एशिया की सबसे बड़ी कोयला खदान के विस्तार को क्यों नहीं मिली मंजूरी?

कंपनी ने खदान की उत्पादन क्षमता 49 मिलियन टन से बढ़ाकर 70 मिलियन टन करने का प्रस्ताव रखा था

By Satyam Shrivastava

On: Monday 20 September 2021
 
छत्तीसगढ़ की गेवरा ओपन कास्ट खदान, जिसका विस्तार करने के प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी गई। फोटो: बिपाशा पॉल
छत्तीसगढ़ की गेवरा ओपन कास्ट खदान, जिसका विस्तार करने के प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी गई। फोटो: बिपाशा पॉल छत्तीसगढ़ की गेवरा ओपन कास्ट खदान, जिसका विस्तार करने के प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी गई। फोटो: बिपाशा पॉल

2 सितंबर 2021 को वन,पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (एक्सपर्ट एप्राइजल कमिटी- कोयला क्षेत्र) की 18 वीं ऑनलाइन बैठक के मिनिट जारी हुए हैं। यह समिति मंत्रालय द्वारा पर्यावरण प्रभाव आंकलन, 2006 के तहत गठित की गई है। 

समिति की इस 18वीं बैठक में एशिया की सबसे बड़ी कोयला खदान गेवरा ओपन कास्ट खदान के क्षेत्र विस्तार का प्रस्ताव भी शामिल था, लेकिन इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया। 

इस खदान का संचालन कर रही कोल इंडिया लिमिटेड की क्षेत्रीय इकाई साउथ एस्टर्न कोल लिमिटेड (एसईसीएल) ने प्रस्ताव रखा था कि वह खदान की उत्पादन क्षमता 49 मिलियन टन से बढ़ाकर 70 मिलियन टन करना चाहती है, लेकिन समिति के सदस्य इस प्रस्ताव के पक्ष में नहीं थे। आखिर ऐसा क्यों हुआ, आइए समझते हैं - 

यहां कोयला खदान 1941 से ही बहुत छोटे पैमाने पर संचालित हो गयी थी। 1955 के बाद चाम्पा और कोरबा के बीच रेलवे का नेटवर्क शुरू होने के बाद इस खदान क्षेत्र में बड़े पैमाने पर कोयले के उत्पादन का काम शुरू हुआ।

1980 से यह कोयला भंडारण एसईसीएल के पास है। 2004 में इसे पहली बार 25 मिलियन टन वार्षिक उत्पादन के लिए पर्यावरण स्वीकृति हासिल हुई। इसके बाद चरणबद्ध ढंग से इसकी उत्पादन क्षमता और खनन क्षेत्र में बढ़ोत्तरी की जाती रही। 2009 में इसकी क्षमता 35 मिलियन टन वार्षिक की गयी। 2014 में कोयला खदान की वार्षिक क्षमता 40 मिलियन टन और 2015 में इसे पुन: बढ़ाकर 41 मिलियन टन किया गया।

2017 में इसकी क्षमता 41 मिलियन टन से 49 मिलियन टन किए जाने का प्रस्ताव किया गया। जिसे 21 फरवरी 2018 को 45 मिलियन टन प्रतिवर्ष किए जाने की स्वीकृति तो हासिल हुई लेकिन इसकी अवधि केवल एक वर्ष के लिए ही वैध थी। 28 मार्च 2019 को इस अवधि को एक साल के लिए बढ़ा दिया गया लेकिन उत्पादन क्षमता 45 मिलियन टन ही रही।

2019 में एसईसीएल ने 45 मिलियन टन की क्षमता को 49 मिलियन टन प्रतिवर्ष किए जाने का प्रस्ताव दिया, लेकिन 4 जून 2020 को इसकी उत्पादन क्षमता को बरकरार रखते हुए वैध स्वीकृति की सीमा को अगले 30 वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया।

2021 में पुन: एसईसीएल ने इस खदान की क्षमता और क्षेत्र बढ़ाने के लिए प्रस्ताव दोहराया और सफलता मिली लेकिन इस स्वीकृति के साथ कुछ अतिरिक्त शर्तें भी जोड़ीं गईं। लेकिन 2 सितंबर में फिर इस प्रस्ताव को दोहराया गया, जिसे खारिज कर िदया गया।

उल्लेखनीय है कि सार्वजनिक क्षेत्र की इस कंपनी को उत्पादन क्षमता बढ़ाने और खदान का दायरा बढ़ाने के लिए मिली पर्यावरणीय स्वीकृतियों की प्रक्रिया में महज एक बार ही पर्यावरणीय जन सुनवाई की अनिवार्य प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। यह जन सुनवाई 22 अगस्त 2008 को आयोजित हुई थी जब गेवरा खदान की क्षमता को 25 मिलियन टन से 35 मिलियन टन वार्षिक किया गया था।

पर्यावरणीय व सामाजिक प्रभाव आंकलन से जुड़े अनुबंधों व उनके क्रियान्वयन पर लंबे समय से निगरानी कर रही बिपाशा पॉल का कहना है कि ‘उदारीकरण के बाद से देश भर में इसी तरह खदानों का विस्तार किया जा रहा है। किसी कंपनी द्वारा एक बार उत्पादन शुरू किए जाने के बाद कोई इन पहलुओं को देखता ही नहीं कि जिन शर्तों पर कंपनी को किसी क्षेत्र में काम करने की स्वीकृतियाँ हासिल हुईं हैं वो उन्हें पूरा कर भी नहीं हैं या नहीं’। आम तौर पर कंपनियां जरूरी स्वीकृतियां हासिल करने के लिए  जिम्मेदार संस्थानों को अंधेरे में रखती हैं’।

क्यों प्रस्ताव हुआ खारिज 

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन और इस कोयला खदान से प्रभावित गांववासियों व ग्राम पंचायतों द्वारा 2 सितंबर 2021 को होने वाली विशेषज्ञ आंकलन समिति की इस महत्वपूर्ण बैठक से पहले कई महत्वपूर्ण तथ्य इस समिति के संज्ञान में लाये गए। इनमें मुख्य रूप से चार तथ्य ऐसे हैं जिनसे यह स्पष्ट होता है कि एसईसीएल इस क्षेत्र में किस तरह तयशुदा नियमों व जिम्मेदारियों की अवहेलना करते हुए कोयला उत्पादन कर रही थी।

पहला तथ्य - इस परियोजना से जुड़े कई मुक़द्दमे विभिन्न न्यायालयों में लंबित हैं जिसे कंपनी ने अपने प्रस्ताव में छिपाया है। ऐसे 43 मुक़द्दमों का ब्यौरा समिति को सौंपा गया जो मुआवजे और रोजगार दिये जाने से संबंधित हैं और छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में न्यायाधीन हैं। कंपनी ने महज़ एक ही ऐसे मुक़द्दमे का हवाला मंत्रालय को दिया था। 2006 की पर्यावरणीय प्रभाव आंकलन अधिसूचना के अनुच्छेद 8 के तहत ऐसा किया जाना गैर कानूनी है।

दूसरा तथ्य-  पर्यावरणीय स्वीकृति के अधीन शर्तों का अनुपालन करने में कंपनी की विफलताएं। 2017 से ही इस परियोजना से प्रभावित स्थानीय समुदाय इस समिति को यह बताते आ रहे हैं कि कंपनी द्वारा पर्यावरणीय सुरक्षा के उपायों का पालन नहीं किया जा रहा है। दिलचस्प है कि इस समिति ने खुद ही नवम्बर 2017 में, जब इस कंपनी की उत्पादन क्षमता को 41 मिलियन टन से बढ़ाकर 49 मिलियन टन किए जाने कि स्वीकृति दी थी, तब इस स्थिति का संज्ञान लिया था।

27 नवंबर 2017 को सम्पन्न हुई समिति की बैठक में इस समिति ने पर्यावरण सुरक्षा से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण बिन्दु उठाए थे जिनमें कोयला खदान की वजह से पीएम स्तर (PM वैल्यू) का 10 से ज़्यादा होना बतलाया गया था जिससे इस इलाके की वायु गुणवत्ता पर बेहद हानिकारक प्रभाव देखा गया था।

खदान में विस्फोट करने के लिए प्रयोग किए जा रहे विस्फोटकों को लेकर भी 10 मई 2021 को पर्यावरण स्वीकृति के अधीन जोड़ी गयी विशेष शर्त का अनुपालन भी नहीं किया जाना भी समिति के संज्ञान में लाया गया। आमगांव, इस परियोजना से एक प्रभावित गाँव के लोगों ने कई बार लिखित में यह बताया कि खनन के लिए किए जा रहे विस्फोटों से उनके घरों में दरारें आ गईं हैं’।

इसके अलावा, कोयले के ट्रांसपोर्टेशन से जुड़ी शर्तों में यह विशेष शर्त भी 10 मई 2021 को लगाई गयी थी कि जब तक रेल मार्ग तैयार नहीं हो जाता तब तक सड़क मार्ग से बंद कंटेनर्स के जरिये ही कोयले की ढुलाई की जा सकती है। गाँव वालों की शिकायत है कि सड़क मार्ग से कोयले की ढुलाई के लिए निर्धारित मानकों का पालन नहीं किया जा रहा है। ढुलाई के दौरान कोयले की धूल पूरे इलाके में फैल कर हवा को जहरीला बना रही है। कंपनी आज भी इसी तरह ढुलाई कर रही है।

तीसरा तथ्य- वन संरक्षण कानून, 1980 के अधीन वन स्वीकृति का लंबित होना है। ऐसे में जब परियोजना के विस्तार के लिए अतिरिक्त ज़मीन का अधिग्रहण किया जाए तब वन स्वीकृति हासिल करना कंपनी के लिए अनिवार्य शर्त होता है। इस मामले में कंपनी को 94 हेक्टेयर अतिरिक्त ज़मीन अधिग्रहण किए जाने की जरूरत है। इस प्रस्तावित ज़मीन अधिग्रहण के लिए वन स्वीकृति अभी तक हासिल नहीं है। वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन के मंत्रालय के अधीन परिवेश पोर्टल पर उपलब्ध सूचनाओं के अनुसार यह प्रक्रिया अभी तक लंबित है।

चौथा तथ्य - इस परियोजना के अंतिम उपयोग को लेकर है। किसी भी कोयला खदान से निकलने वाले कोयले का इस्तेमाल अंतत: कहाँ होगा? किस उद्योग के लिए होगा? उस उद्योग और खदान के बीच में कितनी दूरी है? कोयला ढुलाई के लिए किस मार्ग का इस्तेमाल होगा? आदि महत्वपूर्ण जानकारियाँ देना कंपनी के लिए अनिवार्य है। एसईसीएल ने हालांकि बहुत चलताऊ ढंग से अपने प्रस्ताव में यह तो बताया कि इस खदान से निकालने वाले कोयले का इस्तेमाल राष्ट्रीय ताप विद्युत संयंत्र (एनटीपीसी) और ‘अन्य ताप विद्युत संयंत्रों’ के लिए किया जाएगा। लेकिन महज़ इतनी जानकारी नाकाफी है। असल में यह ‘बताने’ से ज़्यादा ‘न बताने’ की चतुराई है। हालांकि राष्ट्रीय ताप विद्युत संयंत्र को कोयले की आपूर्ति करना SECL की ज़िम्मेदारी है लेकिन ‘अन्य ताप विद्युत संयंत्रों’ के लिए कोयले के खनन की इजाजत नहीं दी जा सकती।   

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक मण्डल के सदस्य आलोक शुक्ला इस पूरे मामले पर कहते हैं कि –‘इस परियोजना के विस्तार से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों के सामने आने के बाद विशेषज्ञ आंकलन समिति ने पर्यावरण सुरक्षा को लेकर एक गंभीरता और जिम्मेदाराना रुख अपनाते हुए प्रस्ताव को खारिज कर दिया है।

इस पूरे घटनाक्रम के सबक यह भी हैं कि जब तक देश के संस्थान, स्थानीय नागरिक और पर्यावरण के प्रति सरोकार रखने वाला नागरिक समाज एक साथ मिलकर उन अनियमितताओं को गंभीरता से नहीं लेगा कोयले या किसी अन्य उत्पादन क्षेत्र में संलग्न कंपनियाँ महज़ अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए संस्थानों को आधू-अधूरी जानकारियाँ देकर गुमराह करती रहेंगीं’।