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प्राकृतिक जलीय पारिस्थितिक तंत्र पर बढ़ते इंसानी प्रभाव के साथ बढ़ रहा है मीथेन का उत्सर्जन

शोध से पता चला है कि मीथेन के वैश्विक उत्सर्जन में जलीय पारिस्थितिक तंत्र का योगदान 41 से 53 फीसदी के बीच हो सकता है

By Lalit Maurya

On: Friday 09 April 2021
 

वैश्विक मीथेन का करीब आधा हिस्सा जलीय पारिस्थितिक तंत्र के कारण हो रहा है जोकि मानव द्वारा उत्सर्जित मीथेन से कहीं ज्यादा है। गौरतलब है कि कृषि या जीवाश्म ईंधन के उपयोग से भी मीथेन का उत्सर्जन होता है। जिस तरह से मनुष्य प्राकृतिक जलीय पारिस्थितिक तंत्र को प्रभावित कर रहे हैं, उसके चलते इसके उत्सर्जन में वृद्धि हो रही है। यह जानकारी हाल ही में येल स्कूल ऑफ एनवायरनमेंट द्वारा किए शोध में सामने आई है जोकि जर्नल नेचर जियोसाइंस में प्रकाशित हुआ है।

यदि पूर्व-औद्योगिक काल की तुलना में आज को देखें करें तो वायुमंडल में मीथेन का स्तर तीन गुना बढ़ गया है। वहीं यदि जलवायु परिवर्तन पर मीथेन के पड़ने वाले असर की बात करें तो यह गैस कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में कहीं ज्यादा तेजी से वातावरण को गर्म कर रही है। ग्लोबल वार्मिंग के मामले में यह कार्बन डाइऑक्साइड से करीब 28 गुना अधिक शक्तिशाली है।

गौरतलब है कि वैश्विक तापमान में अब तक जितनी भी वृद्धि हुई है उसके करीब 25 फीसदी हिस्से के लिए मीथेन ही जिम्मेवार है। इस  शोध से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता जूडिथ रोसेंट्रेटर ने बताया कि अब तक विश्व में बढ़ते मीथेन उत्सर्जन के लिए जलीय पारिस्थितिकी प्रणालियों की हिस्सेदारी को बहुत कम करके आंका गया है, जबकि वो उससे कहीं ज्यादा है। शोध से पता चला है कि मीथेन के वैश्विक उत्सर्जन में जलीय पारिस्थितिक तंत्र का योगदान 41 से 53 फीसदी के बीच हो सकता है जिसमें प्राकृतिक और इंसानों द्वारा प्रभावित जल स्रोत शामिल हैं।

इस शोध में शोधकर्ताओं ने 15 प्रमुख प्राकृतिक, मानव निर्मित जलीय पारिस्थितिकी प्रणालियों और वेटलैंड्स से उत्सर्जित होने वाली मीथेन की समीक्षा की है। इसमें अंतर्देशीय, तटीय और समुद्री प्रणालियां भी शामिल थी। साथ ही वो जलीय स्रोत भी थे, जिनपर इंसानों ने प्रभाव डाला है। उन्होंने जब इन सभी स्रोतों से होने वाले मीथेन उत्सर्जन को जोड़कर देखा तो वो इंसानो द्वारा उत्सर्जित किए जाने वाले मीथेन जैसे कृषि और जीवाश्म ईंधन से होने वाले उत्सर्जन से भी ज्यादा था। 

क्या है उत्सर्जन के बढ़ने की वजह

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि मनुष्य किस तरह जल स्रोतों से होने वाले मीथेन उत्सर्जन को प्रभावित कर रहे हैं। रोसेंट्रेटर के अनुसार शोध से पता चला है कि जो स्रोत इंसानों द्वारा प्रभावित थे वो प्राकृतिक स्रोतों की तुलना में कहीं ज्यादा मीथेन उत्सर्जित कर रहे थे। उनके अनुसार यदि वैश्विक स्तर पर देखें तो धान की खेती हर वर्ष सभी तटीय वेटलैंडस, महाद्वीपीय शेल्फ और खुले महासागर की तुलना में कहीं ज्यादा मीथेन उत्सर्जित कर रही है। जब उर्वरक पानी के साथ पोषक तत्वों से भरपूर झीलों और जलाशयों में मिलते हैं तो वो कहीं ज्यादा मीथेन उत्सर्जित करने लगते हैं।

अनुमान है कि तटों पर मछली पालन के लिए बनाए खेतों से अन्य गैर परिवर्तित तटीय आवासों जैसे मैंग्रोव के जंगल और दलदली जमीन की तुलना में 7 से 430 गुना अधिक मीथेन उत्सर्जित हो सकती है।

शोध के अनुसार यदि सही प्रबंधन तकनीकों की मदद ली जाए तो इंसानों द्वारा उत्सर्जित की जा रही मीथेन के एक बड़े हिस्से को रोका जा सकता है। इन धान के खेतों और मछली पालन के लिए बनाए फार्म्स से आने वाले पानी को रोक दिया जाए, साथ ही यदि साफ़ पानी की झीलों, जलाशयों और नदियों में पोषक तत्वों और कार्बनिक पदार्थों को मिलने से रोक दिया जाए तो इससे काफी हद तक होने वाले मीथेन उत्सर्जन को कम किया जा सकता है।

इस शोध से जुड़े शोधकर्ता ब्रैडली आइरे ने बताया कि यदि इन जलीय प्रणालियों से होने वाले मीथेन उत्सर्जन को कम कर दिया जाए तो वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि को रोकने में मददगार हो सकता है।