जलवायु परिवर्तन: संकट को नकारने की गुंजाइश खत्म

अब समय आ चुका है जब हम अपने पूर्वाग्रहों से बाहर निकलें और कुछ न करने के बहाने ढूंढना बंद करें

By Sunita Narain

On: Thursday 26 August 2021
 
अगर हम तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पार करने से रोक पाए तो भी अधिकांश एशियाई और अफ्रीकी देशों में भारी बारिश और बाढ़ आएगी (फोटो: रॉयटर्स)
अगर हम तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पार करने से रोक पाए तो भी अधिकांश एशियाई और अफ्रीकी देशों में भारी बारिश और बाढ़ आएगी (फोटो: रॉयटर्स) अगर हम तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पार करने से रोक पाए तो भी अधिकांश एशियाई और अफ्रीकी देशों में भारी बारिश और बाढ़ आएगी (फोटो: रॉयटर्स)

अब किसी “शायद” की गुंजाइश नहीं बची है। जलवायु परिवर्तन का खतरा वास्तविक है और इसके खतरे आसन्न तो हैं ही, भविष्य भी भयावह है। इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की रिपोर्ट का यह संदेश हमारे आसपास हो रहे बदलावों की पुष्टि करता है। अत्यधिक गर्मी के कारण जंगल की आग से लेकर अत्यधिक बारिश की घटनाओं के कारण आती विनाशकारी बाढ़ और समुद्र एवं भूमि की सतह के बीच बदलते तापमान के कारण उष्णकटिबंधीय चक्रवातों तक के ये संकट अब भविष्य के न होकर हमारे वर्तमान में आ चुके हैं और हमें बहुत चिंतित होने की आवश्यकता है। यह रिपोर्ट उन वैज्ञानिकों के माध्यम से आई है जो सामान्य रूप से पारंपरिक और अनुसरणवादी रहे हैं और इसलिए हमें खतरे को समझकर वास्तविक एवं सार्थक कारवाई करनी होगी।

इस रिपोर्ट के कुछ पहलू काफी महत्वपूर्ण हैं। पहला, अब यह स्पष्ट है कि 2040 तक पृथ्वी के तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो सकती है। इसका मतलब यह हुआ कि अगले दो दशकों में हम खतरे के निशान को पार कर जाएंगे। 1880 के दशक (औद्योगिक क्रांति के समय) से केवल 1.09 डिग्री सेल्सियस की तापमान वृद्धि के फलस्वरूप बड़े पैमाने पर तबाही हो रही है और हमें इस विज्ञान की चेतावनी को सुनना ही पड़ेगा। दूसरा, आईपीसीसी के वैज्ञानिक अब हमें स्पष्ट रूप से यह बताने में संकोच नहीं कर रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन मानवीय गतिविधियों के कारण होता है। यही नहीं, उन्होंने कुछ चरम मौसमी घटनाओं को जलवायु परिवर्तन से जोड़ा है। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि अब तक हम दुनिया में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को इस तरह की घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति के संदर्भ में ही समझ पाए हैं। लेकिन अब, हम कनाडा में अत्यधिक गर्मी की घटना या ग्रीस में जंगल की आग या जर्मनी की बाढ़ में जलवायु परिवर्तन की भूमिका को अधिक निश्चितता के साथ जानते हैं। अब अगर-मगर की बात नहीं रही।

सवाल यह है कि क्या हम इस पर ध्यान दे रहे हैं? क्या आवश्यक पैमाने और गति पर कार्रवाई की जा रही है? ऐसा अभी भी नहीं हो रहा है। और यहीं पर आईपीसीसी रिपोर्ट की तीसरी बड़ी विशेषता को समझना चाहिए। विज्ञान हमें चेता रहा है कि आने वाले वर्षों में पृथ्वी के “सिंक” अथवा प्राकृतिक सफाई प्रणालियां जैसे महासागरों, जंगलों और मिट्टी की सापेक्ष दक्षता में कमी आएगी क्योंकि उत्सर्जन में वृद्धि जारी रहेगी। वर्तमान में महासागर, भूमि और वन मिलकर हमारे द्वारा वायुमंडल में छोड़े जाने वाले उत्सर्जन का लगभग 50 प्रतिशत अवशोषित करते हैं। दूसरे शब्दों में, इन सिंक के बिना, हम पहले ही 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि की सीमा को पार कर चुके होते। लेकिन यह रिपोर्ट हमें यह भी बताती है कि हम भविष्य में इसी दर से उत्सर्जन को साफ करने के लिए सिंक पर निर्भर नहीं रह सकते। इसका मतलब है कि देशों की “नेट जीरो” योजनाओं पर फिर से विचार करना होगा। नेट-जीरो योजना के तहत, अमेरिका (2050 तक) और चीन (2060 तक) जैसे देशों ने घोषणा की है कि उनका उत्सर्जन उस स्तर से नीचे रहेगा, जो उनकी स्थलीय सिंक या कार्बन कैप्चर तकनीक साफ करने में सक्षम होगी। अब अगर हम आईपीसीसी की मानें तो ये सिंक अपने चरम बिंदु पर पहुंच गए हैं। देशों को कार्बन डाईऑक्साइड को अलग करने और अधिक पेड़ लगाने के लिए और भी अधिक मेहनत करनी होगी।

इसलिए, वैश्विक वैज्ञानिकों की यह रिपोर्ट एक वेक-अप कॉल की तरह होनी चाहिए। अब हम काम न करने के नए बहाने ढूंढने में और समय नहीं व्यर्थ कर सकते और 2050 तक नेट जीरो उत्सर्जन के खोखले वादे भी इसमें शामिल हैं। आज समय आ गया है कि हम गंभीर हों और जमीनी स्तर पर सार्थक कार्रवाई शुरू करें। अच्छी खबर यह है कि वर्तमान जीवाश्म ईंधन से चलने वाली औद्योगिक प्रणाली को बाधित करने के लिए प्रौद्योगिकियां उपलब्ध हैं। हमें इन तकनीकों का इंतजार करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके बजाय हमें निर्णायक कदम उठाने होंगे। समस्या यह है कि आज भी धरातल पर कार्रवाई बहुत कम और बहुत देर से होती है। वास्तव में, ग्रीनहाउस गैस (जीएचजी) उत्सर्जन बढ़ेगा क्योंकि कोविड-19 महामारी की चपेट में आई अर्थव्यवस्थाएं वापस सामान्य होने के लिए दोगुनी मेहनत करेंगी। हर देश रिकवरी के लिए बेताब है। इसका मतलब है कि मौजूदा अर्थव्यवस्था के साथ कुछ भी किया जा सकता है। कोयला, गैस और तेल का उपयोग करके विकास को जितनी जल्दी हो सके तेज करने के लिए वह सब किया जाएगा।

विज्ञान भी इस मामले में बहुत स्पष्ट है। हमें 2030 तक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को 2010 के स्तर से 45-50 प्रतिशत कम करने और 2050 तक नेट-जीरो तक पहुंचने की आवश्यकता है। दूसरे शब्दों में, हमें परिवर्तनकारी कार्रवाई की आवश्यकता है। 2030 तक सारी कारों को इलेक्ट्रिक वाहनों में बदल देना या कोयले का इस्तेमाल रोककर प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल करना आदि ये सब छोटे-मोटे उपाय हैं। हमें सख्त और कठोर कार्रवाई की आवश्यकता है।

यह वह जगह है जहां वैज्ञानिक, वैज्ञानिक होने के नाते, सबसे असुविधाजनक सत्य को खुलकर नहीं कह सकते। इसमें कोई संदेह नहीं है कि जलवायु परिवर्तन के अधिकांश भाग के लिए मुट्ठी भर देश जिम्मेदार हैं। अमेरिका और चीन एक साथ मिलकर दुनिया के वार्षिक उत्सर्जन का लगभग आधा हिस्सा उत्पन्न करते हैं। यदि आप 1870 से 2019 तक उत्सर्जन को जोड़ दें तो अमेरिका, यूरोपीय संघ-27, रूस, ब्रिटेन, जापान और चीन वैश्विक कार्बन डाईऑक्साइड बजट में 60 प्रतिशत का योगदान करते हैं। अब आईपीसीसी ने हमें बताया है कि यह बजट अपने आप में और भी सीमित है। इस असमानता पर विचार करें लेकिन यह भी विचार करें कि कार्रवाई की आवश्यकता कहां है।

यदि आप पेरिस लक्ष्यों यानि इन देशों के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) को भी लें तो 2030 में वे बजट के अपने हिस्से को आवश्यकतानुसार कम करके दुनिया के अन्य देशों को मौका देने की बजाय इसे 68 प्रतिशत तक बढ़ा देंगे। इसका कारण यह है कि उनके लक्ष्य बहुत कम हैं और समस्या में योगदान के अनुपात में नहीं हैं और चीन आने वाले दशक में कार्बन डाईऑक्साइड (सीओटू) उत्सर्जन में अपने हिस्से को 10 गीगाटन (जीटी)/सीओ2 से बढ़ाकर 12 जीटी/सीओ2 कर देगा।

यहीं पर हमें भारत पर चर्चा करने की जरूरत है। हम प्रदूषकों की तालिका में ऊपर बैठना पसंद करेंगे और तकनीकी रूप से भारत दुनिया में सीओ2 का तीसरा सबसे बड़ा वार्षिक प्रदूषक है (चौथा यदि आप ईयू-27 को एक समूह के रूप में लेते हैं)। लेकिन हमारे योगदान का पैमाना इतना महत्वहीन है कि इसकी तुलना नहीं की जा सकती। 1870 और 2019 के बीच वैश्विक सीओ2 बजट में भारत की हिस्सेदारी लगभग 3 प्रतिशत थी। चीन का वार्षिक उत्सर्जन 10 जीटी/सीओ2 और अमेरिका का 5 जीटी/सीओ2 है। वहीं, भारत सालाना लगभग 2.6 10 जीटी/सीओ2 उत्सर्जित करता है। और यदि आप भारत के व्यवसाय को सामान्य परिदृश्य की तरह लेते हैं, तब भी हम 2030 में अमेरिका के आज या चीन के एक तिहाई से कम उत्सर्जन करेंगे। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत को कार्रवाई नहीं करनी चाहिए। वास्तव में, जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने के लिए कदम उठाना हमारे हित में है। सबसे पहले, हम पहले से ही अपने लोगों पर जलवायु परिवर्तन के सबसे बुरे प्रभावों को देख रहे हैं, जैसे अत्यधिक बारिश, बादल फटना और बाढ़ से लेकर तापमान वृद्धि तक। दूसरे, हम कार्य कर सकते हैं क्योंकि हमारे पास चीजों को करने के तरीके को फिर से बदलने का एक जबरदस्त अवसर है। चाहे हमारे शहरों का ट्रैफिक हो या हमारे घरों का डिजाइन या फिर गरीबों को मिलने वाली सस्ती ऊर्जा। हमारे लिए, जलवायु परिवर्तन पर कार्रवाई स्वार्थ और सह-लाभों से प्रेरित है। स्थानीय वायु प्रदूषण को कम करना और इस तरह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में भी कटौती करना।

मैं साफ तौर पर कहना चाहूंगी कि हम इस मामले में कुछ खास नहीं कर रहे हैं। भारत सरकार सीओ2 उत्सर्जन को कम करने के लिए तुलनात्मक कार्रवाई के मामले में अन्य देशों की तुलना में अधिक करने के बारे में आशावादी है। तथ्य यह है कि उत्सर्जन को कम करने के लिए हमारे पास कोई मापने योग्य लक्ष्य नहीं है और यही कारण है कि हम अच्छा कर रहे हैं। हमारा एनडीसी पूर्ण उत्सर्जन कम करना नहीं बल्कि हमारी अर्थव्यवस्था की उत्सर्जन तीव्रता को कम करना है। इसलिए, हम अपनी जलवायु परिवर्तन कार्रवाई पर गर्व नहीं कर सकते और न ही करना चाहिए। हम केवल यह कह सकते हैं कि हम अपनी जिम्मेदारी या वातावरण में सीओ2 उत्सर्जन में योगदान के संदर्भ में जितना आवश्यक हो उतना कम कर रहे हैं, जो अपने आप में काफी कम है। इन जलवायु-जोखिम वाले समय में, जब विज्ञान हमें चेतावनी पर चेतावनी दिए जा रहा है, ऐसे में इतना पर्याप्त नहीं है।

तथ्य यह है कि जलवायु परिवर्तन प्रभावी वैश्विक नेतृत्व की मांग करता है। और एक बात जो हम दुनिया में सभी को टीके पहुंचाने में अपने दयनीय ट्रैक-रिकॉर्ड से भी जानते हैं, वह यह है कि वैश्विक नेतृत्व मानव इतिहास में अपने सबसे निचले बिंदु पर है, कम से कम हमारे जीवनकाल में। जलवायु परिवर्तन एक और वैश्विक संकट है जिसके लिए वैश्विक प्रतिक्रिया की आवश्यकता है। हम इसे सभी के सहयोग के बिना नहीं जीत सकते हैं और इसके लिए सभी के लिए जलवायु न्याय की आवश्यकता है। लेकिन कोरोनावायरस की ही तरह जलवायु परिवर्तन भी अमीर-गरीब दोनों को प्रभावित कर रहा है। इसलिए हमें कदम उठाने की आवश्यकता है। विज्ञान ने अपनी बात कह दी है और अब काम करने का समय आ गया है।