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कोविड-19 महामारी की रोकथाम वाली योजनाओं में पर्यावरण की रक्षा करने में विफल रहे राष्ट्र

हानिकारक जीवाश्म ईंधन पर दी जाने वाली सब्सिडी को हटाकर, पर्यावरण के अनुकूल खेती को प्रोत्साहित करके और कार्बन टैक्स के जरिए वन संरक्षण कार्यक्रमों को मदद की जा सकती है।

By Dayanidhi

On: Wednesday 14 October 2020
 
Photo : Wikimedia commons
Photo : Wikimedia commons Photo : Wikimedia commons

रटगर्स की अगुवाई वाले पेपर के अनुसार, कोविड-19 महामारी ने वैश्विक स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर काफी बुरा प्रभाव डाला है। दुनिया भर में कई सरकारें अब सामान्य होने के लिए रिकवरी पैकेज का ऐलान कर रही हैं। साथ ही यह दशकों पहले पारिस्थितिकी तंत्र और प्रजातियों को हुए नुकसान को भी उबारने का समय है। लेकिन देखा गया है कि अधिकांश देश प्रकृति संबंधी सुधारों के लिए धन खर्च करने से बच रहे हैं।

प्रमुख अध्ययनकर्ता पामेला मैकलेवे ने कहा दरअसल, अमेरिका, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया सहित कुछ देश मौजूदा कानूनों और नियमों को लागू करने में ढील दे रहे हैं, जिनका उद्देश्य प्रकृति की रक्षा करना है। पामेला मैकलेवे, रटगर्स विश्वविद्यालय-न्यू ब्रंसविक में पर्यावरण और जीव विज्ञान, मानव पारिस्थितिकी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।

संयुक्त राष्ट्र में पिछले हफ्ते, 60 से अधिक प्रमुखों ने वर्चुअल माध्यम से शिखर सम्मेलन में चर्चा की और जैव विविधता संकट से निपटने के लिए अपना समर्थन देने का वादा किया। मैकलेवे ने कहा- लेकिन जब हम देखते हैं कि देश क्या कर रहे है उनके पूर्व के बजट और नीतियों को देखते हुए, विशेष रूप से उनके कोविड रिकवरी योजना के बाद, पाया गया कि बहुत कम सरकारें अपना पैसा जैव विविधता को बचाने में लगा रही हैं।

उन्होंने कहा अभी भी प्रकृति और स्वास्थ्य को हानि पहुंचाने वाले कार्यों के लिए बड़ी मात्रा में वित्तीय सहायता दी जा रही हैं, जैसे कि जीवाश्म ईंधन उत्पादन या बुनियादी ढांचे को बनाने के लिए सब्सिडी देना आदि, ये सभी पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाएगा। केवल कुछ ही देश हैं जो गंभीर तरीके से जैव विविधता संकट को उबारने में लगे हुए हैं।

तीन महाद्वीपों के कई संस्थानों के अर्थशास्त्रियों, मानवविज्ञानी और पर्यावरण वैज्ञानिकों ने वन अर्थ नामक पत्रिका में एक पेपर प्रकाशित किया है। इस पेपर में दुनिया भर में आर्थिक प्रणालियों में हो रहे परिवर्तन के बारे में बताया गया है। परिवर्तन जिसमें प्रोत्साहन, नियम, राजकोषीय नीति और रोजगार कार्यक्रम शामिल हैं। जो कि जैव विविधता को नुकसान पहुंचा पहुंचाने वाली गतिविधियों में शामिल न होने और पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने का समर्थन करते हैं।

जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं पर वैश्विक मूल्यांकन रिपोर्ट 2019- इंटरगवर्नमेंटल साइंस पालिसी प्लेटफार्म आन बायोडायवर्सिटी एंड इकोसिस्टम सर्विसेज (आईपीबीईएस) के अनुसार कार्रवाई न होने के कारण आज लगभग 1 मिलियन प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं, कई दशकों के बाद प्रजातियों के विलुप्त होने की वैश्विक दर में यह तेजी देखी गई है। 

इस नए पेपर में कहा गया है कि सरकारों को अपने कार्यो और रिकवरी योजनाओं में प्रकृति को प्राथमिकता देनी चाहिए। तत्काल रोजगार देने से वैश्विक अर्थव्यवस्था में लंबे समय तक परिवर्तन हो सकता है। उदाहरण के लिए हानिकारक जीवाश्म ईंधन को दी जाने वाली सब्सिडी को हटाकर अन्य को देना, जिनमें पर्यावरण के अनुकूल खेती को प्रोत्साहित करना, कार्बन टैक्स जो वन संरक्षण कार्यक्रमों को मदद कर सकते हैं और ऐसे कार्यक्रमों को बढ़ावा देना जो पारिस्थितिक बहाली और पर्यावरण के अनुकूल बुनियादी ढांचे पर ध्यान केंद्रित करते हों।

जबकि कई वैज्ञानिकों और राजनेताओं ने कोविड-19 रिकवरी के तहत केवल कार्बन को कम करने का बढ़ावा दिया है। लेकिन आर्थिक योजनाओं में जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र को कैसे शामिल किया जाए, इस पर बहुत कम ध्यान दिया गया है। प्रकृति से संबंधित कार्यों की चर्चा ने बड़े पैमाने पर वन्यजीव जिन्हें बाजारों में बेचा जाता था, उनको नए वायरस के स्रोत होने की आशंका में बंद करने, संरक्षित प्राकृतिक क्षेत्रों का विस्तार करने या उष्णकटिबंधीय वनों की कटाई को कम करने पर ध्यान केंद्रित किया है।

अमेरिका और चीन सहित कई देशों ने जैव विविधता या पारिस्थितिक तंत्र को बचाने के लिए कोई भी प्रोत्साहन राशि आवंटित नहीं की है। केवल यूरोपीय संघ और सदस्य देश कोविड योजना के बाद जैव विविधता में पर्याप्त वित्तीय निवेश कर रहे हैं। न्यूजीलैंड, भारत और पाकिस्तान सहित अन्य राष्ट्र, प्रकृति आधारित नौकरियों में पारिस्थितिक बहाली जैसे निवेश का प्रस्ताव कर रहे हैं, लेकिन यह बहुत कम हैं। मैकलेवे ने कहा कि सरकारें अपने कथित वादों से कमतर होती जा रही हैं और उन्हें तुरंत और अधिक करने की जरूरत है।