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लॉकडाउन: 30 प्रतिशत प्रवासी मजदूरों ने घर वापसी के लिए लिया कर्ज: स्टडी

लॉकडाउन के बाद घर लौट रहे प्रवासियों पर किए गए अध्ययन में पाया कि 52 फीसदी लोगों के पास 1 एकड़ से कम जमीन है

By Umesh Kumar Ray

On: Monday 11 May 2020
 
फोटो: विकास चौधरी
फोटो: विकास चौधरी फोटो: विकास चौधरी

कोरोनावायरस के संक्रमण के मद्देनजर 25 मार्च से राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन शुरू हुआ, तो तमाम बड़े शहरों से पलायन शुरू हो गया था। सवारी गाड़ियां व ट्रेन बंद होने के कारण लोग पैदल ही घरों के लिए निकल गए थे। ये सिलसिला अब भी जारी है। बड़े पैमाने पर हो रही इस घर-वापसी की तह में जाएं, तो पाएंगे कि जो लोग लौट रहे हैं, उनके पास लौटने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

प्रेक्सिस – इंस्टीट्यूट फॉर पार्टिसिपेटरी प्रैक्टिसेस ने अन्य संगठनों के सहयोग से बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड में लौटे 238 लोगों से तमाम पहलुओं पर राय ली गई, जिसमें पता चला कि दूसरे शहरों से लौटे इन लोगों में से 53% लोग फैक्टरियों में काम कर रहे थे और 21 प्रतिशत लोग दिहाड़ी मजदूर थे।

हालांकि, सर्वे का सैंपल बहुत छोटा है, लेकिन इससे अपने घरों की तरफ लौट रहे कामगारों की आर्थिक और सामाजिक हैसियत का अंदाजा मिल जाता है। 

तमाम तरह की कठिनाइयों का सामना कर लौट रहे लोगों की आर्थिक हैसियत देखें, तो लगता है कि लौटने के सिवा उनके पास बहुत विकल्प नहीं था। सर्वे में शामिल 238 लोगों में  87 प्रतिशत लोगों की मासिक कमाई 5 हजार से 15 हजार रुपए के बीच है। चूंकि, इनमें से 74 प्रतिशत लोग फैक्टरी वर्कर और दिहाड़ी मजदूर हैं और लॉकडाउन के कारण फैक्टरी बंद हो गई और कंस्ट्रक्शन व दूसरे तरह के काम भी ठप हो गए, तो इनकी कमाई पूरी तरह चौपट हो गई।

8 मई की देर रात श्रमिक स्पेशल ट्रेन से गुजरात से सिवान पहुंचे बलेंद्र कुमार ने डाउन टू अर्थ को बताया, “मैं चार साल से अहमदाबाद में एक फैक्टरी में वेल्डिंग का काम करता था। लॉकडाउन के कारण फैक्टरी बंद हो गई। मार्च में जो काम किया था, उसका पैसा मिल गया था, तो उसी से इतने दिन किसी तरह खाया। इधर, पैसा भी खत्म हो रहा था और फैक्टरी मालिक ने बंदी की अवधि का पैसा नहीं दिया, तो मजबूर होकर मैंने घर लौटना चुना।”

प्रेक्सिस के सीनियर प्रोग्राम अफसर अभय कुमार ने सर्वे रिपोर्ट के संबंध में कहा, “बिहार के मधुबनी और छपरा, झारखंड के तोपचाची गांव और उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में लौटे प्रवासियों को सर्वे में शामिल किया गया था। हमलोगों ने सवालों की एक सूची तैयार की थी। फील्ड में मौजूद लोगों ने प्रवासियों से ये सवाल पूछे और जवाब दर्ज किया।”

सर्वे में किन बिरादरियों को शामिल करना है, ये पहले से तय नहीं था। फील्ड में मौजूद लोगों ने प्रवासियों से संपर्क किया और सवाल पूछे। बाद में जब इनकी जातिगत पहचान के आंकड़े तैयार किए, तो पता चला कि घर लौटने वाले 238 में से 126 लोग अनुसूचित जाति से और 90 लोग ओबीसी/ईबीसी हैं। इन दोनों को मिला लें, तो 238 में से 91 प्रतिशत लोग अनुसूचित जाति व ओबीसी/ईबीसी से आते हैं जबकि 3 प्रतिशत लोग अनुसूचित जनजाति से आते हैं।

52 प्रतिशत लोग सीमांत किसान

सर्वे में ये भी पता चला है कि लौटने वाले 238 लोगों में से 52 प्रतिशत लोगों के पास एक एकड़ से कम जमीन है। एक एकड़ से कम जमीन वाले सीमांत किसानों की श्रेणी में आते हैं। वहीं, 29 प्रतिशत लोगों के पास केवल उतनी ही जमीन है, जितने में उनका घर है। 5 प्रतिशत लोग ऐसे मिले, जिनके पास एक बित्ता भी जमीन नहीं है। सर्वे के मुताबिक, 30 प्रतिशत प्रवासी कामगारों को घर-वापसी के लिए कर्ज लेना पड़ा क्योंकि उनके पास पैसा नहीं बचा था। रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर के रहने वाले फैक्टरी वर्कर राजकुमार के हवाले से बताया गया है कि उन्होंने जब दिल्ली से घर लौटने का सोचा, तो उनके पास महज 1000 रुपए थे। उनके मुताबिक, अगर वह किसी तरह घर नहीं लौटते, तो दिल्ली में भूखों मर जाते।