Sign up for our weekly newsletter

95 फीसदी प्रवासी अपने गांव-घर लौटना चाहते हैं: सर्वे

विभिन्न प्रदेशों में फंसे हुए 31,423 प्रवासियों से बातचीत के बाद एकता परिषद ने एक सर्वेक्षण रिपोर्ट तैयार की है

By Shagun Kapil

On: Friday 22 May 2020
 
तस्वीर: एकता परिषद
तस्वीर: एकता परिषद तस्वीर: एकता परिषद

लॉकडाउन के दौरान विभिन्न राज्यों में फंसे प्रवासियों में से  95 फीसदी से ज्यादा प्रवासी मजदूर अपने घर-गांव लौटना चाहते हैं, जबकि उन्हें पता है कि इससे उन्हें बेरोजगारी का सामना करना पड़ेगा और उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा। यह आंकड़े भूमि और वन अधिकार संगठन, एकता परिषद द्वारा एक सर्वेक्षण के बाद जारी किए गए हैं।

एकता परिषद के कार्यकर्ताओं ने 20 मई, 2020 तक विभिन्न प्रदेशों में फंसे हुए 31,423 प्रवासियों  से बातचीत की। इसके बाद ये आंकड़े जारी किए गए। एकता परिषद के इस सर्वेक्षण में केवल पांच फीसदी प्रवासियों ने कहा कि वे अपने कार्यक्षेत्र में वापस लौटना चाहेंगे।

इसके अलावा, सर्वे में पाया गया कि औसतन हर परिवार के पास चार से पांच दिन का ही राशन उपलब्ध था और उन्हें कोई राहत नहीं मिली थी। लगभग 86 प्रतिशत प्रवासियों ने कहा कि वे अपनी आजीविका और जीवन के प्रति अनिश्चित हैं।

जिन प्रवासियों से बात की गई, उनमें  52.95 फीसदी पुरुष, 25.95 फीसदी महिलाएं और 21.46 फीसदी बच्चे थे। इनमें ज्यादातर प्रवासी मध्य प्रदेश, मणिपुर, बिहार, ओडिशा और असम से हैं, जो अलग-अलग राज्यों में फंसे हुए हैं।

लॉकडाउन के दो महीने बीतने और सरकारों द्वारा प्रवासियों के लिए ट्रांसपोर्ट का इंतजाम करने के दावों के बीच लगभग 65 प्रतिशत प्रवासियों को यह नहीं पता कि वे कैसे अपने गांवों तक पहुंचेंगे और इसमें उनका कितना खर्च आएगा।

एकता परिषद के सर्वेक्षण में शामिल कुल प्रवासियों में लगभग 37 फीसदी दिहाड़ी मजदूर, 30 फीसदी औद्योगिक मजदूर, 26 फीसदी खेतिहर मजदूर, और सात फीसदी घरेलू कामगार, होटल, कारपेंटर, इलेक्ट्रीशियन और अन्य जैसे मजदूर शामिल थे।

कोविड-19 महामारी और उसके बाद लॉकडाउन का सबसे बुरा असर प्रवासी मजदूरों पर पड़ा है और सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि राज्य सरकारों को यही नहीं पता कि इन प्रवासी मजदूरों की संख्या कितनी है और वे एक से दूसरे राज्य में कैसे जाएंगे?

एकता परिषद के राष्ट्रीय समन्वयक रमेश शर्मा ने कहा कि आदर्श स्थिति यह है कि प्रत्येक राज्य सरकार के श्रम विभाग को इनका पूरा रिकॉर्ड रखना चाहिए। लेकिन ऐसे रिकॉर्ड या तो उपलब्ध नहीं हैं या वे अधूरे और अपर्याप्त हैं, जिनसे सही तस्वीर नहीं दिखती।

वह कहते हैं कि यही कारण है कि ज्यादातर प्रवासी सरकार की खाद्य राहत और नकदी हस्तांतरण योजनाओं का लाभ उठाने से वंचित रह गए।

एकता परिषद पिछले एक महीने से राज्य के भीतर और एक से दूसरे राज्य के बीच पलायन के पैटर्न का अध्ययन करके एक नक्शा बनाने की कोशिश कर रहा है। साथ ही, उन लोगों तक पहुंचने का प्रयास किया जा रहा है, जो अपने घरों से दूर हैं।

11 अप्रैल से शुरू हुए इस प्राथमिक सर्वेक्षण में 24 सवालों को शामिल किया गया और एकता परिषद के स्वयंसेवक प्रवासियों का ऑनलाइन डेटाबेस बनाने के लिए जानकारी इकट्ठा कर रहे हैं।

ये स्वयंसेवक लगभग 15 राज्यों में जमीनी सर्वेक्षण करके यह आंकड़े इकट्ठा कर रहे हैं। इन 15 राज्यों में एकता परिषद की मजबूत इकाइयां हैं और स्वयंसेवी कार्यकर्ताओं का आधार बना हुआ है।

एकता परिषद इस काम में कुछ राज्य सरकारों की मदद भी ले रही है। इन राज्य सरकारों ने अपनी वेबसाइट पर एक एकता परिषद का फोन नंबर, हेल्पलाइन नंबर के तौर पर दिया हुआ है।

संगठन एक माइग्रेशन एटलस भी बना रहा है, जिसमें यह जानकारी इकट्ठा की जा रही है कि एक परिवार के पास कितना भोजन उपलब्ध है और परिवार में कितने सदस्य है। प्रवासन राज्य के भीतर ही है या एक से दूसरे राज्य के बीच पलायन किया गया। प्रवासी परिवार की औसत आय कितनी है। इससे एक पैटर्न की जानकारी मिलेगी।

शर्मा कहते हैं कि राज्य के श्रम अधिकारियों को इस बात का डेटाबेस रखना चाहिए कि राज्य में कितने प्रवासी हैं और वे कहाँ प्रवास कर रहे हैं। शर्मा ने कहा कि हमें उनके आवागमन के बारे में सटीक जानकारी होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि लेकिन कोई ठोस डेटा उपलब्ध नहीं है। इसलिए, जब राशन या डीबीटी (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर) की बात आती है, तो सरकार बेतरतीब ढंग से उचित डेटाबेस के बिना ही वितरण कर रही है। राज्यों के पास कोई ठोस जानकारी नहीं है कि उनके कितने मजदूर कहां फंसे हुए हैं। वे मोटे अनुमान के आधार पर बात कर रहे हैं।

एकता परिषद के इस सर्वेक्षण के मुताबिक यह पता च8ल रहा है कि भारत में 22 राज्यों में प्रवासन होता है।

शर्मा  कहते हैं कि एक और प्रवासन पैटर्न जो हम देख पा रहे हैं वह लिंग घटक है। उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश के आदिवासी इलाकों में, 60-70 प्रतिशत परिवार अपने परिवारों के साथ यात्रा करते हैं, लेकिन ओडिशा और असम जैसे इलाकों में केवल पुरुष ही यात्रा करते हैं।

एकता परिषद ने ऐसे गरीब परिवारों की एक सूची भी तैयार की है और उन्हें खाद्य आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए एक कैलेंडर भी तैयार किया है।

शर्मा ने बताया कि हम परिवार की जरूरत के आधार पर 10-14 दिनों के लिए राशन दे रहे हैं। इसमें चावल या गेहूं, दालें, तेल, आलू और नमक शामिल हैं।

एकता परिषद अपने हजारों स्वयंसेवकों के साथ मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, राजस्थान, केरल, तमिलनाडु, असम, मणिपुर, त्रिपुरा, बंगाल और महाराष्ट्र में में तत्काल और दीर्घकालिक योजनाओं पर काम कर रही है।