मनुष्य और पर्यावरण पर 1972 में स्टॉकहोम में आयोजित सम्मेलन में इंदिरा गांधी का भाषण

दुनिया में पहली बार पर्यावरण के प्रति चिंता जताने वाले स्टॉकहोम सम्मेलन को 50 साल पूरे हो रहे हैं। इस मौके पर डाउन टू अर्थ की खास पेशकश

On: Tuesday 31 May 2022
 
भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी 1972 में स्टॉकहोम सम्मेलन को संबोधित करते हुए।
भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी 1972 में स्टॉकहोम सम्मेलन को संबोधित करते हुए। भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी 1972 में स्टॉकहोम सम्मेलन को संबोधित करते हुए।

स्व. श्रीमती इंदिरा गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री, भारत, 14 जून 1972, स्टॉकहोम 


इस सम्मेलन को संबोधित करना मेरे लिए सचमुच सम्मान की बात है, जिसमें मानवता के वर्तमान और भविष्य के कल्याण के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबद्धता व्यक्त की गई है। इस सम्मेलन का उद्देश्य केवल कुछ समझौतों तक ही सीमित नहंी है बल्कि इसका मकसद दुनिया की सभी नस्लों और प्रकृति के बीच शांति और सामंजस्य स्थापित करना है। यहां पर मौजूद प्रतिनिधियों की भीड़ उनकी अपनी स्थिति और धरती पर अपने वक्त को लंबा करने के ईमानदार प्रयासों को समझने का संकेत है। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव श्री मौरिस स्ट्रांग के गतिशील व्यक्तित्व के निर्देशन में इस सम्मेलन के आयोजन से पहले काफी लंबी तैयारी की गई है।

मेरी किस्मत अच्छी रही होगी, जिसके चलते मुझे प्रकृति के साथ उसके सभी रूपों में संबंध की भावना के साथ बड़े होने का मौका मिला। पंछी, ग्रह और पत्थर सभी मेरे दोस्त थे, तारों भरे आकाश के नीचे रातें गुजारने के चलते मैं नक्षत्रों के नाम और गति से परिचित हो गई थी। हालांकि उनमें मेरी गहरी दिलचस्पी केवल एकमात्र हमारी पृथ्वी के लिए नहीं बल्कि सभी मनुष्यों के लिए एक उपयुक्त घर के रूप में थी।

सम्राट अशोक की सीख याद रखें
कोई भी व्यक्ति, सच्चा मनुष्य ओर सभ्य नागरिक तब तक नहीं हो सकता , जब तक कि वह केवल अपने साथी इंसानों को ही नहीं, बल्कि सारे जीव-जंतुओं को अपने दोस्त की तरह नहीं देखता। पूरे भारत में, चट्टानों और लोहे के खंभों पर खुदे हुए शिलालेख इसकी याद दिलाते हैं कि 22 सदी पहले सम्राट अशोक ने एक राजा के कर्तव्य को केवल नागरिकों की रक्षा करने और गलत काम करने वालों को दंडित करने के लिए ही नहीं, बल्कि पशुओं के जीवन और वन-वृक्षों को संरक्षित करने के रूप में भी परिभाषित किया था।  कुछ समय पहले तक अशोक पहले और शायद एकमात्र सम्राट थे, जिन्होंने खेल या भोजन के लिए बड़ी संख्या में जानवरों की प्रजातियों को मारने से मना किया था। उनका यह विचार, इस सम्मेलन की कुछ चिंताओं को दर्शाता है। अशोक यहीं नहीं रुके, वह इससे भी आगे बढ़े और उन्होंने अपनी सैन्य-विजय के नरसंहार पर पछतावा करते हुए और अपने उत्तराधिकारियों को ‘नेकी के माध्यम से आने वाली शांति में उनका एकमात्र आनंद’ ढूंढने का आदेश दिया।

पर्यावरणीय-असंतुलन से निपटने के लिए उठा रहे कदम
पूरी दुनिया के साथ हम भारतीय भी अशोक की शिक्षाओं के बावजूद अपने भरण-पोषण के स्रोतों की अनियंत्रित उपेक्षा के दोषी हैं। हम वनस्पतियों और जीवों के तेजी से बिगड़ने पर आपके साथ अपनी चिंता साझा करते हैं। हमारे वन्य-जीवन का कुछ हिस्सा पूरी तरह से नष्ट हो चुका है। खूबसूरत पुराने पेड़ों वाले मीलों लंबे जंगल, जो इतिहास के मूक गवाह थे, बर्बाद हो चुके हैं। हालांकि हमारे उद्योगों का विकास अभी शुरुआती और अपने सबसे मुश्किल चरण में है, तब भी हम उसके कारण होने वाले पर्यावरण के असंतुलन से निपटने के लिए कई  कदम उठा रहे हैं। यह कदम बड़े इसलिए हैं क्योंकि हमारी चिंता समूची उस मानव-जाति के प्रति है, जो पहले से संकटग्रस्त है। गरीबी में उसे कुपोषण और बीमारी का खतरा है, युद्ध से कमजोरी में जबकि समृद्धि में उससे पैदा होने वाले प्रदूषण से।

ऐसा कहा जाता है कि एक के बाद एक देश के लिए प्रगति को प्रकृति पर हमले का पर्याय बन जाना चाहिए। हम सब जो प्रकृति का एक हिस्सा हैं और अपनी हर जरूरत के लिए उस पर निर्भर हैं, प्रकृति के ‘शोषण’ के बारे में लगातार बोलते हैं। 1953 में जब, दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वत पर पर्वतारोही पहुंचा था, तो जवाहरलाल नेहरू ने ‘एवरेस्ट की विजय’ वाक्यांश पर आपत्ति जताई थी, जिसे तब उनका अहंकार कहा गया था। यह आश्चर्य की बात है कि विचार की इस कमी और अपनी श्रेष्ठता साबित करने की लगातार जरूरत को हमारे साथियों के साथ हमारे बर्ताव के रूप में पेश किया जाए। मुझे याद है कि एक ब्रिटिश लेखक और भारत के अच्छे दोस्त एडवर्ड थॉम्पसन नेे एक बार गांधीजी से कहा था कि वन्यजीव तेजी से लुप्त हो रहे हैं। इस पर महात्मा गांधी ने टिप्पणी की थी - ‘यह (वन्यजीवों का लुप्त होना ) जंगलों में कम हो रहा है लेकिन शहर में बढ़ रहा है।’

प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर दोहन किया विकसित देशों ने
हम यहां संयुक्त राष्ट्र के बैनर तले इकट्ठा हुए हैं। हमेशा अपेक्षा है कि हम सब एक ही परिवार के हैं, जिनके गुणों में समानता है और जिनकी बुनियादी आकांक्षाएं एक सी हैं, फिर भी हम एक बंटी हुई दुनिया में रहते हैं।

इसको अन्यथा कैसे लिया जा सकता है ? आज भी इंसानों की बराबरी की कोई मान्यता नहीं है या फिर निजी तौर पर किसी के सम्मान का कोई मूल्य नहीं है। जहां तक रंग और नस्ल, धर्म और मान्यताओं का सवाल है तो समाज पूर्वनिर्धारित अवधारणाओं से संचालित होता है। लोगों की उग्रता और श्रेष्ठ होने के दंभ के चलते तनाव बढ़ते हैं। बड़े की ताकत की बात आज भी सच है लेकिन यह किसी अच्छे काम या खूबसूरती के लिए नहीं बल्कि काल्पनिक इच्छाओं का पीछा करने में काम आती है। इसके चलते दूसरे के अधिकारों में दखल देना और कार्रवाई का अधिकार हासिल किया जाता है, जिसकी आमतौर पर किसी को इजाजत नहीं दी जा सकती। आज के तमाम विकसित देशों में से कई दूसरे देशों और नस्लों पर अपना प्रभुत्व जमाकर सम्पन्न हुए हैं, उन्होंने अपने प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर दोहन किया है। उन्होंने शुरुआत से ही एक तरह की क्रूरता का दामन थामा और, दया, स्वतंत्रता, समानता और न्याय जैसे मूल्यों को ताक पर रखकर आगे बढ़ने का फैसला लिया। नागरिकों के राजनीतिक आधिकार हों या सबसे नीचे के आदमी के आर्थिक अधिकार, ये तब बहाल किए गए, जब ये देश काफी आधुनिक हो चुके थे। अमीरों और उपनिवेशी देशों के मजदूरों ने पश्चिम के औद्योगीकरण और उसकी सम्पन्नता में कोई छोटी भूमिका नहीं निभाई।

आज जब हम पूरी तरह से अलग स्थितियों में अपने लोगों का जीवन बेहतर बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं तो जाहिर तौर पर हम पर इस तरह से नजर रखी जा रही हैै कि हम जरूरी कामों के लिए भी पर्यावरण के नियमों की नहीं कर सकते। हम अपने ही आदर्शों से बंधे हैं। हम अपने मजदूरों के अधिकारों के लिए प्रतिबद्ध हैं और हमें अंतरराष्ट्रीय संगठनों के चार्टर में लिखित सिद्धांतों का भी पालन करना है। इससे भी आगे, हम अपने देशों के राजनीतिक तौर पर जागरुक करोड़ों नागरिकों के प्रति जवाबदेह हैं। यह सारी चीजें प्रगति को महंगा और ज्यादा जटिल बनाती हैं।

गरीबी मिटाए बिना कम नहीं होगा प्रदूषण
एक तरफ तो अमीर लगातार हमारी गरीबी पर बात करते हैं, दूसरी ओर वे हमें अपने तरीकों से चेताते रहते हैं। पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने की हमारी कोई इच्छा नहीं है लेकिन फिर भी हम एक पल के लिए यह नहीं भूल सकते कि बड़ी तादाद में हमारे लोग गरीब हैं। क्या गरीबी और सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले लोग एक ही सिक्के के दो पहलू हैं ? उदाहरण के लिए, जब तक हम जंगलों में रहने वाले हमारे आदिवासी लोगों को रोजगार देने और कुछ खरीद पाने की स्थिति में नहीं ला पाते, तब तक हम उनसे, उनके खाने और आजीविका के लिए जंगलों पर निर्भर न रहने के लिए नहीं कह सकते। जब तक वे खुद भूखे हैं, तब तक हम उनसे जानवरों को बचाने का आग्रह कैसे कर सकते हैं ? जो लोग गांवों और झुग्गियों में रहते हैं, उनसे हम समुदों, नदियों ओर हवा को बचाने के लिए कैसे कह सकते हैं जबकि इन प्राकृतिक स्रोतों के करीब रहने वालों की अपनी जिंदगी बदतर है। गरीबी की स्थितियों में सुधार के बिना रहते पर्यावरण बेहतर नहीं हो सकता और विज्ञान और तकनीकी के बगैर गरीबी भी दूर नहीं की जा सकती है।

क्या प्रौद्योगिकी और सचमुच बेहतर दुनिया के बीच या आत्मा के ज्ञान और उच्च जीवन स्तर के बीच संघर्ष होना चाहिए ? विदेशी जब कभी-कभी हमसे पूछते हैं कि क्या भारत में प्रगति का मतलब उसकी आध्यात्मिकता या उसके मूल्यों का ह्रास नहीं होगा, तो यह सवाल बहुत अजीब लगता है। क्या आध्यात्मिक गुण इतना सतही है कि भौतिक सुख-सुविधा के अभाव पर निर्भर हो जाए ? एक देश के रूप में हम किसी दूसरे देश से कम या जयादा आध्यात्मिक नहीं हैं लेकिन पारंपरिक तौर पर हमारे लोग वैराग्य और त्याग की भावना का सम्मान करते रहे हैं। ऐतिहासिक रूप से, हमारी महान आध्यात्मिक खोजें तुलनात्मक रूप से समृद्धि के दौर में हुई थीं। संपत्ति से वैराग्य के सिद्धांतों को अभाव के तरीकों के रूप में विकसित नहीं बल्कि आराम और सहजता को इंद्रियों को सुस्त करने से रोकने के लिए विकसित किया गया था। आध्यात्मिकता का अर्थ आत्म का समद्ध होना है - अपने आंतरिक संसाधनों को मजबूत करना और अपने अनुभव की सीमा को बढ़ाना है। यह क्रिया के बीच में स्थिर रहने और शांति के क्षणों में जीवंत रूप से जीवित रहने की क्षमता है यानी परिस्थितियों से सार को अलग करने के लिए, सुख-दुःख को एक समभाव से स्वीकार करना। अनुभूति और करुणा, सच्ची आध्यात्मिकता के प्रतीक हैं।

औद्योगीकरण के साथ पर्यावरण को भी प्राथमिकता
मुझे हमारे एक आदिवासी इलाके की एक घटना याद आ रही है। बड़े आदिवासी प्रमुखों की इस मुखर मांग को कि उनके रीति-रिवाजों को छोड़ दिया जाना चाहिए, एक प्रसिद्ध मानवविज्ञानी से समर्थन मिला था। इस चिंता में कि बहुसंख्यक आबादी, कहीं हमारे देश में कई जातीय, नस्लीय और सांस्कृतिक समूहों पर अपने को पूरी तरह लाद न देें, भारत सरकार ने मोटे तौर पर इस सलाह को स्वीकार कर लिया। मैं उन लोगों में से थी, जिन्होंने इसे पूरी तरह से मंजूरी दे दी थी। हालांकि, हमारे उत्तर-पूर्वी सीमांत के सुदूर हिस्से की यात्रा से मैं एक अलग दृष्टिकोण के संपर्क में आई- युवा तत्वों का विरोध जबकि बाकी देश आधुनिकीकरण के रास्ते पर था। तो उन्हें संग्रहालय के टुकड़ों के रूप में संरक्षित किया जा रहा था। क्या हम संपन्न राष्ट्रों से ऐसा नहीं कह सकते थे ?

इस सदी की अंतिम चौथाई समय में, हम मानव इतिहास के अद्वितीय उद्यम में लगे हुए हैं। यह है - एक या दो पीढ़ियों की अवधि के भीतर मानव जाति के छठे हिस्से के लिए बुनियादी जरूरतों का प्रावधान करना। जब हमने उस प्रयास को शुरू किया तो हमारे शुरुआती योजनाकारों के पास भरने के लिए सामान्य से ज्यादा फासला  था। पर्याप्त आंकड़ा नहीं था और न ही कोई मददगार किताबें   थीं। अन्य देशों के अनुभव से कोई मार्गदर्शन नहीं मांगा जा सकता था, क्योंकि राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी यानी सारी स्थितियां पूरी तरह से अलग थीं।

जिस अर्थ में हम नया रास्ता तलाश रहे थे, उस अर्थ में इसका उपयोग मिश्रित अर्थव्यवस्था के संदर्भ में कभी नहीं किया गया था। लेकिन हम इंतजार नहीं कर सकते थे। हम पर अपने लोगों की स्थितियों में सुधार लाने का दबाव था। योजना और कार्रवाई, बेहतर योजना और बेहतर कार्रवाई के लिए आंकड़ों में सुधार, यह सब एक सतत और अतिव्यापी प्रक्रिया थी। हमारा औद्योगीकरण उन रास्तों का अनुसरण करने के लिए प्रवृत्त हुआ, जिन पर पहले अधिक उन्नत देशों ने यात्रा की थी। साठ के दशक की प्रगति के साथ और विशेष रूप से पिछले पांच सालों के दौरान, हमने बहुत सारी चौंकाने वाली समस्याओं का सामना किया है, इनमें से कुछ हमारी अपनी कमियों के कारण जबकि बहुत सारी समस्याएं इस प्रक्रिया में और मौजूदा दृष्टिकोण में कई अंतर्निहित हैं। अब हमारे अंदर यह भावना बढ़ रही है कि हमें अपनी प्राथमिकताओं को फिर से व्यवस्थित करना चाहिए और एकल-आयामी मॉडल से दूर जाना चाहिए, जिसने विकास को कुछ सीमित कोणों से देखा है,। जिसके बारे में लगता है कि उसने व्यक्तियों के बजाय चीजों को जीवन में बड़ी जगह दी है और जिसने आनंद कीे बजाय हमारी जरूरतों को बढ़ाया है। हमें जीवन को लेकर एक ज्यादा समग्र दृष्टिकोण रखना चाहिए। जो आदमी पर केंद्रित तो होना चाहिए लेकिन किसी संाख्यिकी के रूप में नहीं बल्कि उसके व्यक्तित्व के कई पहलुओं पर। इन समस्याओं का समाधान किसी अलग परिघटना के तौर पर नहीं बल्कि विकास की प्रक्रिया के एक अभिन्न अंग के तौर पर होना चाहिए।

हर समस्या के लिए आबादी को दोष देना सरलीकरण
जनसंख्या या पर्यावरण प्रदूषण के सवाल जिन चरम रूपों में पूछे जाते हैं, वे राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक स्थितियों के समग्र दृष्टिकोण को धुंधला करते हैं। भारत सरकार, उन कुछ सरकारों में से एक है, जिसने परिवार नियोजन के कार्यक्रम को आधिकारिक तौर पर प्रायोजित किया है। इस दिशा में थोड़ी प्रगति हो रही है। हमारा मानना है कि नियोजित परिवार, स्वस्थ और ज्यादा जाग्रत आबादी का निर्माण करेंगे। हालांकि हम जानते हैं कि शिक्षा या जीवन-स्तर में बदलाव के बिना आबादी नियत्रंण का कोई कार्यक्रम कामयाब नहीं हो सकता है। हमारे अपने कार्यक्रम शहरी या अर्ध-शहरी क्षेत्रों में कामयाब रहे हैं। बहुत गरीब परिवार के लिए हर बच्चा कमाने वाला और मददगार होता है। हम नए दृष्टिकोणों के साथ प्रयोग कर रहे हैं और परिवार नियोजन कार्यक्रम को सामान्य रूप से मातृत्व और बाल कल्याण, पोषण और विकास के साथ जोड़ा जा रहा है।

दुनिया की सभी समस्याओं के लिए बढ़ती हुई आबादी को दोष देना अति-सरलीकरण है। जिन देशों में दुनिया की आबादी का एक छोटा सा हिस्सा है, वे दुनिया के खनिजों, जीवाश्म ईंधन आदि के बड़े पैमाने पर उत्पादन का उपभोग करते हैं। इस तरह हम देखते हैं कि जब प्राकृतिक संसाधनों की कमी और पर्यावरण प्रदूषण की बात आती है, तो किसी समृद्ध देश में एक निवासी के जीवन स्तर में वृद्धि, कई एशियाई, अफ्रीकी या लैटिन अमेरिकियों की वृद्धि के बराबर है।

यह अंतर्निहित संघर्ष दरअसल संरक्षण और विकास के बीच नहीं है, बल्कि पर्यावरण और दक्षता के नाम पर मनुष्य और पृथ्वी के अंधाधुंध शोषण के बीच है। इतिहासकार हमें बताते हैं कि आधुनिक युग की शुरुआत व्यक्ति की स्वतंत्रता की इच्छा से हुई थी। फिर बाद में व्यक्ति ने निजी तौर पर यह मान लिया कि जिसके पास अधिकार हैं, उसे पास उनके अनुरूप कोई दायित्व है ही नहीं। वही व्यक्ति आगे आ सका, जिसने अपनी प्रशंसा का आदेश दिया। उससे इसके लिए कोई सवाल नहीं पूछा गया कि उसने किन तरीकों का इस्तेमाल किया और किन लोगों को उसकी कामयाबी की कीमत चुकानी पड़ी।

आधुनिक युग के सभी ‘वाद’ लाभ पर केंद्रित
औद्याोगिक सभ्यता ने कुशल आदमी की अवधारणा को आगे बढ़ाया है, ऐसा आदमी जिसकी सारी ताकत दिए हुए समय और श्रमशक्ति की सीमा में ज्यादा से ज्यादा उत्पादन पर केंद्रित हो। ऐसे समूह या व्यक्ति जो कम प्रतिस्पर्धी हैं और इस परीक्षण के अनुसार कम कुशल हैं, उन्हें छोटी नस्ल वाला माना जाता है, उदाहरण के लिए पुरानी सभ्यताएं, काले और भूरे रंग के लोग, महिलाएं और कुछ पेशे। चीजों का प्रचलन में न रहना,  उनके उत्पादन पर निर्भर करता है। इसी तरह दक्षता उन सामानों के निर्माण पर आधारित होती है जिनकी वास्तव में कोई जरूरत नहीं होती है और जिन्हें उपयोग करने के बाद खत्म नहीं किया जा सकता है। ऐसी दक्षता किस कीमत पर है और क्या इस तरह के व्यवहार के लिए लापरवाही अधिक उपयुक्त शब्द नहीं है ?

आधुनिक युग के सभी ‘वाद’ - यहां तक कि वे भी जो सैद्धांतिक रूप में निजी लाभ सिद्धांत को अस्वीकार करते है, यह मानते हैं कि मनुष्य का मुख्य हित कब्जा जमाना है। लाभ का मकसद, चाहे वह व्यक्तिगत या सामूहिक, बाकी सब पर भारी पड़ता है। खुद के लाभ की यह अतिव्यापी चिंता पारिस्थितिक संकट का मूल कारण है। प्रदूषण कोई तकनीकी समस्या नहीं है। दोष विज्ञान और प्रौद्योगिकी में नहीं है, बल्कि समकालीन दुनिया के मूल्यों के अर्थ में है जो दूसरों के अधिकारों की उपेक्षा करता है और व्यापक परिप्रेक्ष्य से बेखबर है।

इसे लेकर भी गंभीर आशंकाएं हैं कि पारिस्थितिकी पर चर्चा युद्ध और गरीबी की समस्याओं से ध्यान भटकाने के लिए तैयार की जा सकती है। हमें संपति से वंचित दुनिया की बड़ी आबादी के सामने यह साबित करना होगा कि पारिस्थितिकी और संरक्षण उनके खिलाफ काम नहीं करेगा, बल्कि उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव लाएगा। उन्हें प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल से रोकना, उन्हें ऊर्जा और ज्ञान के विशाल संसाधनों से वंचित करेगा। यह अब संभव नहीं है और यह स्वीकार्य नहीं होगा।

औद्योगीकरण का दुष्परिणाम नहीं विकास की अपर्याप्तता
विकासशील देशों में पर्यावरण से जुड़ी समस्याएं, वहां अति-औद्योगीकरण का दुष्परिणाम नहीं विकास की अपर्याप्तता को दर्शाती हैं। समृद्ध देश विकास को पर्यावरण विनाश का कारण मान सकते हैं, लेकिन हमारे लिए पर्यावरण में सुधार का पहला मतलब है-लोगों को खाना, पानी, रहने की जगह और शौचालय उपलब्ध कराना, रेगिस्तानों को हरा-भरा और पहाड़ों को रहने योग्य बनाना। शोध और समर्पित लोगों की दृढ़ता ने हमें एक अंतदृष्टि प्रदान की है, जो भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगी।  हम देखते हैं कि इंसान भौतिक चीजों को पाने के लिए जितना लालायित रहता है, वे चीजें उसे सुख देने में उतना ही नाकाम रहती हैं। इसलिए जीवन जीने का सबसे बेहतर तरीका लोगों को उनके घर से उजाड़ना नहीं होना चाहिए। इसके लिए प्रकृति की सुंदरता, उसकी ताजगी और शुद्धता को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए, क्योंकि ये सब हमारे लिए बहुत जरूरी हैं।

सबसे जरूरी और बुनियादी सवाल शांति का है। आधुनिक युद्ध जितना व्यर्थ कुछ भी नहीं है। कुछ भी इतनी जल्दी और पूरी तरह नष्ट नहीं होता है, जितना शैतानी हथियार। ये न केवल जीवित लोगों को मारते हैं, उनको अपंग और विकृत करते हैं बल्कि उन्हें भी जो अभी पैदा होने वाले हैं। ये हथियार कुरूपता, बंजरता और निराशाजनक उजाड़ के लंबे निशान छोड़ते हुए जमीन को जहरीला बना देते हैं। कौन सी पारिस्थितिक परियोजनाएँ हमें युद्ध से बचा सकती हैं? स्वीडन के प्रधान मंत्री श्री ओलोफ पाल्मे ने पहले ही सम्मेलन का ध्यान शक्तिशाली शब्दों में इस ओर आकर्षित किया है।

‘एक मानवता’ की अवधारणा’ की ओर बढ़ें कदम
यह साफ है कि दुनिया पर्यावरण के जिस संकट का सामना कर रही है, वह हमारी किस्मत पर और हमारी धरती पर पूरी तरह से असर डालेगा।  हममें से कोई भी, चाहे उसका कद, उसकी मजबूती और परिस्थितियां जैसी भी हों, वह इससे बच नहीं सकता। इसमें बदलाव की प्रक्रिया मौजूदा अंतरराष्ट्रीय नीतियों को चुनौती देने वाली हैं। क्या ‘एक धरती’ और ‘एक पर्यावरण’ की बढ़ती जागरुकता हमें ‘एक मानवता’ की अवधारणा’ की ओर ले जा सकेगी ? क्या कम विकसित दुनिया की तेज प्रगति में पर्यावरणीय लागतों का अधिक न्यायसंगत बंटवारा और अधिक अंतरराष्ट्रीय हित शामिल होगा ? या फिर यह एकांतिक आत्मनिर्भरता पर आधारित एक संकीर्ण सरोकार तक ही सीमित रहेगा ?

आर्थिक और तकनीकी विषमताओं को कम करने में पहला परीक्षण सफल नहीं हुआ है क्योंकि सहायता की नीतियां सत्ता के समीकरणों को बनाए रखने के लिए बनाई गई थीं। हमें उम्मीद है कि आत्मनिर्भरता पर नए सिरे से जोर, जलवायु में बदलाव में मदद के साथ मानव-संतुष्टि के नए मानदंडों की खोज को भी बढ़ावा देगा। इन सबके बीच, पारिस्थितिक संकट के चलते अमीर देशों की राजनीतिक और व्यापार नीतियों को ऐसा नहीं बनाना चाहिए जिससे कमजोर देशों पर आर्थिक बोझ पड़े। यह बिडंबनापूर्ण होगा अगर प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई, दूसरे अन्य मुद्दों में उलझकर रह जाए। जिससे बहुत सारे लोगों की कीमत पर केवल कुछ कपंनियों, कार्पोरेशनों और देशों को फायदा मिले। यहां, प्रयोग और खोज की एक शाखा है जिसमें सभी राष्ट्रों के वैज्ञानिकों को रुचि लेनी चाहिए। उन्हें यह तय करना चाहिए कि उनके नतीजे पेटेंट के प्रतिबंधों से अलग सभी देशों के लिए उपलब्ध हों। मुझे खुशी है कि सम्मेलन में समस्या के इस आयाम पर विचार रखे गए हैं।

जीवन एक है और दुनिया भी एक है और यह एब आपस में एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। जनसंख्या विस्फोट, गरीबी, अज्ञानता और बीमारी, हमारे आसपास का प्रदूषण, परमाणु हथियारों का भंडार और विनाश के जैविक और रासायनिक एजेंट सभी एक दुष्चक्र के हिस्से हैं। से सभी समस्याएं महत्वपूर्ण और तत्कालिक हैं लेकिन इनसे एक-एक करके निपटना बेकार की कोशिश होगी।

वैश्विक स्तर पर सहभागी-दृष्टिकोण का कोई विकल्प नहीं
अतीत पर ध्यान केंद्रित करने या दूसरों को दोष देने से हमें अपने मकसद में बहुत कम मदद मिलेगी। हम में से कोई भी निर्दोष नहीं है। यदि हममें से कुछ दूसरों पर हावी होने में सक्षम हैं, तो यह कम से कम आंशिक रूप से उनकी कमजोरी, एकता की कमी और समर्पण करने वालों की ओर से कुछ लाभ प्राप्त करने के लालच के कारण है। अगर कोई समद्ध किसी जरूरतमंद को शोषण कर रहा है तो क्या हम ईमानदारी से कह सकते हैं कि हमारे अपने समाजों में लोग दूसरे की कमजोरी का फायदा नहीं उठाते ?  हमें उन मूलभूत सिद्धांतों का पुनर्मूल्यांकन करना चाहिए जिन पर हमारे नागरिक समाज आधारित हैं और जिन आदर्शों से वे कायम हैं। अगर दिल बदलने, दिशा बदलने और काम करने के तरीकों में बदलाव होना है, तो यह कोई संगठन या देश नहीं है - चाहे उसकी कितनी भी अच्छी नीयत हो - जो इसे प्राप्त कर सकता है। वैसे तो हर देश को पर्यावरण की समस्या के उस पहलू से निपटना चाहिए जो उसके लिए सबसे अधिक प्रासंगिक है, फिर भी यह स्पष्ट है कि इसके लिए सभी देशों को मिलकर समग्र प्रयास करने चाहिए। हमारी सभी समस्याओं के लिए वैश्विक स्तर पर सहभागी-दृष्टिकोण का कोई विकल्प नहीं है।

मैंने कुछ समस्याओं का उल्लेख किया है जो मुझे हमारी सभ्यता में वर्तमान संकट का मूल कारण लगती हैं। ऐसा इस उम्मीद में नहीं है कि यह सम्मेलन चमत्कार कर सकता है या दुनिया की सभी कठिनाइयों का समाधान कर सकता है, बल्कि यह इस उम्मीद में है कि हर देश की राय को ध्यान में रखा जाएगा, इसलिए कि इन समस्याओं को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाएगा और पर्यावरण की समस्या से जुड़ी हर परियोजना को पूर्ण हिस्से के रूप में तैयार किया जाएगा।

नहीं चाहते कुछ लोगों को विशेषाधिकार वाली दुनिया
पिछले मौके पर मैंने हमारे देशों में अधूरी क्रांति की बात की थी। अब मैं आश्वस्त  हूं कि अगर सामाजिक सोच में क्रांति के साथ मिलकर काम करें, तो इसे चरम  पहुंचाया जा सकता है। 1968 में यूनेस्को के 14वें आम सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने अन्य लोगों के साथ मिलकर एक नया और प्रमुख कार्यक्रम प्रस्तावित किया था, जिसका शीर्षक था ‘जीने के लिए एक डिजाइन’।

तकनीकी प्रगति के पूर्ण निहितार्थ और विभिन्न वर्गों और समूहों पर इसके प्रभाव को समझने के लिए ऐसा करना जरूरी है। हम घड़ी की सुईयों को पीछे ले जाना और खुद को एक सरल, प्राकृतिक अवस्था में छोड़ना नहीं चाहते। हम ज्ञान और उन उपायों को जो हमें विज्ञान से मिले हैं, उनसे नई दिशाओं में आगे बढ़ना चाहते हैं। यह केवल एक लंबी छलांग नहीं होगी बल्कि सोच के उच्च स्तर को तकनीक के साथ मिलाने वाली एक कभी खत्म न होने वाली प्रक्रिया होगी।

हमें न केवल इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि हम किस तरह की दुनिया चाहते हैं बल्कि यह भी कि किस तरह के आदमी को इसमें रहना चाहिए। निश्चित तौर पर हम ऐसी दुनिया नहीं चाहते जिसे कुछ लोगों को विशेषाधिकार हों और कुछ को नहीं। हम चाहते हैं कि लोग ऐसे हों, जो खुद से निर्देशित हों, लोग जो दिलचस्प हों और जिनमें दूसरों के लए दया और उनके प्रति सरोकार हों।

धरती और पर्यावरण से उतना ही लें, जितना लौटा सकें
बड़े समाजों के लिए के लिए अपनी जीवनशैली को बदलना आसान नहीं होगा। उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता और न ही इसके लिए उन पर कोई सरकारी कार्रवाई पर्याप्त हो सकती है। लोगों को प्रोत्साहित किया जा सकता है और उनसे बेहतर विकल्पों को आजमाने की अपील की जा सकती है। मेरा यह अनुभव रहा है कि जो लोग प्रकृति को लेकर उल्टा नजरिया रखते हैं, वे मानव-जाति के प्रति सनकी और अपने आप में असहज होते हैं।

आधुनिक इंसान को प्रकृति और जीवन के साथ अटूट संबंध पुनर्स्थापित करना चाहिए। उसे फिर से बढ़ती चीजों की ऊर्जा का आह्वान करना और यह पहचानना सीखना चाहिए, जैसा कि सदियों पहले भारत में पूर्वजों ने किया था, कि कोई व्यक्ति पृथ्वी और वातावरण से उतना ही ले सकता है, जितना कि वह उसे वापस कर सकता है।

धरती के लिए अपनी स्तुति में, अथर्ववेद के ऋषियों ने जप किया था - जिसका मैं उद्धरण करती हूं - ‘तुझे खोद कर जो मैं निकालता हूं, उसे जल्दी से बढ़ने दो। मुझे तुम्हारे प्राणों, या तुम्हारे हृदय पर चोट न करने दो।’ तो क्या इंसान स्वयं प्राणवान और अच्छे हृदय वाला बनकर अपनी जिम्मेदारी के प्रति सचेत हो सकता है ?

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