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नासा ने कहा, बढ़ते तापमान के बावजूद तेजी से नहीं पिघलेगी अंटार्कटिका की बर्फ

इससे पहले वैज्ञानिकों ने कहा था कि अगले 500 वर्षों में अंटार्कटिका की बर्फ और ग्लेशियर तेजी से पिघलेगी। अब नासा ने जलवायु माडल में बदलाव कर दिया है।

By Vivek Mishra

On: Monday 29 April 2019
 
Photo Credit : Srikant Chaudhary
Photo Credit : Srikant Chaudhary Photo Credit : Srikant Chaudhary

अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा के जलवायु विशेषज्ञों ने चौंकाने वाला एक नया अध्ययन पेश किया है। नासा के मुताबिक अगले 300 वर्षों में अंटार्कटिका की बर्फ पिघलने की रफ्तार न सिर्फ मंद पड़ेगी बल्कि इसके कारण समुद्र के जलस्तर में वृद्धि भी बेहद धीमी गति से होने वाली है। नासा की कैलेफोर्निया स्थित जेट प्रोपल्शन लैबरोट्री (जेपीएल) के जलवायु विशेषज्ञों ने कहा है कि इससे पहले अगले 500 वर्षों के लिए जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का किया गया पूर्वानुमान ठीक नहीं है। हमारे हिसाब से अंटार्कटिका बर्फ के तेजी से पिघलने और समुद्र जलस्तर में वृद्धि का पूर्वानुमान जरूरत से ज्यादा आंका गया था।

जलवायु विशेषज्ञों ने अपने नए अध्ययन में कहा है कि समुद्र की सतह का स्तर वर्ष 2250 से अपने प्राकृतिक तरीके से बढ़ सकता है। इस नए अध्ययन से पहले वैज्ञानिकों ने वैश्विक स्तर पर समुद्र की सतह में हो रही बढ़ोत्तरी के लिए कहा था कि इसमें अटांर्कटिक में पिघलती बर्फ की हिस्सेदारी 20 से 25 फीसदी तक की है। समुद्रों में उपलब्ध पानी अत्यधिक गरम होने के कारण अंटार्कटिका की बर्फ और ग्लेशियर्स को पिघलाने का काम कर रही है।

नासा के इस नए चौंकाने वाले तथ्य से पहले वैज्ञानिकों ने कहा था कि अगले 500 वर्षों में अंटार्कटिका की बर्फ और ग्लेशियर तेजी से पिघलेगी। अब नासा ने अपने जलवायु संबंधी मॉडल में बदलाव करते हुए कहा है कि अगले 300 वर्ष में बर्फ पिघलने की रफ्तार मंथर गति से होगी। वहीं, इसके तहत अंटार्कटिका के कारण समुद्री सतह के स्तर में होने वाली बढ़ोत्तरी में 29 फीसदी की कटौती हो सकती है।

यह नया अध्ययन इसी हफ्ते एक जर्नल साइंस में छापा गया है। इसका शीर्षक अंटार्कटिका के ठोस सतह में होने वाली क्षति की मंद रफ्तार और समुद्र स्तर है। इस अध्ययन को करने वाले नासा के वैज्ञानिक और प्रमुख अध्ययनकर्ता इरिक लेरर ने कहा कि हमने नए अध्ययन में पाया है कि सन 2250 से अंटार्कटिका में बर्फ पिघलने की प्रकिया शुरु हो सकती है और इसके कारण समुद्र के जलस्तर में बढ़ोत्तरी भी संभव है। पहले किए गए पूर्वानुमान की तुलना में नए अध्ययन की सटीकता पर यदि विश्वास करें तो अगले 100 बरस में बर्फ एक फीसदी कम पिघलेगी।

वहीं, भविष्य में बर्फ पिघलने के कारण बर्फ के बीच में मौजूद ठोस या चट्टानी सतह खुद अपना फैलाव करेगी और इसकी पिघलन भी धीरे-धीरे होगी। वैज्ञानिक इरिक लेरर ने कहा कि दूसरे अध्ययनों के मुकाबले पृथ्वी की ठोस सतह की प्रक्रिया को भी इस अध्ययन में शामिल किया गया है। साथ ही इन सतहों को बहुत ही सूक्ष्म और फैलाव के साथ देखा गया है।

वहीं, इस अध्ययन रिपोर्ट के सह-लेखक इरिक इविंस ने कहा कि हमने इस अध्ययन के दौरान एक नई चीज जानी है कि यदि सतह की बर्फ पिघलने लगती है तो नीचे का चट्टान इलास्टिक की तरह ऊपर की ओर फैल जाता है। या कहें कि रिक्त हुए स्थान को भर देता है। यह बिल्कुल सोफे पर किसी व्यक्ति के बैठने और उठने के दौरान कुशन का दब कर वापस उठ कर अपनी जगह लेने जैसा है। बर्फ के भीतर की चट्टान कुछ ऐसा ही करती है। हमारा मानना है कि यह प्रक्रिया बर्फ की चादर को और ग्लेशियर को पिघलने की गति को मंद ही रखेगी।

हालांकि, यूएस के अंतरिक्ष केंद्र के वैज्ञानिकों का कहना है कि अंटार्कटिका के बर्फ पिघलने की मंद गति वाला नया अध्ययन जितना सुनने में बेहतर लग रहा है उतना है नहीं। वैज्ञानिक इरिक लेरर कहते हैं कि ढलान की तरफ जाने वाला ट्रक अपनी गति को कुछ नियंत्रित जरूर कर सकता है लेकिन अंतत: वह जाएगा नीचे ही।

यदि इस बात को हम ध्यान रखें तो अंटार्कटिका में बर्फ पिघलने की प्रक्रिया भले ही मंद गति से हो लेकिन यह धीरे-धीरे पिघलती रहेगी और समुद्र की सतह के स्तर में बढ़ोत्तरी भी होगी। बर्फ के पिघलने की पूरी प्रक्रिया का सही अंदाजा लगाने के लिए बेहद ही सूक्ष्म स्तर से देखा जाना चाहिए ताकि बर्फ पिघलने के कारण समुद्र के जलस्तर में बढ़ोत्तरी को बेहतर तरीके से समझा जा सके।

नासा के मुताबिक 19 शताब्दी के अंत से इस धरती का औसत तापमान करीब 0.9 सेल्सियस (1.62 फारेनहाइट) बढ़ा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक इस तापमान बढ़ोत्तरी में व्यक्ति जनित ग्रीन हाउस गैस और कार्बन डाई आक्साइड उत्सर्जन का बड़ा हाथ है। नासा ने कहा कि बीते 35 वर्षों में गर्मी बढ़ने का सिलसिला रहा है। इस अवधि में पांच गरम साल रिकार्ड किए गए हैं। पूरे बरस में करीब 8 महीने (जनवरी से सितंबर तक) गर्मी महसूस की जा रही है। मानवजनित पैदा हो रही खतरनाक गैसों के कारण धरती लगातार गरम हो रही है।