यह है जमीन का वो टुकड़ा, जहां 178 साल से वैज्ञानिक कर रहे हैं खेती!

दुनिया के सबसे लंबे समय से जारी कृषि शोध का जैविक-अकार्बनिक खेती पर चल रही बहस में क्या योगदान है?

By Shagun Kapil

On: Tuesday 29 June 2021
 
दक्षिणी इंग्लैंड के हर्टफोर्ड शायर काउंटी में चल
रहे खेती के सबसे प्राचीन प्रयोग में जैवि क
खादों और रासायनि क उर्वरकों का उपज पर
पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन कि या जाता है
दक्षिणी इंग्लैंड के हर्टफोर्ड शायर काउंटी में चल
रहे खेती के सबसे प्राचीन प्रयोग में जैवि क
खादों और रासायनि क उर्वरकों का उपज पर
पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन कि या जाता है दक्षिणी इंग्लैंड के हर्टफोर्ड शायर काउंटी में चल रहे खेती के सबसे प्राचीन प्रयोग में जैवि क खादों और रासायनि क उर्वरकों का उपज पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन कि या जाता है

तस्वीर में दिखने वाला खेत अधिकतर लोगों के लिए मामूली लग सकता है। लेकिन यह कृषि वैज्ञानिकों के लिए धरती के सबसे मशहूर 4.5 हेक्टेयर भूमि का हिस्सा है। दक्षिणी इंग्लैंड के हर्टफोर्डशायर काउंटी का यह इलाका पिछले 178 वर्षों से लगातार वैज्ञानिक प्रयोगों में जुटा है। यह दुनिया का सबसे पुराना और सबसे लंबा चलने वाला अध्ययन है।

ब्रॉडबल्क प्रयोग कहे जाने वाले इस अनुसंधान की शुरुआत कृषि वैज्ञानिक जॉन बेनेट लॉज और रसायनशास्त्री जोसेफ हेनरी गिल्बर्ट ने 1843 में रॉथमस्टेड रिसर्च इंस्टीट्यूशन के तहत की थी। उस वक्त पहली बार गेहूं पर प्रयोग के लिए फसल बोई गई थी। तब से हर साल संस्थान के शोधकर्ता जैविक खाद या फार्मयार्ड खाद (फिम) या रासायनिक उर्वरकों वाली उपज की तुलना करने के लिए खेत के सभी या कुछ हिस्से पर गेहूं बोते हैं। यहां एक नियंत्रित तरीके से खेती की जाती है, जिसमें किसी तरह के उर्वरक या खाद को नहीं डाला जाता।

इन प्रयोगों का उद्देश्य विभिन्न जैविक खादों और रासायनिक उर्वरकों का उपज पर पड़ने वाले प्रभावों की पड़ताल करना और पौधों की पोषण संबंधी जरूरतों का अध्ययन करना है। यह अनुसंधान हर साल एक ही जमीन पर एक ही फसल उगाकर आकार लेता गया। हालांकि 19वीं सदी में इस तरीके से खेती को खराब माना जाता था। लॉज और गिल्बर्ट ने महसूस किया कि यह किसी फसल के लिए जरूरी पोषक-तत्वों के बारे में जानने का सबसे अच्छा तरीका है।

प्रयोग के चरण

ब्रॉडबल्क के तहत खेत को गेहूं की 19 पट्टियों में बांटा गया था। यह पट्टी लगभग 300 मीटर लंबी और 6 मीटर चौड़ी थी। विभिन्न प्रकार के मिश्रणों की जांच के लिए कुछ पट्टियों में खनिज उर्वरक, कुछ में जैविक खाद और कुछ में दोनों का मिश्रण डाला गया। एक पट्टी में कुछ भी नहीं डाला गया। इनमें वर्षों तक संशोधन किए गए। गेहूं की फसल को 1968 तक लगातार उगाया गया। जब खेत को अलग-अलग टुकड़ों में बांटा गया, तो उनमें से कुछ में अदल-बदलकर दो साल के अंतराल पर गेहूं की पैदावार की गई। ऐसा दोनों बार की पैदावार की तुलना करने और “बीमारी को विराम” देने के लिए किया गया था। 1968 में छह खंडों पर इस तरह की पैदावार दो अलग-अलग तरीके से तीन-बार रोटेशन प्रक्रिया के तहत की गई। उनमें से एक खंड-6 में 1978 से लगातार गेहूं की उपज की जाने लगी। वहीं, बाकी के पांच खंडों में आलू, जई, चारा मक्का और फलियों की खेती होने लगी।

अनुसंधान के निष्कर्ष

अनुसंधान में पाया गया कि दो साल के अंतराल के बाद उगाई गई पैदावार लगातार गेहूं की पैदावार से दो टन प्रति हेक्टेयर अधिक थी। ऐसा इसलिए था, क्योंकि मिट्टी वाले कीट और रोगों को कम किया गया था। 1860 के दशक में जैविक खाद से उपचारित गेहूं की औसत उपज लगभग 2.35 टन प्रति हेक्टेयर (टी-एचए-1) थी। रासायनिक उर्वरकों (पीकेएमजीएन) के साथ उपचारित गेहूं की उपज औसतन 2.85 टन प्रति हेक्टेयर थी। 1890 और 1940 के दरम्यान दोनों के मिश्रण से लगभग समान पैदावार हुई। 1950 और 2019 के बीच औसत उपज उर्वरक 4.9 टन प्रति हेक्टेयर के आसपास थी, जबकि जैविक खाद का औसत लगभग 4.8 टन प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष था।

शोध से यह भी पता चला है कि जैविक खाद के उपयोग से कुछ भूखंडों पर मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ गई थी। रॉथमस्टेड लॉन्गटर्म एक्सपेरिमेंट के मैनेजर एंडी मैक्डॉनल्ड का कहना है, “इसका उपज, संरचना और पानी को धारण करने की क्षमता सहित मिट्टी के कई गुणों पर भी लाभकारी प्रभाव पड़ा। इससे मिट्टी बेहतर हो सकती है और इस पर काम करना आसान हो जाता है। साथ ही इस पर जुताई के लिए ऊर्जा की जरूरत भी कम हो सकती है। इससे पौधों के जमने और उनके विकास के लिए मिट्टी की गुणवत्ता भी बेहतर हो सकती है (देखें, फसल के अवशेषों को खेत में मिलाने से मिट्टी के स्वास्थ्य को फायदा पहुंचता है, पेज 46)। हालांकि, ब्रॉडबल्क और अन्य अध्ययनों से पता चलता है कि इस तरह के फायदों के लिए मिट्टी में बहुत ज्यादा कार्बनिक पदार्थों की बढ़ोतरी की जरूरत नहीं है। इसलिए, समशीतोष्ण उत्तर-पश्चिमी यूरोपीय जलवायु में नियमित रूप से खाद के मामूली इस्तेमाल और “एक बार फसल में अदला-बदली से” कम कार्बनिक पदार्थ वाली मिट्टी की सेहत में पर्याप्त सुधार हो सकता है। हालांकि, मैक्डॉनल्ड कहते हैं कि यह खाद के इस्तेमाल की दर पर भी निर्भर करता है।

साल 2016 और 2018 के बीच हर साल और अदल-बदलकर कर होने वाली खेती की तुलना से पता चलता है कि नाइट्रोजन की मात्रा जितनी अधिक होगी, उपज उतनी ही अधिक होगी। यह तुलना केवल जैविक खाद वाले खेतों की थी, जिनमें विभिन्न मात्रा में एन उर्वरक (न्यूनतम मात्रा में एन1 और अधिकतम मात्रा में एन6 के साथ एन1 से एन6 तक) और समान मात्रा में पी, के और एमजी उर्वरक इस्तेमाल किए गए थे। एन6 उर्वरक से लगातार और अंतराल दोनों तरीकों से गेहूं की सबसे अधिक औसत पैदावार हुई। हालांकि, जैविक खाद और एन6 से उपचारित खेत के बीच उपज का अंतर ज्यादा नहीं था। अदला-बदली वाले खेत में औसत उपज 6.9 टन प्रति हेक्टेयर थी, जबकि एन6 वाले खेत में यह 10.7 टन प्रति हेक्टेयर थी। वैज्ञानिकों का यह भी सुझाव है कि यह अंतर बहुत अधिक नहीं है और ऐसे में उच्च स्तर वाले एन उर्वरक का उपयोग करने वाले किसानों को बहुत कम लाभ होगा।

इसके अलावा अधिकांश नाइट्रोजन नाइट्रेट में बदल जाता है। अवशेष मिट्टी में बरकरार नहीं रह पाता और नाइट्रस ऑक्साइड में बदल जाता है, जो मिट्टी में पानी के रिसाव के दौरान लीक होने वाली ग्रीनहाउस गैस है। वर्ष 1843 के बाद से गेहूं की पैदावार में करीब एक टन प्रति हेक्टेयर से अब तक महज कुछ ही सुधार हुआ है। 1847 में अपने पहले रॉथमस्टेड पेपर में लॉज के हवाले से कहा गया है कि जहां उन्होंने चाक के लिए दोमट के तौर पर ब्रॉडबल्क मिट्टी का इस्तेमाल किया, वहां गेहूं का अच्छा उत्पादन संभव है, बशर्ते इसकी ठीक से देखरेख की जाए। 2012 में शुरू हुए अपने 20:20 कार्यक्रम के तहत रॉथमस्टेड शोध संस्थान का मौजूदा लक्ष्य 20 वर्षों में 20 टन उपज हासिल करना है। मौजूदा प्रयोग की एक अहम खोज मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों के बारे में है। प्रयोगों के शुरू होने के एक सदी बाद पाया गया कि जैविक खाद वाले भूखंडों की ऊपरी परत (0-23सेमी) में जैविक कार्बन (सीटी एचए -1) की मात्रा उर्वरक उपचारित भूखंडों की तुलना में दोगुने से अधिक थी।

इसी तरह, 1843 के बाद से अधिकतर वर्षों में जहां सर्दियों में गेहूं की पैदावार की गई थी, वहां मिट्टी की ऊपरी परत में नाइट्रोजन सांद्रता के कुल प्रतिशत में दीर्घकालिक बदलाव का परीक्षण भी किया गया। 1840 और 2010 के बीच, जैविक खाद से उपचारित भूखंडों में नाइट्रोजन सांद्रता सबसे अधिक थी, वहीं जैविक और एन दोनों तरह से उर्वरक उपचारित भूखंड का नंबर इसके बाद था। जबकि, बिना उर्वरक वाले खेत में और प्रयोग शुरू होने के बाद पी के उर्वरकों से उपचारित भूखंड में नाइट्रोजन की सांद्रता स्थिर बनी रही।

दूसरा पहलू मीथेन (सीएच4) को ग्रहण करने की मिट्टी की क्षमता का था। ब्रॉडबल्क पर मीथेन ऑक्सीकरण के लिए जिम्मेदार जीवाणु की आबादी का कोई प्रत्यक्ष अनुमान नहीं था, लेकिन शुरुआती निष्कर्षों से पता चला है कि मिट्टी में मीथेन का कम ऑक्सीकरण उस वक्त होता है, जब मिट्टी में जैविक खाद की जगह एन उर्वरक का इस्तेमाल किया जाता है और कोई खाद या खनिज नहीं दिया जाता। साथ ही, 1979-84 में एन उर्वरक के अधिक इस्तेमाल से पता चला कि इससे अधिक पैदावार हो सकती है। 1985 के बाद से 240 और 288 किलोग्राम इस्तेमाल किए गए एन एचए-1 की पड़ताल की गई। साल 2000 में एक और अहम बदलाव चयनित भूखंडों से पी उर्वरक को रोकना था। ऐसा करने से पौधे के लिए उपलब्ध पी की मात्रा एक स्तर तक कम हो सकती है, जो अधिकतम उपज हासिल करने के लिए उपयुक्त है। इसका पैदावार पर कोई हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि मिट्टी में उपलब्ध पी फसलों की जरूरत से अधिक है।

शोध ने उपज की रक्षा के लिए अच्छे खरपतवार नियंत्रण के महत्व पर भी जोर दिया है। दस खंडों में से एक (खंड 8) में हर्बिसाइड्स नहीं दिया गया और इसकी तुलना उन दूसरे भूखंडों से की गई, जिन्हें बाकी सभी उन्हीं उर्वरकों के साथ ही हर्बिसाइड्स भी दिया गया। इसमें पहले की तुलना में कम उपज प्राप्त हुई। 1985 से 2014 तक के आकलन से पता चला कि खंड 8 में दूसरे खंडों की तुलना में पैदावार लगभग आधी थी। शुरू में इन प्रयोगों के दीर्घकालिक होने की कल्पना नहीं की गई थी, लेकिन बाद में लॉज और गिल्बर्ट ने सोचा कि आगे बदलते मौसमों में प्रयोगों को बढ़ाकर अधिक उपयोगी जानकारी हासिल की जा सकती है।

ये निष्कर्ष कृषि प्रणालियों को समझने के लिए दीर्घकालिक प्रयोगों के महत्व को उजागर करते हैं। मैक्सिको स्थित इंटरनैशनल मक्का एंड व्हीट इंप्रूवमेंट सेंटर के प्रमुख वैज्ञानिक एमएल जाट का कहना है कि इस तरह के प्रयोग निवेशकों को यह महसूस करने में मदद कर सकते हैं कि दीर्घकालिक शोध में निवेश क्यों महत्वपूर्ण है। जाट ने एक सम्मेलन के दौरान 2018 में साइट का दौरा किया। रॉथमस्टेड को व्यवस्थित कृषि अनुसंधान के जन्म स्थान के रूप में बुलाते हुए वह कहते हैं, “हम इस प्रकार के प्रयोगों से बहुत कुछ सीख सकते हैं, जहां 176 वर्षों से रासायनिक खादों के संतुलित इस्तेमाल के तौर तरीकों को तलाशा जा रहा है।”

जब दुनिया वाकई साक्ष्य आधारित कृषि विज्ञान के बारे में बात कर रही है, तो ऐसे प्रयोगों की सख्त जरूरत है। हमें किसी नतीजे पर पहुंचने और फैसला लेने की जगह इनसे सीखने की जरूरत है। चाहे यह राजनीतिक हो या फिर किसी अन्य तरह की शोधों पर आधारित हो। वह कहते हैं, “इस तरह के प्रयोग अतीत की जलवायु परिस्थितियों के आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए दीर्घकालिक तौर पर मिट्टी की सेहत को बेहतर बनाने में मदद करते हैं और इससे पता चलता है कि मिट्टी की सेहत को बढ़ाने के लिए क्या चीजें मददगार हो सकती हैं।” उनका कहना है, “आप हर साल प्रयोग नहीं कर सकते हैं और निर्णय नहीं ले सकते हैं। हालांकि, 175 साल बहुत ज्यादा हो सकते हैं, लेकिन अगर 10-20 साल के डेटा को इकट्ठा कर सकें और उस डेटाबेस को मौसम और जलवायु परिवर्तन से जोड़ सकें, तो आगे की योजना बना सकते हैं और उसके हिसाब से फैसले ले सकते हैं।”

भारत में अध्ययन

भारत भी विशेष रूप से उर्वरक और पोषक तत्व प्रबंधन से संबंधित दीर्घकालिक प्रयोग कर रहा है। मिट्टी की गुणवत्ताफसल उत्पादकता और स्थिरता में परिवर्तन का अध्ययन करने के लिए 1970 से 17 भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) केंद्रों पर दीर्घकालिक उर्वरक प्रयोग किए जा रहे हैं।

आईसीएआर के अनुसार, इन प्रयोगों से पता चलता है कि पोषक तत्वों की बाहरी आपूर्ति के बिना उत्पादकता को बनाए रखना संभव नहीं है। अनुसंधान से एकीकृत संयंत्र पोषक तत्वों की आपूर्ति और प्रबंधन रणनीतियों का विकास हुआ है। इससे मिट्टी की उर्वरता और उत्पादकता में वृद्धि हुई। साथ ही, फसल प्रणाली समृद्ध हुई। जैसे, चावल-गेहूं, चावल-चावल, मक्का-गेहूं, रागी-मक्का, सोयाबीन-गेहूं और मूंगफली-गेहूं की खेती भारत में साथ-साथ उगने वाली फसल समूह सामने आए।

इन नतीजों से पता चलता है कि उर्वरक एन के इस्तेमाल से मिट्टी की उत्पादकता पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है, लेकिन एनपीके का संतुलित उपयोग मिट्टी में जैविक कार्बन बनाए रखने में मददगार है। जाट कहते हैं, “इस तरह के प्रयोग राष्ट्र की संपत्ति हैं। डेटाबेस योजना से रणनीति बनाने में मदद मिल सकती है। इसकी मदद से नीति निर्माताओं को यह समझने में मदद कर सकता है कि क्षेत्र में क्या हो रहा है और वैज्ञानिक विकास के जरिए खेती की क्षमता के विकास के लिए क्या किया जाना चाहिए।”