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कड़े कानून के खौफ की वजह से उजड़ने लगा है सोनपुर का पशु मेला!

बिहार का ऐतिहासिक सोनपुर पशु मेला अपनी पहचान खोता जा रहा है, अब न तो यहां गाय-भैंस लेकर बेचने आ रहा है और ना ही कोई खरीदने। सरकार की सख्ती इसकी वजह बन रही है 

By Pushya Mitra

On: Saturday 30 November 2019
सोनपुर पशु मेले में पशुओं की संख्या लगातार कम हो रही है। फोटो: पुष्यमित्र

रविवार, 10 नवंबर को बिहार के सोनपुर में एशिया के सबसे बड़े पशु मेले का उद्घाटन करते हुए राज्य के उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने कहा कि मेले में पशुओं की खरीद-बिक्री पर रोक नहीं है। लेकिन कुछ कानून हैं,  उनका उल्लंघन करने वाले जेल जायेंगे। पहले यहां से ट्रेन में भैंस, गाय भर-भर कर कटने के लिए आसाम भेजे जाते थे। गाय काटने के लिए खरीद-बिक्री की इजाजत नहीं दी जायेगी। पशुपालक खरीद-बिक्री करते हैं, तो कोई रोक नहीं है। वे दरअसल ऐसा इसलिए कह रहे थे, क्योंकि पिछले दस-बारह सालों में इस मेले में दुधारू गाय-भैंसों और बैलों की आवक लगभग शून्य पर पहुंच गयी है। कभी यह मेला राज्य के पशुपालकों के लिए दुधारू पशुओं की खरीद-बिक्री का सबसे महत्वपूर्ण ठिकाना होता था, अकेले राज्य का पशुपालन विभाग यहां से डेयरी पालकों के लिए 10-12 हजार गायें खरीदा करता था। अब यहां गायों की कुल संख्या भी 10-12 से अधिक नहीं होती। इसकी वजह से यह मेला भी धीरे-धीरे रौनक खोता जा रहा है।

सोनपुर में लगने वाला यह पशु मेला काफी पुराना है। इसकी शुरुआत कब हुई यह कोई ठीक-ठीक नहीं बता पाता। मगर कई जानकार कहते हैं कि चंद्रगुप्त मौर्य के शासन काल में भी राज्य के सैन्य गतिविधियों के लिए यहां से हाथी-घोड़े जैसे जानवर खरीदे जाते थे। गंगा और गंडक नदी के संगम पर लगने वाले इस मेले के बारे में कई मिथकीय और ऐतिहासिक कथाएं हैं। कुछ लोग इसे शैव और वैष्णव संप्रदायों का मिलन स्थल मानते हैं, तो कुछ लोग इसे गज और ग्राह के युद्ध से जोड़़ते हैं। राहुल सांकृत्यायन के हवाले से यह भी कहा जाता है कि हरिहरनाथ मंदिर में शुंगकालीन पत्थरों के अवशेष मिले हैं। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने इस मेले का जिक्र अपने यात्रा वृत्तांत में किया है। अकबर के सेनापति मानसिंह द्वारा यहां सेना के लिए हाथियों और घोड़ों के खरीदने का जिक्र तो है ही। यह जिक्र भी है कि पहले मेला किसी और जगह लगता था, मौजूदा जगह पर इस मेले को लगने की शुरुआत औरंगजेब ने की थी।

पहले इस मेले की पहचान युद्धोपयोगी पशुओं की खरीद-बिक्री के लिए थी, बाद में जब युद्ध में पशुओं का इस्तेमाल कम होने लगा तो यह गाय, बैल और भैंसों की खरीद बिक्री का बड़ा केंद्र बन कर उभरा। पूरे देश से पशुओं के कारोबारी यहां आते थे और एक माह से अधिक लंबे इस मेले में रह कर कारोबार किया करते थे। मगर 2005 में जब जदयू-भाजपा की सरकार बनी तो बिहार में पशुओं के आवागमन को लेकर कड़े कानून बना दिये गये। बाद में पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में भी इससे संबंधित कानूनों को कड़ाई से लागू किया जाने लगा। इसलिए हरियाणा और पंजाब से ऊंची नस्ल के दुधारू पशुओं की आवक एकाएक बंद हो गयी।

इन नियमों के मुताबिक वेटनरी डॉक्टर के फिटनेस प्रमाणपत्र के बिना पशुओं का आवागमन नहीं कराया जा सकता। साथ में वेटनरी फर्स्ट एड बॉक्स रखना जरूरी है। इस बात का प्रमाण पत्र होना चाहिए कि जानवरों को कहां से कहां तक किस उद्देश्य से ले जा रहे हैं। हर दुधारू पशु के लिए औसत जगह दो वर्ग मीटर से कम किसी हाल में न हो। रेल की बोगी में दस और ट्रकों में छह से अधिक पशुओं को एक साथ नहीं ले जा सकते। उन्हें पर्याप्त खिला-पिला कर यात्रा करायें और रास्ते के लिए भी पर्याप्त भोजन-पानी की व्यवस्था हो। एक जनवरी, 2016 से लागू होने वाले नये नियमों में गाड़ियों में हर पशु के लिए अलग केबिन बनाने और पशु ढोने वाले वाहनों को अलग परमिट लेने की शर्त जोड़ दी गयी है। एक आम पशुपालक के लिए इन नियमों का पालन करना आसान नहीं होता।

हालांकि इस मेले में पशुओं की आवक कम होने की वजह सिर्फ यही नहीं है। पिछले दिनों गोरक्षकों का आतंक जिस तरह देश में फैला है, ऐसे में कारोबारी गाय को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में हिचकते हैं। उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के बयान से भी जाहिर होता है कि इन कड़े कानूनों की वजह सिर्फ इतनी है कि उन्हें भय है कि इन पशुओं को बीफ कारोबारी खरीदकर न ले जायें।

मेला स्थित गाय बाजार में अब भी कुछ स्थानीय पशुपालक अपने चार-छह गायों के साथ खड़े रहते हैं। उनसे भी प्रशासन कड़ी पूछताछ करता है। वे कहते हैं, ‘अब कोई गाय खरीदने सोनपुर मेला थोड़े आता है। सबको मालूम पड़ गया है कि अब यहां गाय-बाछी नहीं आती है।’

काहे नहीं आती है, के सवाल पर उसने कहा, ‘कड़ा कानून बन गया है। बाहर से गाय-बैल-भैंस लेकर आना-जाना मुसीबत का काम हो गया है। पहले हरियाणा वाला सब आता था, तो यहां रौनक रहती थी। मगर चार-पांच साल से ऊ सब आना बंद कर दिया। हमलोग लोकल हैं, ऐसे ही आ जाते हैं। देखते नहीं हैं, पहले इसी मैदान में 50-55 हजार गाय रहती थी, अब 50-55 ठो पुरना (गिनना) मुश्किल है।‘

आंकड़े बताते हैं कि इस मेले में 2013 में 94 और 2012 में 107 गायें बिकी थी। बाद में यह बिक्री और घटती गयी। हालांकि इस मेले में घोड़े खूब बिकते हैं। उनका बाजार भरा-भरा दिखता है। इस साल प्रशासन ने कुछ हाथी पालकों को भी न्योता देकर बुलाया है, ताकि मेले में थोड़ी रौनक दिखे। मगर जिस दुधारू गायों के लिए इस मेले में कभी रौनक रहती थी, जब वे ही नहीं हैं, तो मेला ही बेरौनक दिखने लगा है।