मिशिगन टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी के एक शोध में कहा गया है कि लुप्तप्राय प्रजाति का वर्गीकरण करना आसान नहीं होता है। शेर और तेंदुए लुप्तप्राय प्रजातियां हैं। जबकि रॉबिन्स और रैकून नहीं हैं। अंतर तब तक सरल लगता है जब तक कि कोई इस तरह का सवाल न करे कि शेर लुप्तप्राय क्यों है? इसका जवाब देने के लिए पहले हमें जानना होगा कि पूर्व में कितने शेर रहे होंगे और कितनों का शिकार हुआ होगा, अब कितने बचे है, क्या वे अब भी खतरे में हैं, जब तक हम इससे सहमत नहीं होते हैं, तब तक हम उन्हें लुप्तप्राय नहीं मानते हैं।

एक लुप्तप्राय प्रजाति क्या है? लुप्तप्राय प्रजातियां वे हैं जिनका विलुप्त होने का खतरा सबसे अधिक होता है। यह खतरा किसी भी जीव पर कम या अधिक हो सकता है। अधिकांश स्तनपायी प्रजातियां मानव गतिविधियों के कारण आधे या उससे अधिक विलुप्त हो गए है अथवा विलुप्त होने के कगार पर है। यह अध्ययन एनवायर्नमेंटल रिसर्च लेटर्स पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।

लुप्तप्राय प्रजाति : एक प्रजाति का किस हद तक नुकसान हो कि, हम यह मानने के लिए तैयार हों, कि प्रजाति की सुरक्षा के लिए ठोस प्रयास किए जाने चाहिए? लोगों के नजर में एक लुप्तप्राय प्रजाति क्या है, उन्हें कब सुरक्षा देनी चाहिए, इस बारे में अध्ययनकर्ताओं द्वारा लगभग 1,000 लोगों से प्रश्नावली के माध्यम से पूछा गया।

अमेरिका में किए गए सर्वेक्षण में शामिल तीन-चौथाई लोगों ने कहा कि अगर कोई प्रजाति अपने पुराने दिनों (ऐतिहासिक) की सीमा से 30% से अधिक विलुप्त होने के कगार पर हैं, तो वह प्रजाति विशेष सुरक्षा की हकदार है। सर्वेक्षण के परिणामों से पता चलता है कि नुकसान को स्वीकार करने वाले लोग पर्यावरण के बारे में कम जानते थे। ये लोग मानते है कि भूमि मालिकों को अपनी और अपने फसलो की सुरक्षा करने के लिए बंदूक रखने का अधिकार है। फिर भी, लोगों के समूह में से तीन-चौथाई लोग जो नुकसान के बारे में अधिक स्वीकार कर रहे थे, उनका मानना था कि यदि कोई प्रजाति अपनी पूर्व सीमा से 41% से अधिक कम हो गई है, तो उन्हें विशेष सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए।

सरकार के निर्णयकर्ताओं ने उन वैज्ञानिकों के साथ सहमति व्यक्त की है जो जीवों पर खतरे और उनको होने वाले नुकसान के रूप में गिनाते हैं। वैज्ञानिक अलग-अलग तरीके के खतरों के बारे में बताते हैं। वे कहते हैं कि कोई प्रजाति लुप्तप्राय है यदि उस प्रजाति के कुल और पूर्ण विलुप्त होने का खतरा 100 वर्षों में 5% से अधिक है।

इससे पहले कि मानव गतिविधियां प्रजातियों के विलुप्त होने के खतरों को बढ़ाती हैं, एक विशिष्ट कशेरुक प्रजातियों ने 10,000 साल की अवधि में 1% के विलुप्त होने के खतरे का अनुभव किया होगा। निर्णय लेने वालों और उनके सलाहकार विशेषज्ञों ने किसी प्रजाति के विलुप्त होने के खतरे को 100 वर्षों में 5% स्वीकार्य किया है। एक संभावना यह है कि विशेषज्ञ और निर्णय लेने वाले खतरों और नुकसान को अधिक स्वीकार कर रहे हैं क्योंकि उनका मानना है कि अधिक से अधिक संरक्षण करना महंगा और असंभव है। इसलिए भी आज जैव विविधता को बचाना कठिन हो गया है। जैव विविधता संकट को हल करने के लिए अधिक धन और प्रयास की आवश्यकता होती है।

यदि हम अच्छी तरह से नहीं जानते हैं कि एक लुप्तप्राय प्रजाति क्या है, तो हम यह भी नहीं जान सकते हैं कि प्रकृति के संरक्षण के लिए इसका क्या मतलब है। क्योंकि प्रकृति का संरक्षण बड़े पैमाने पर या तो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से है होता है। लुप्तप्राय प्रजातियों को विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है।