Sign up for our weekly newsletter

मीठा जहर: शहद में मिलावट के काले कारोबार का खुलासा

सीएसई की सबसे बड़ी पड़ताल: शहद के लगभग सभी ब्रांड में बड़े पैमाने पर मिलाई जा रही है चीनी

By Amit Khurana, Arnab Pratim Dutta, Sonal Dhingra

On: Wednesday 02 December 2020
 

यह कहानी उत्तर भारत में सरसों के खेतों से शुरू होती है जहां मधुमक्खी पालक शहद के अगले मौसम की तैयारी कर रहे हैं। सरसों के खेतों में जब फूल आते हैं, तब मधुमक्खी मकरंद चूसकर उसे शहद के रूप में हमें देती है। इस शहद का उपयोग करके हमें बहुत से फायदे मिलते हैं। हमें खबर मिली थी इस क्षेत्र और अन्य इलाकों के मधुमक्खी पालक गहरे संकट में हैं। पिछले कुछ सालों में शहद के भाव लगातार गिरने से हालात इतने बुरे हो गए हैं कि वे अपना कारोबार छोड़ने की स्थिति में पहुंच गए हैं। शहद का कारोबार अब उनके लिए फायदे का सौदा नहीं रह गया है। कच्ची शहद के भाव में ऐसी गिरावट पहले कभी नहीं देखी गई। भाव आखिर क्यों गिर रहे हैं? वह भी ऐसे समय में जब शहद की बिक्री लगातार बढ़ रही है और कोविड-19 के संक्रमण के खतरे के बीच अधिक से अधिक लोग एंटी माइक्रोबियल और एंटी इन्फ्लेमेटरी गुणों के कारण इसका अधिक सेवन कर रहे हैं। ऐसे समय में जब एक गिलास पानी में शहद मिलाकर नीबू के साथ पीना लाखों परिवारों के बीच सामान्य हो गया है, तब शहद का भाव गिरना चौंकाता है।

इसके अलावा हम यह भी जानते हैं कि केंद्र सरकार मधुमक्खी पालकों के लिए बड़े स्तर पर कार्यक्रम चला रही है। उनके जीवनयापन और मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देने के लिए सरकार 500 करोड़ रुपए खर्च कर रही है। ऐसे समय में इस पेशे से मोहभंग की आखिर क्या वजह हो सकती है?

डाउन टू अर्थ ने जब इन राज्यों की यात्रा की, तब हमें बार-बार मधुमक्खी पालकों की दुखभरी कहानियां सुनने को मिलीं। एक के बाद एक मधुमक्खी पालक ने यही कहा, “2014-15 तक हमें शहद का अच्छा मूल्य मिल रहा था। इसके बाद गिरावट का सिलसिला शुरू हो गया। शहद का भाव पहले 150 रुपए प्रति किलो था। अब यह 60-70 रुपए के करीब पहुंच गया है।” राजस्थान के भरतपुर जिले में कच्ची शहद का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है। यहां के मधुमक्खी पालक राम गोपाल बताते हैं, “मैंने मधुमक्खी के बॉक्स दोगुने कर दिए हैं, लेकिन वर्तमान में आमदनी पांच साल पहले से भी कम है। अब मैं यह काम छोड़ने की सोच रहा हूं।” उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के गंगो गांव के अमरनाथ भंवर सिंह कहते हैं, “फायदा कम होने पर मैंने मधुमक्खी पालन का काम छोड़ दिया है।” उत्तर प्रदेश के रामपुर में मधुमक्खी पालक और व्यापारी संजय नेगी बताते हैं कि मधुमक्खी पालक का जीवन तभी तब चल सकता है जब शहद का मूल्य कम से कम 120 रुपए प्रति किलो हो, लेकिन इस वक्त मूल्य लाभकारी नहीं है।



कुछ सुराग

हम समझ नहीं पा रहे थे कि हमसे क्या छूट रहा है? फिर हम शहद के बाजार को समझने के लिए छोटे-बड़े व्यापारियों के पास पहुंचे। उन्होंने मूल्य में गिरावट की बात तो मानी लेकिन इसके कारणों को खुलकर नहीं बताया। सबका यही कहना था, “सुनने में आया है कि शहद में शुगर सिरप (चीनी) मिलाया जा रहा है। चावल व अन्य फसलों से बना यह सिरप प्रयोगशाला की किसी भी जांच को पास कर सकता है। कंपनियां थोड़े से शहद में शुगर सिरप मिलाकर मोटा मुनाफा कमा रही हैं।” यह काम कौन कर रहा है, इसकी उन्हें जानकारी नहीं है। उन्होंने बताया, सुनने में आया है कि चीन की कंपनियों ने सिरप बनाने की इस तकनीक की फैक्टरियां भारत में स्थापित की हैं। सहारनपुर के एक प्रमुख व्यापारी ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर खुलासा किया कि उसने सुना है कि चीन की कंपनियों ने उत्तराखंड के जसपुर, बिजनौर (उत्तर प्रदेश) के धामपुर और पंजाब के बटाला में इस तकनीक की फैक्टरियां लगाई हैं। रामपुर के एक व्यापारी ने इसकी पुष्टि की लेकिन इससे अधिक कुछ नहीं बताया।

हम सोच रहे थे कि कहीं कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर है। लेकिन क्या? इस व्यापार की अगर तह में भी जाया जाए तो इससे जुड़े व्यवसायी कह सकते हैं कि शुगर सिरप का उत्पादन कन्फेक्शनरी और अन्य उद्योगों के लिए किया जा रहा है। यह वैध भी है। इसी के साथ कहानी पर लगभग विराम लग जाता।

 

मिलावट का कारोबार

मिलावट पकड़ने के लिए जैसे-जैसे परीक्षण विकसित हो रहे हैं, वैस-वैसे उद्योग भी मिलावट के नए रास्ते खोज रहे हैं

  • शहद दुनिया का ऐसा खाद्य उत्पाद है जिसमें सबसे अधिक मिलावट की जाती है
  • प्रयोगशाला के परीक्षणों को मात देने के लिए मिलावट का कारोबार समय के साथ लगातार विकसित हुआ है
  • शहद की धोखाधड़ी दुनियाभर मंे चिंता का विषय है
  • भारत में सरकार को पता है कि शहद के कारोबार में कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर है लेकिन वह इस बारे मंे किसी को नहीं बता रही
  • शहद की शुद्धता के लिए मानकों में बार-बार बदलाव हुए हैं
  • सरकार ने निर्यात की जाने वाली शहद की अतिरिक्त और उन्नत जांच को अनिवार्य बनाया है

खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के कोडेक्स एलिमेंटेरियस कमिशन ने वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य शहद की परिभाषा दी है। इसके अनुसार, “शहद मधुमक्खियों द्वारा तैयार प्राकृतिक मिठास वाला तत्व है जो पौधों के परागण से अथवा पौधों के जीवित अंगों को अलग करके अथवा जीवित पौधों को चूसने वाले कीटों से हासिल होता है। मधुमक्खी इसे जमा, ट्रांसफॉर्म, डिहाइड्रेट और भंडारण कर छत्ते में इसे पकाती और परिपक्व करती है।” इसलिए अगर शहद में शुगर यानी चीनी की मिलावट कर दी जाए तो वह शहद नहीं मानी जाएगी। ऐसे में सवाल उठता है कि जो शहद हम खा रहे हैं, क्या उसमें शुगर मिली हुई है?

ऐसा लगता है कि हमारे खाद्य नियामक भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) को भी कुछ गड़बड़ी का अंदेशा जरूर है। वही वजह है कि पिछले कुछ सालों में उसने शहद के गुणवत्ता मानकों को एक नहीं बल्कि दो बार संशोधित किया है और गुणवत्ता के संबंध में उद्योगों को एक के बाद एक दिशानिर्देश भेजे हैं। हर बार बदलाव एक न एक शुगर की मिलावट को पकड़ने के लिए किया गया। एफएसएसएआई ने शुगर सिरप के आयात के नियमन का आदेश भी जारी किया है क्योंकि उसे अंदेशा था कि इसका इस्तेमाल मिलावट में किया जाता है। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि या तो एफएसएसआई को इस गोरखधंधे के बारे में पता है और उसने हमें यानी उपभोक्ताओं को अंधेरे में रखा है या उसे लगता है कि वह शहद की धोखाधड़ी का पता लगाकर उसे रोक देगा।

शहद एक ऐसा तत्व है जिसमें दुनियाभर में मिलावट होती है। खाद्य उत्पादन से जुड़े लोग इस बात को अच्छी तरह जानते हैं। यह बात भी सब जानते हैं कि जब भी नियामक मिलावट के कारणों का पता लगाने के करीब पहुंचते हैं, तो मिलावट के नए रास्ते खोज लिए जाते हैं। शहद की धोखाधड़ी एक उम्दा उद्यम बन चुका है। हनीगेट की कहानी विश्वव्यापी है (देखें “अंतरराष्ट्रीय गोरखधंधा”,)।



कई कदम आगे और एक बड़ा कदम पीछे

शहद के गुणवत्ता मानक 60 साल तक स्थिर रहे हैं। एफएसएसएआई ने दिसंबर 2014 में शहद के मानकों में एंटीबायोटिक की सीमा निर्धारित की, तब जाकर इसमें बदलाव हुआ। यह कदम 2010 में दिल्ली स्थित गैर लाभकारी संगठन सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की रिपोर्ट के बाद उठाया गया। यह रिपोर्ट शहद में एंटीबायोटिक की मौजूदगी पर थी। इसमें सीएसई ने शहद के लोकप्रिय ब्रांड का अपनी प्रयोगशाला में परीक्षण किया था। सीएसई ने तब यह भी बताया था कि घरेलू उपभोग के लिए बेचे जा रहे डिब्बाबंद शहद में एंटीबायोटिक की सीमा का कोई मानक निर्धारित नहीं है, जबकि निर्यात किए जाने वाले शहद में यह सीमा तय थी।

2010 में एफएसएसएआई ने एडवाइजरी जारी कर स्पष्ट किया कि शहद में कीटनाशक (पेस्टीसाइड) और एंटीबायोटिक की अनुमति नहीं है। 2014 में शहद के मानक संशोधित किए गए और एंटीबायोटिक की स्वीकार्य सीमा तय की गई। यह तय कर दिया गया कि शहद को गुणवत्ता मानक पूरा करने के लिए कितना एंटीबायोटिक आवश्यक है। अब मधुमक्खी पालकों या शहद उत्पादकों को यह सुनिश्चित करना था कि वे बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए एंटीबायोटिक का इस्तेमाल नहीं करेंगे। अथवा वे इसका इस्तेमाल करते भी हैं तो सावधानीपूर्वक प्रबंधन करना होगा। यह सीमा इसलिए निर्धारित की गई क्योंकि भारत और दुनियाभर में चिंता जाहिर की जा रही है कि हमारे शरीर को संक्रमित करने वाले बैक्टीरिया में एंटीबायोटिक रजिस्टेंस (प्रतिरोधक क्षमता) बढ़ रहा है।

ऐसा लगता है कि शहद की गुणवत्ता में सुधार के लिए दिसंबर 2014 के मानकों से शहद प्रोसेसिंग उद्योग को झटका लगा। उद्योग को अब निर्धारित सीमा के आसपास रहकर काम जारी करने के रास्ते खोजने थे। उनके लिए इससे आसान रास्ता क्या हो सकता था कि शहद में थोड़ा शुगर सिरप मिलाकर इसे “हल्का” कर दिया जाए। यह आसान भी था और प्रभावी भी।

हम पुख्ता तौर पर नहीं कह सकते थे कि ऐसा हो रहा है लेकिन हम यह जानते हैं कि 2017 में एफएसएसएआई ने एक ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया था। इनमें शहद के मानकों में मामूली परिवर्तन को लेकर आम जनता से रायशुमारी की गई थी। इस ड्राफ्ट नोटिफिकेशन में खाद्य नियामक ने पहली बार शहद में गन्ना, चावल या चुकंदर जैसी फसलों से बनी शुगर का पता लगाने के लिए जांच को शामिल किया था। शहद में “विदेशी” शुगर की मिलावट का पता लगाने के लिए ये परीक्षण शामिल किए गए थे। भारत में ड्राफ्ट इसलिए भी जारी किया गया था ताकि दुनियाभर में फैल चुके मिलावट के कारोबार पर शिकंजा कसा जा सके।



दुनिया में शहद के परीक्षण की शुरुआत सी4 शुगर सिरप का पता लगाने से हुई थी। यह सिरप मक्का, गन्ना जैसे पौधों से प्राप्त होता है जो फोटोसिंथेटिक (प्रकाश संश्लेषण) पाथवे का प्रयोग करते हैं। इसे सी4 के नाम से जाना जाता है। वैज्ञानिकों ने इस विश्लेषणात्मक विधि को सी4 पौधों से प्राप्त होने वाले शुगर को शहद से अलग करने के लिए विकसित किया था। 2017 के ड्राफ्ट में इस टेस्ट को शामिल किया गया था।

लेकिन दुनियाभर में मिलावट का कारोबार प्रयोगशाला के परीक्षणों को मात देने के एकमात्र उद्देश्य से विकसित हुआ है। यानी इस काम में लगा उद्योग मिलावट में इस्तेमाल होने वाले शुगर को बदलता रहता है। इसके लिए दूसरी श्रेणी के पौधों का इस्तेमाल किया जाता है। ये वे पौधे होते हैं जो सी3 नामक फोटोसिंथेटिक पाथवे का इस्तेमाल करते हैं। धान और चुकंदर के पौधे इस श्रेणी में आते हैं। इसके बाद प्रयोगशालाओं ने इस मिलावट को पकड़ने के लिए आइसोटोप परीक्षण शुरू किए।

ऐसी ही परीक्षण हैं स्पेशल मार्कर फॉर राइस सिरप (एसएमआर) और ट्रेस मार्कर फॉर राइस सिरप (टीएमआर)। अन्य महत्वपूर्ण पैरामीटर है विदेशी ओलिगोसेकेराइड्स जो राइस सिरप जैसे स्टार्च आधारित शुगर की मिलावट को पकड़ने में मदद करता है। 2017 के ड्राफ्ट नोटिफिकेशन में एसएमआर, टीएमआर और ओलिगोसेकेराइड्स के लिए टेस्ट शामिल थे ताकि “विदेशी” नॉन-हनी सी3 शुगर का पता लगाया जा सके।

2018 के अंतिम मानकों में इन पैरामीटरों को अधिसूचित किया गया। यह कहा जा सकता है कि भारत ने जटिल टेस्टिंग प्रोटोकॉल को अपना लिया ताकि जिस शहद का हम सेवन पसंद करते हैं, वह शुद्ध व स्वास्थ्यवर्धक रहे।

इसके बाद अक्टूबर 2019 में बिना किसी कारण एफएसएसएआई ने पोलन काउंट्स (पराग की गणना) के पैरामीटर को बदलने और एसएमआर, टीएमआर व ओलिगोसेकेराइड्स को हटाने के लिए दिशानिर्देश जारी कर दिए। ये पैरामीटर सी3 पौधों से शहद में होने वाली राइस सिरप जैसी मिलावट को पकड़ने के लिए थे। यह अब तक स्पष्ट नहीं हो पाया है कि आखिर एफएसएसएआई किन कारणों से अपने मानकों को कमजोर करने के लिए बाध्य हुआ। 1 जुलाई 2020 तक मानकों को फिर से संशोधित कर दिया गया और कुछ पैरामीटरों को पुन: स्थापित कर दिया गया (देखें “तेजी से बदलते मानक”)।

हालांकि 2018 के मानकों में दो बड़े बदलाव कर दिए गए पहला, टीएमआर परीक्षण को हटा दिया गया। यह परीक्षण जब एसएमआर के साथ किया जाता है, तब मिलावट को बेहतर तरीके से पकड़ा जा सकता है। इससे राइस सिरप से होने वाली मिलावट को पकड़ने में बड़ी मदद मिलती है। यह अब भी स्पष्ट नहीं है कि इस जांच को क्यों हटा दिया गया है। दूसरा, पोलन काउंट्स कम कर दिया गया है। 2017 के ड्राफ्ट नोटिफिकेशन में यह 50,000 था। 2018 में इसे घटाकर 25,000 और 2020 में 5,000 कर दिया गया। हालांकि शहद में पोलन काउंट्स की गणना और इससे शहद की गुणवत्ता व मिलावट निर्धारित करना विवाद का मुद्दा है। (देखें “पोलन की गणना”)

वर्ष 2017 से 2020 तक मानकों पर चली खींचतान बताती है कि एफएसएसएआई मिलावट रोकने के लिए बने अपने गुणवत्ता मानकों पर ही सहमति नहीं बना पा रहा है। यह भी साफ है कि कुछ मापदंडों को बिना वजह कमजोर कर दिया गया है। जनता को इसकी कोई तर्कसंगत वजह नहीं बताई गई है।

गोल्डन सिरप से एनएमआर

यह साफ है कि मिलावट की कहानी का अभी अंत नहीं हुआ है। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि भारत का खाद्य नियामक संकेत दे रहा है कि एक नए किस्म की मिलावट हो रही है।

दिसंबर 2019 और फिर जून 2020 में एफएसएसएआई ने राज्य के खाद्य सुरक्षा आयुक्तों को निगरानी, सैंपलिंग और निरीक्षण करने को कहा जिससे गोल्डन सिरप, इनवर्ट शुगर या राइस सिरप का शहद की मिलावट में दुरुपयोग न हो पाए।

20 मई 2020 को एफएसएसएआई ने गोल्डन सिरप, इनवर्ट शुगर (ग्लूकोज और फ्रुक्टोज का मिश्रण जो सुक्रोज यानी चीनी को पानी में उबालकर बनाया जाता है) और राइस सिरप के आयात के संबंध में आदेश जारी किया। यह आदेश बताता है कि एफएसएसएआई को मालूम है कि “कभी-कभी इन सिरप का इस्तेमाल शहद बनाने में किया जाता है क्योंकि इनकी लागत कम आती है, इनमें समान गुण होते हैं और ये आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं।” आदेश में कहा गया कि गोल्डन सिरप, इनवर्ट शुगर और राइस सिरप का भारत में आयात करने वाले सभी आयातकों और खाद्य बिजनेस ऑपरेटरों को जरूरी दस्तावेज जमा करने होंगे। इसके उत्पादकों की जानकारी देने के साथ बताना होगा कि इन सिरप का अंतिम इस्तेमाल क्या होगा और किसे आपूर्ति की जाएगी।

डाउन टू अर्थ ने 1 सितंबर को एफएसएसएआई के इंपोर्ट डिवीजन में सूचना का अधिकार (आरटीआई) आवेदन दाखिल कर आदेश के संबंध में उद्योगों से प्राप्त सूचना, साथ ही आयातित शुगर सिरप में मिलावट रोकने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी मांगी। जवाब में एफएसएसएआई ने कहा कि उसने आवेदन दूसरे डिवीजन में भेज दिया है लेकिन यह नहीं बताया कि कौन-सा डिवीजन इससे संबंधित है। स्पष्ट तौर पर यह मुद्दे से भटकाने की रणनीति थी।

बात यहीं खत्म नहीं होती। 28 फरवरी 2020 को एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन काउंसिल (ईआईसी) ने सभी शहद निर्यातकों को कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएसए) में निर्यात होने वाली सभी शहद की न्यूक्लियर रेजोनेंस स्पेक्ट्रोस्कॉपी (एनएमआर) टेस्टिंग अनिवार्य रूप से करानी होगी। यह कदम शहद में मिलावट को पकड़ने और उसकी मौलिकता/प्रामाणिकता की जांच के लिए उठाया गया था। यह टेस्टिंग 1 अगस्त 2020 से प्रभावी होनी थी। काउंसिल ने सभी एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन एजेंसियों (ईआईए) के अधिकारियों को निर्धारित प्रोटोकॉल के तहत जांच के लिए नमूने एकत्र करने का निर्देश दिया। इन नमूनों की जांच मुंबई स्थित उसकी प्रयोगशाला में की जानी थी, जहां यह जांच संभव है।

आखिर ऐसा करने की जरूरत क्यों पड़ी और ये एनएमआर क्या है? दरअसल, शहद में मिलावट को पकड़ने के लिए एनएमआर जांच को स्वर्णिम मानक के रूप में देखा जाता है। यह जांच खासतौर पर नमूनों में शुगर सिरप की मिलावट पता लगाने के लिए की जाती है। एनएमआर को एक्सरे और खून की जांच और मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिन (एमआरआई) में अंतर के रूप में भी देखा जा सकता है, जिनका प्रयोग शरीर में गंभीर बीमारियों का पता लगाने के लिए किया जाता है। यह तकनीक एमआरआई से मिलती है जो इमेजिंग के जरिए शहद और इसके अवयवों की सच्ची तस्वीर पेश करती है। इसके बाद शहद के स्रोत और प्रामाणिकता दोनों की जानकारी मिल जाती है। भारत में डाबर हनी और सफोला जैसे ब्रांड अपने विज्ञापनों में दावा करते हैं कि वे शहद की शुद्धता को सुनिश्चित करने के लिए एनएमआर तकनीक का इस्तेमाल करते हैं।

एनएमआर तकनीक को एक जर्मन कंपनी ने विकसित किया है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सरकारें शहद में मिलावट और इसके उद्गम का पता लगाने के लिए इसका इस्तेमाल कर रही हैं। यह भी साफ है कि बहुत जल्द यह तकनीक भी बेकार हो जाएगी क्योंकि मिलावट के कारोबार में शामिल उद्योग इसका तोड़ भी निकाल लेगा।

भारत सरकार द्वारा एनएमआर टेस्ट कराने के लिए निर्यातकों को दिया निर्देश बताता है कि सरकार को भी संदेह है या वह जानती है कि शहद में मिलावट हो रही है। और यह मिलावट सी3 और सी4 जांच में पकड़ी नहीं जा रही है। इसके बाद भी अतिरिक्त जांच की जरूरत पड़ती है। एनएमआर जांच में यह सुनिश्चित किया जाता है कि शहद मिलावटी न हो।

यह कैसी मिलावट है जो शुगर सिरप के टेस्ट पास कर जाती है? हमारे मन में अगला सवाल यही था।

तेजी से बदलते मानक

शहद के मानकों में जल्दी-जल्दी हुए ये बदलाव बताते हैं कि कुछ न कुछ तो छुपाने की कोशिश की जा रही है

2010
सीएसई की प्रयोगशाला ने शहद में एंटीबायोटिक का पता लगाया

2014
एंटीबायोटिक अवशेषों की सीमा का निर्धारण व शहद मानकों के लिए एफएसएसएआई का संशोधन

2017
एफएसएसएआई का मसौदा मानक, जिसमें गन्ने व राइस सिरप का पता लगाने के लिए परीक्षण शामिल हैं (सी3 व सी4 शुगर)

2018
एफएसएसएआई ने कुछ मामूली परिवर्तनों के साथ मानकों को अधिसूचित किया

2019
एफएसएसएआई ने शहद में राइस सिरप और अन्य मिलावट का पता लगाने वाले मुख्य मानदंडों जैसे एसएमआर, टीएमआर और विदेशी ओलिगोसेकेराइड्स जैसे प्रमुख मापदंडों को पलट दिया

दिसंबर 2019 और जून 2020
एफएसएसआई ने राज्य के खाद्य आयुक्तों को सूचित किया कि शुगर सिरप का शहद की मिलावट में इस्तेमाल हो रहा है और इसकी नियमित जांच की जाए

फरवरी 2020
वाणिज्य मंत्रालय एनएमआर का उपयोग करके निर्यात होने वाली शहद की जांच अनिवार्य बनाता है। ईआईसी इस जांच के लिए प्रयोगशाला स्थापित करती है

मई 2020
एफएसएसएआई कहता है कि उसे गोल्डन सिरप, इनवर्ट शुगर सिरप और राइस सिरप का उपयोग करके शहद में की जा रही मिलावट के बारे में बताया गया है। उसने आयातकों को पंजीकरण कराने और आयातित उत्पादों के उपयोग के बारे में सूचित करने को कहा

जुलाई 2020
एफएसएसएआई ने मुख्य मापदंडों को बहाल किया लेकिन राइस सिरप का पता लगाने के लिए टीएमआर को नहीं। 2020 के मानक जारी किए।

पोलन की गणना

राष्ट्रीय मधुमक्खी बोर्ड के पूर्व कार्यकारी निदेशक योगेश्वर सिंह ने डाउन टू अर्थ को बताया कि उन्होंने पिछले साल नवंबर में आर्थिक सलाहकार परिषद एवं मधुमक्खी पालन विकास समिति को पत्र लिखकर आगाह किया था कि “एफएसएसएआई ने पोलन संख्या को कम करके मिलावट और राइस व कॉर्न सिरप की शहद के रूप में बिक्री को वैध कर दिया है। इस कारण शहद के प्रसंस्करण से जुड़े लोग उपभोक्ताओं के साथ खुलेआम धोखाधड़ी कर रहे हैं।”

सरकार ने इस पर सहमति नहीं जताई। इस साल फरवरी के लोकसभा में पूछे एक प्रश्न के उत्तर में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने कहा, “एफएसएसएआई ने सूचित किया है कि पोलन संख्या में बदलाव भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) और केंद्रीय मधुमक्खी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान (सीबीआरटीआई) के वैज्ञानिकों के सुझावों के आधार किया गया है। इससे भारतीय शहद में पोलन संख्या की सही तस्वीर पता चलती है।”

सीबीआरटीआई के डॉ़ लक्ष्मी राव ने डाउन टू अर्थ से हुई बातचीत में बताया कि संस्थान ने 5,000 प्रति ग्राम पोलन की सिफारिश की थी। यह सिफारिश भारत और विदेश में किए गए अध्ययन पर आधारित थी जिसमें कहा गया है कि पोलन संख्या कुल शहद में कम से कम 0.01 प्रतिशत यानी 5,000 प्रति ग्राम होनी चाहिए। हालांकि वैश्विक स्तर पर पोलन को शहद की गुणवत्ता का पैमाना नहीं माना गया है। इसके बावजूद पोलन से देशों को यह जानकारी मिल जाती है कि शहद का स्रोत क्या है। पश्चिमी देशों में शहद में मिलावट के गोरखधंधे में शामिल एक वर्ग शहद की गलत लेबलिंग कर रहा है। उसका कहना है कि यह संयुक्त राज्य से आ रहा है लेकिन वास्तव में यह दूसरे देशों से आ रहा है। पोलन से शहद की उत्पत्ति पता चलती है। यह एक प्रकार से फिंगरप्रिंट जैसा है।

कोडेक्स एलिमेंटेरियस स्टैंडर्ड के अनुसार, “पोलन या शहद के अन्य घटक तब तक नहीं हटाए जा सकते जब तक विदेशी जैविक और अजैविक घटक हटाना अनिवार्य न हो। इस तरीके से फिल्टर होने वाली शहद पोलन हटाने का नतीजा है। इस शहद को फिल्टर्ड शहद कहा जाना चाहिए।”

पोलन की संख्या शहद के अलग-अलग प्रकारों में भिन्न होती है। उदाहरण के लिए सरसों, लीची या एक फूल अथवा विविध फूलों से प्राप्त शहद में यह भिन्न हो सकती है। इसके अलावा कुछ मामलों में मिलावट पोलन मिलाकर भी जाती है ताकि शहद की उत्पत्ति के स्रोत में छेड़छाड़ की जा सके। इसलिए पोलन कम करके मिलावट तो हो सकती है लेकिन पोलन में वृद्धि करके शहद के मानकों या स्थिति में सुधार नहीं किया जा सकता।

इससे स्पष्ट होता है कि शहद को खाना भले ही आसान हो लेकिन इसका व्यवसाय कतई आसान नहीं है।


चीन की मिलीभगत का सुराग

आयातित शुगर की पड़ताल जिसका इस्तेमाल शहद में मिलावट के लिए होता है

  • एफएसएसएआई का मिलावट में इस्तेमाल होने वाले गोल्डन सिरप, इनवर्ट सिरप और राइस सिरप के संबंध मंे दिया गया निर्देश किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा
  • चीन की अलीबाबा जैसी व्यापारिक वेबसाइटें विज्ञापन में दावा करती हैं कि फ्रुक्टोज सिरप प्रयोगशाला के परीक्षणों को बाईपास कर सकता है
  • कुछ कंपनियां दावा करती हैं कि फ्रुक्टोज सिरप सी3 और सी4 परीक्षणों पर भी पास हो सकता है, भारत में इनका निर्यात भी होता है

शहद में  मिलावट की जांच के दौरान हमें दो अहम सुराग मिले। पहला, मधुमक्खी पालकों को उनके शहद की उचित कीमत नहीं मिल रही है। इससे शहद में शुगर सिरप की मिलावट की आशंका को बल मिलता है और इसीलिए कच्चे शहद की मांग गिर रही है। दूसरा, सरकार को इस मिलावट का कुछ अंदाजा तो है क्योंकि उसने न केवल चावल अथवा मकई सिरप का पता लगाने वाले कुछ टेस्ट शुरू किए हैं, बल्कि शुगर सिरप का पता लगाने के लिए भी टेस्ट करने को कहा है। शहद के निर्यात से संबंधित मानकों से इसका पता नहीं चल पाता है।

अब हमारी जांच के दौरान अगला सवाल यह उठा कि इस सिरप में क्या है? इसे कौन बनाता है? और ये कहां से आता है? हमें एफएसएसएआई द्वारा मई 2020 में जारी निर्देशों से सुराग मिला जिसमें कहा गया था कि भारत में आ रहे “गोल्डन सिरप, इनवर्ट शुगर सिरप, राइस सिरप” की जांच जरूरी है क्योंकि इनका इस्तेमाल मिलावट में हो सकता है। अत: हमने इन सिरप की खोज शुरू की। हमें लगा था कि यह खोज आसान होगी। लेकिन जब हमने केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के निर्यात-आयात डेटाबेस की जांच की तो इनमें से दो नाम- राइस सिरप और गोल्डन सिरप नहीं मिले। देश में आयात किए गए प्रत्येक उत्पाद में हारमोनाइज्ड सिस्टम (एचएस) कोड होता है जिसमें उस उत्पाद का वर्णन होता है। इन सिरपों का कोई कोड नहीं था। ऐसा लगा मानों हमारी जांच का एक और सिरा यहां आकर खत्म हो गया हो।

हमने यह भी पाया कि “इनवर्ट शुगर सिरप” नामक उत्पाद का एचएस कोड था, लेकिन जब हमने इसकी जांच को तो पता चला कि आयात की मात्रा काफी कम थी। 2017-18 में यह केवल 1,300 मीट्रिक टन और 2018-19 में 2,500 मीट्रिक टन आयात किया गया था। शहद में बड़े पैमाने पर मिलावट करने के लिए यह मात्रा पर्याप्त नहीं थी। इसी के साथ एफएसएसएआई से मिला यह सुराग हमें किसी अंजाम तक पहुंचाने में विफल रहा।



इसके बाद भी हमने अपनी खोज जारी रखी और चीन के विक्रेताओं की वेबसाइटों को बारीकी से देखने का निर्णय लिया। हमने पाया कि अलीबाबा, ओकेकेम, ट्रेडव्हील जैसे कुछ चीन के पोर्टल सिरप बेच रहे थे और उनका दावा था कि ये सिरप शहद में मिलावट की जांच करने वाले परीक्षण जैसे सी3, सी4, टीएमआर, एसएमआर, ओलिगोसेकेराइड्स और कुछ मामलों में एनएमआर भी पास कर सकते थे। ये सिरप आमतौर पर “फ्रुक्टोज सिरप (एफ55/ एफ42)”, “हनी ब्लेंड सिरप”, “फ्रुक्टोज राइस सिरप फॉर हनी”, “टैपिओका फ्रुक्टोज सिरप”, “गोल्डन सिरप फ्रुक्टोज सिरप”, “गोल्डन फ्रुक्टोज ग्लूकोज सिरप” जैसे नामों के साथ बेचे जा रहे हैं।

इन वेबसाइटों पर उत्पादों के नामों में फ्रुक्टोज और ग्लूकोज शब्द के बार-बार उपयोग को देखते हुए हमने चीन से इन वस्तुओं के आयात की जांच का फैसला लिया। भारत सरकार के वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के निर्यात-आयात डेटाबेस से पता चला कि 2014-15 के बाद से लगभग नौ अन्य देशों ने नियमित रूप से भारत में फ्रुक्टोज सिरप का निर्यात किया, लेकिन चीन एकमात्र ऐसा देश है, जहां से यह थोक में आयात किया जाता है। वर्तमान में भारत में चीन से आयातित फ्रुक्टोज सिरप की मात्रा सबसे अधिक है (देखें “अनोखा संबंध”,)। 2014-15 के बाद से हर साल आयात की औसत मात्रा 10,000 मीट्रिक टन से अधिक रही है। इसी तरह, भारत में आयात होने वाला सारा ग्लूकोज सिरप 2016-17 से ही चीन से आ रहा है और 2017-18 में आयातित मात्रा अचानक बढ़कर 4,300 मीट्रिक टन तक पहुंच गई थी (देखें “चीनी आयात”,) ।



ये आंकड़े और रुझान असामान्य लग रहे थे लेकिन ये विक्रेता कौन थे, इस बारे में हमें और अधिक जानकारी की आवश्यकता थी। इन मिलावटी सामानों को वेबसाइटों पर बेचने वाली कंपनियों और भारत में उनके निर्यातकों के बीच का संबंध ढूंढना हमारी प्राथमिकता बन गया।

इसलिए हमने गोपनीयता की शर्त पर एक ट्रेड डेटाबेस खरीदा। यह हमने एक ऐसी कंपनी से लिया जो प्रत्येक आयातित शिपमेंट के आंकड़े संकलित करती है। इस कंपनी से चीनी विक्रेताओं, कीमतों और प्रमुख बंदरगाहों के विवरण के अलावा हमें उन नामों को समझने में भी मदद मिली जिनके अंतर्गत ये सिरप भारत में आयात किए जाते हैं। हमने गोल्डन सिरप, राइस शुगर सिरप और इनवर्ट शुगर सिरप से संबंधित जानकारी भी प्राप्त की। एचएस कोड उपलब्ध न होने के कारण इन उत्पादों से संबंधित जानकारी कुछ खास विवरणात्मक कीवर्ड डालने के बाद ही प्राप्त हुई।

जांच के दौरान हमें अहम सुराग मिले। फ्रुक्टोज सिरप बेचने वाली ये वही चीन की कंपनियां हैं जो अलीबाबा और इसी तरह के अन्य पोर्टलों पर खुलेआम ऐसे सिरप बेचती हैं जो शहद में मिलावट का पता करने वाले परीक्षणों से बच निकलने की क्षमता रखते हैं। पिछले चार वर्षों में भारत में 11,000 मीट्रिक टन फ्रुक्टोज सिरप इन विक्रेताओं के माध्यम से आया है जो चीन से आयातित कुल मात्रा का लगभग 70 प्रतिशत है। इसे “औद्योगिक कच्चा माल” के नाम पर मंगाया जाता है।

ऊपरी तौर पर ये कंपनियां सिरप या शहद की वैध विक्रेता मालूम पड़ती हैं क्योंकि ये अपनी वेबसाइट पर यह नहीं बतातीं कि उनके द्वारा बेचे जा रहे सिरप में मिलावट का पता लगाने वाले परीक्षणों को पास करने की अद्भुत क्षमता है। इसके विपरीत, ये अपनी वेबसाइटों पर खाद्य सुरक्षा और मानकों से संबंधित प्रमाण पत्र प्रदर्शित करती हैं। लेकिन इनके बीच के संबंध का पता तब चलता है जब आप पाते हैं कि भारत को माल निर्यात कर रही ये कंपनियां अपनी वेबसाइटों पर तो सम्मानित खाद्य विक्रेता होने का स्वांग करती हैं लेकिन अलीबाबा जैसे ऑनलाइन पोर्टलों पर ऐसे शुगर सिरप उत्पाद बेचती हैं जो सी3/सी4 परीक्षणों से बच निकलते हैं।

समस्या हमारी यानी आयातकों की ओर से है। यहां हमारी पड़ताल में वास्तविक विराम लग जाता है। चीन से इस उत्पाद के आयातकों के डेटाबेस में सूचीबद्ध अधिकांश कंपनियां व्यापारिक हैं जो उत्पाद को आगे शहद पैकिंग व्यवसाय या अन्य खाद्य व्यवसायों को बेचेंगी। चीन से आए 166 फ्रुक्टोज सिरप शिपमेंट में से 100 पंजाब (फरीदकोट, पटियाला और राजपुरा) में, लगभग 30 दिल्ली-एनसीआर और बाकी 15 जसपुर और काशीपुर (उत्तराखंड) में दो व्यवसायों द्वारा खरीदे गए।



भारत में ग्लूकोज सिरप का निर्यात करने वाली चीनी कंपनियां या शहद सप्लायर हैं या दावा करती हैं कि वे ग्लूकोज सिरप को शहद के विकल्प के रूप मंे बेच रही हैं (देखें “शुगर का संक्षिप्त इतिहास”)। यदि ये भारी टैक्स से बचने के लिए ग्लूकोज सिरप के एचएस कोड के अंदर शुद्ध शहद की आपूर्ति कर रही हैं, तो यह एक अलग मुद्दा है। लेकिन शहद में मिलाने के लिए ग्लूकोज सिरप की आपूर्ति मिलावट के मुद्दे की गंभीरता को बढ़ाती ही है। इसके प्रमुख आयातक नासिक, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के व्यवसायी हैं।

इससे यह साफ हो जाता है कि मिलावट की जाने वाली वस्तुओं को राइस सिरप, गोल्डन सिरप अथवा इनवर्ट शुगर सिरप के रूप में आयात नहीं किया जाता। वर्ष 2019-20 में अमेरिका से राइस सिरप के केवल 10 शिपमेंट आए थे जिनकी मात्रा काफी कम (22 मीट्रिक टन) थी। चीन में केवल एक विक्रेता इसे फ्रुक्टोज के एचएस कोड के अंदर गोल्डन सिरप के रूप में बेच रहा था। इस विक्रेता ने वर्ष 2017-18 और 2018-19 में यह 2,700 मीट्रिक टन से अधिक निर्यात किया। अन्य देशों से आयातित गोल्डन सिरप या तो चिकित्सकीय इस्तेमाल के लिए आता है, जैसा कि एचएस कोड (स्विट्जरलैंड के मामले में) द्वारा परिलक्षित होता है या थोक (यूके के मामले में) में आयात नहीं किया जाता।

ऐसे में सवाल उठता है कि एफएसएसएआई ने गलत आदेश क्यों दिया? इस आदेश में आयात नहीं किए जा रहे उत्पादों का उल्लेख तो है लेकिन आयात किए जा रहे उन उत्पादों का नाम गायब है जो उन्हीं चीनी कंपनियों द्वारा बेचे जा रहे हैं। कंपनियां इन उत्पादों को सी3 एवं सी4 टेस्ट में पास होने का दावा करती हैं। अब सवाल उठता है कि यह आदेश जानकारी की कमी नतीजा था या जानबूझकर ऐसा किया गया?

शुगर का संक्षिप्त इतिहास

हम जानते हैं कि सुक्रोज, ग्लूकोज और फ्रुक्टोज सभी शुगर के रूप हैं और इनमें प्रति ग्राम कैलोरी का स्तर कम या अधिक होता है। इन तीनों को जो चीज अलग करती है, वह है इनकी आंतरिक संरचना और यह कि हमारा शरीर इन्हें कैसे पचाता और मेटाबोलाइज करता है। ग्लूकोज सरल चीनी या एक मोनोसेकेराइड है और यह हमारे शरीर में सबसे तेजी से पचता है। इसे मकई से निकालकर डेक्सट्रोज के रूप में प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में मिलाया जा सकता है। फ्रुक्टोज भी सरल चीनी है, लेकिन यह फ्रूट शुगर के नाम से जाना जाता है और फल, शहद, गन्ना और चुकंदर में स्वाभाविक रूप से पाया जाता है। यह पचाने में भी आसान है। शहद में ग्लूकोज की तुलना में फ्रुक्टोज अधिक होता है, लेकिन जो इसे अन्य “शुगर” से अलग करता है, वह है कि इसमें विभिन्न प्रकार के अच्छे एंजाइम, जो शर्करा को विघटित करते हैं। ये एंजाइम पौधे से या मधुमक्खियों से आते हैं। फ्रुक्टोज और ग्लूकोज के बीच का अनुपात शहद की उत्पत्ति के आधार पर बदलता है। शहद मल्टी-फ्लोरल (कई फूल) है या मोनो फ्लोरल (एक फूल/पौधा) ये भी महत्वपूर्ण कारक है। इसलिए अनुपात अपने आप में मिलावट का निर्धारक नहीं है।



कैसे हुआ हनीगेट का खुलासा

इस कारोबार से पर्दा उठाने के लिए हमने चीन के शुगर विक्रेताओं से संपर्क कर एक गुप्त ऑपरेशन चलाया

  • हमने चीन की कंपनियों से ईमेल के जरिए संपर्क कर ऐसे सिरप की मांग की जो भारत में परीक्षणों को पास कर सकें
  • ये वही चीनी कंपनियां थीं जो भारत में फ्रुक्टोज सिरप का निर्यात कर रही थीं
  • कंपनियों से जवाब मिला कि ये सिरप उनके पास उपलब्ध हैं और भारत भेजे जा सकते हैं
  • चीन की कंपनियों ने हमें बताया कि अगर हम शहद में 50-80 प्रतिशत तक सिरप की मिलावट कर दें तब भी ये सभी निर्धारित परीक्षणों को पास कर लेंगे
  • चीन की एक कंपनी ने पेंट पिगमेंट के रूप में सिरप हमें भेज भी िदया
  • इसने अपना शिपमेंट हांगकांग के जरिए भेजा ताकि कस्टम क्लियरेंस को बाईपास किया जा सके

अक्टूबर 22, 2020 को हमारे पास फेडएक्स का एक कूरियर आया। यह पैकेज हांगकांग से था और उस पर लिखी जानकारी के अनुसार, इसमें प्लास्टिक पिगमेंट इमल्शन था। आप पूछ सकते हैं कि हम भला प्लास्टिक पिगमेंट इमल्शन क्यों मंगाएंगे और वह भी हांगकांग से? दरअसल हम अंधेरे में रखकर चल रहे इस कारोबार की परत दर परत खोलना चाहते थे। इसलिए हमने चीन से सिरप के सैंपल मंगवाने का ऑर्डर दिया था। कंपनी ने हमें भरोसा दिया था कि ये सैंपल शहद में मिलाए जा सकते हैं और ये सभी निर्धारित परीक्षणों पर खरे उतरेंगे।

इसके लिए हमने शहद उत्पादक का दावा करने वाली चीन की दो कंपनियों से ईमेल के जरिए संपर्क साधा (देखें “चीन का खेल”,)।

हमने शहद का व्यापार करने वाली एक ऐसी भारतीय कंपनी के रूप में खुद को पेश किया जो परीक्षण पास करने वाले चीन के सिरप खरीदने की इच्छुक थी।

हमने दो चीनी कंपनियों से इस बाबत पूछताछ की। इनमें से पहली वुहू स्थित वुहू डेली फूड्स थी जो चीन के चावल उत्पादक क्षेत्र अन हुयी की एक बड़ी एफएमसीजी कंपनी थी। इसकी वेबसाइट के अनुसार यह कंपनी चार प्रमुख उत्पाद बेचती है जैसे, प्राकृतिक शहद, सिरप, ड्राई सिरप और वीगन प्रोटीन (वह प्रोटीन जो पशु या उसके उत्पादों से प्राप्त नहीं होगा)। वुहू डेली भारत में फ्रुक्टोज के निर्यातकों में से एक थी।

दूसरी कंपनी का नाम सीएनएनफूड्स था और यह अन हुयी में ही स्थित थी लेकिन पहली कंपनी से छोटी थी। कंपनी का दावा था कि वह केवल शहद, कोम्ब शहद, बी वैक्स और प्रोपोलिस जैसे प्राकृतिक मधुमक्खी उत्पाद ही बेचती है।

हमने इन कंपनियों को अपने झांसे में लेने के लिए एक तरकीब लगाई। हमने कहा कि हम 10 कंटेनर या लगभग 200 टन सिरप खरीदना चाहते हैं जो सभी भारतीय परीक्षण प्रोटोकाॅल को पास करने में सक्षम हो।

हमारी जरूरतें साधारण थीं। हम जानना चाहते थे कि क्या उनका सिरप एफएसएसएआई द्वारा तय परीक्षण पास कर सकता है? इन परीक्षणों में सी3 और सी4 शामिल हैं। हम जानना चाहते थे कि क्या चीन के ये सिरप इन परीक्षणों के अलावा कुछ अतिरिक्त परीक्षणों (एसएमआर, टीएमआर एवं विदेशी ओलिगोसेकेराइड्स) पर भी सफल हो पाएंगे। हम यह भी चाहते थे कि एचएमएफ (5-हाइड्रॉक्सी मिथाइल फरफुरल) का स्तर कम हो, ताकि यह पता न चले कि शहद को गर्म किया गया है। दोनों कंपनियों ने हमें कहा कि हमारी निर्दिष्ट आवश्यकताओं पर खरे उतरने वाले सिरप उनके पास उपलब्ध हैं।



वुहू डेली ने हमें दो तरह के सिरप दिखाए। इनमें एक में फ्रुक्टोज का स्तर 48 प्रतिशत था। इस सिरप को एफ48 कहा गया। दूसरे में यह 55 प्रतिशत था और इसे एफ55 कहा गया था। वुहू डेली ने लिखित में बताया कि ये दोनों सिरप हमारी परीक्षण आवश्यकताओं को पूरा कर सकते हैं। कंपनी ने कहा कि वह इसे भारत के किसी भी शुष्क बंदरगाह पर भेज सकती है और हमें अंतरदेशीय कंटेनर डिपोर्ट (आईसीडी) लुधियाना के लिए सीआईएफ (लागत बीमा और माल भाड़ा) के आधार पर दरें भी बताईं। लुधियाना के लिए सीआईएफ दरें एफ48 सिरप के लिए $805.00/ मीट्रिक टन और एफ55 सिरप के लिए $950.00/ मीट्रिक टन निर्धारित की गई। एफ48 सिरप की भारतीय मुद्रा में कीमत लगभग 60 रुपए प्रति किलोग्राम थी जबकि एफ55 किस्म की दर लगभग 71 रुपए प्रति किलोग्राम थी ($1 = 75 रुपए)। सीएनएनफूड्स नामक दूसरी चीनी कंपनी, जो आधिकारिक रूप से केवल शहद बेचती है, ने दावा किया कि उनके पास एफ48 एवं एफ55 सिरप मौजूद हैं और वे भारत के सभी परीक्षण प्रोटोकाल को पास करने की क्षमता रखते हैं। वुहू डेली के विपरीत सीएनएनफूड्स सस्ती दरों पर दिल्ली के तुगलकाबाद में इनलैंड कंटेनर डिपो के माध्यम से सिरप भेजने के लिए तैयार हो गई। तुगलकाबाद के लिए उनकी सीआईएफ दरें एफ48 के लिए 710 डॉलर/ मीट्रिक टन थी जबकि एफ55 के लिए यह 790 डॉलर/मीट्रिक टन थी। ये सभी दरें 200 मीट्रिक टन सिरप के हिसाब से थीं। इस तरह एफ48 सिरप के लिए लगभग 53 रुपए प्रति किलोग्राम और एफ55 किस्म के लिए 59 रुपए प्रति किलोग्राम की आश्चर्यजनक रूप से कम कीमत हमें बताई गई।

दिलचस्प बात यह है कि सीएनएनफूड्स ने हमें बताया कि उनके अधिकांश ग्राहक शहद में 50-80 प्रतिशत सिरप मिलाते हैं। हम यह जानना चाहते थे कि क्या हम ऑर्डर देने से पहले इन दो सिरप के नमूने भारत में मंगा सकते हैं? दोनों ही कंपनियां हमें अपने नमूने भेजने के लिए राजी हो गईं।

30 सितंबर 2020 को वुहू डेली ने पुष्टि की कि हमें 500 एमएल के दो नमूने फेडएक्स एयरवे बिल नंबर 7716663xxxxx के माध्यम से भेजे गए हैं।

माल की खेप के साथ भेजी गई रसीद बहुत गुप्त थी और उसमें सिरप के प्रकार की कोई जानकारी नहीं दी गई थी। रसीद पर केवल “सिरप” लिखा हुआ था और यह सिरप किस चीज का था (चावल अथवा अन्य कोई स्टार्च युक्त) इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी। हमें कंपनी द्वारा एफ48 सैंपल के विश्लेषण के प्रमाणपत्र मेल किए गए थे जिनके अनुसार सिरप हल्का, गंधहीन और स्वाद में मीठा है। इसमें डेक्सट्रोज प्लस फ्रुक्टोज की मात्रा 97.50 प्रतिशत है जबकि फ्रुक्टोज की मात्रा केवल 48 प्रतिशत है।

यह सैंपल दिल्ली पहुंच चुका था लेकिन इसके बावजूद हम इसकी डिलीवरी नहीं ले पा रहे थे क्योंकि यह कार्गो के रूप में आया था और इसे सीमा शुल्क विभाग से क्लियर कराने की एक लंबी प्रक्रिया थी। फेडएक्स ने हमें सूचित किया कि भारत-चीन संघर्ष के बाद से भारत सरकार कूरियर कंपनी को पैकेज खोलने की अनुमति नहीं देती और ऐसा करने के लिए कस्टम एजेंट की आवश्यकता होती है। चूंकि हम एक खाद्य प्रसंस्करण कंपनी नहीं हैं और हमारे पास आवश्यक एफएसएसएआई लाइसेंस और आयात प्रमाणपत्र नहीं हैं इसलिए हमने अपने स्तर पर नमूनों को अधिग्रहीत करने का प्रयास नहीं किया। हमारी जानकारी के अनुसार ये नमूने अब भी फेडएक्स के पास सुरक्षित हैं।

अब बात दूसरी कंपनी सीएनएनफूड्स की जिनके पोर्टफोलियो में केवल प्राकृतिक मधुमक्खी उत्पाद थे। यह कंपनी हमें अपने उत्पाद बेचने के लिए बेताब थी और इसके लिए उसने एक अलग रास्ता अपनाया। उसने सुझाव दिया कि वह अपने उत्पाद हांगकांग के माध्यम से भेजेगी, क्योंकि चीन से आने वाले उत्पादों पर भारतीय कस्टम विभाग विशेष ध्यान देता है। 13 अक्टूबर 2020 को सीएनएनफूड्स ने हांगकांग से सैंपल भेजे और 10 दिन बाद “पेंट पिगमेंट इमल्शन” वाला पैकेट हमारे दरवाजे पर पहुंचा।

यह अलग बात है कि पैकेट के अंदर लेबल पर लिखी वस्तु नहीं थी। इसके विपरीत इसमें एफ48 और एफ55 की तीन प्लास्टिक शीशियां थीं। एफ48 नमूने का फ्रुक्टोज-ग्लूकोज अनुपात 0.95 था जबकि एफ55 के मामले में यह अनुपात 1.20 होने का दावा किया गया था। इस तरह हनीगेट का खुलासा हो गया। अब हम जानते हैं कि शहद में मिलावट का यह खेल किस तरह चल रहा है। अब हम कह सकते हैं कि चीन की ये बड़ी-बड़ी कंपनियां जो ऊपरी तौर पर बिल्कुल साफ सुथरी प्रतीत होती हैं, दरअसल शुगर सिरप बेच रही हैं और उनका दावा है कि ये सिरप सारे परीक्षणों को पास कर सकते हैं। यही नहीं, ये कंपनियां यह भी बताती हैं कि उनके ग्राहक 80 प्रतिशत तक सिरप मिलाकर उसे शहद के नाम से बेचते हैं।

चीनी सुगबुगाहट

यह चीन की कौन-सी तकनीकी है जो शुगर में ऐसे बदलाव कर सकती है जिसे पहचाना नहीं जा सकता? चीन की फर्मों का यह दावा है कि उनके सिरप ऐसे हैं जो शहद के घोल को उन्नत मिलावट परीक्षणों से भी बचा सकते हैं। उद्योग जगत इस बारे में बताता है कि इस काम के लिए रेजिन टेक्नोलॉजी यानी राल तकनीकी का इस्तेमाल किया जाता है। आखिर यह क्या बला है?

फल के रसों में रेजिन टेक्नोलॉजी का प्रयोग काफी जाना-माना है। दरअसल यह तकनीकी आयनों की अदला-बदली और एब्जॉर्बेंट्स को जुदा करने वाली पद्धति पर आधारित है। हालांकि, इस तकनीकी का प्रयोग शहद के लिए बिल्कुल ही नई अवधारणा है। चीन के रेजिन मैन्युफैक्चरर्स इसकी अगुवाई करते हैं।

आयन एक्सचेंज रेजिन के विभिन्न प्रकार होते हैं जो आयनिक समूहों को ले जाने वाली ठोस बहुलक श्रृंखलाओं (जैसे एसओ3 -, सीओओ-, एनएच3+, एनएच2+) से जुड़े होते हैं। यह आमतौर पर हानिकारक पदार्थों को हटाने में मदद करने के लिए बेचा जाता है।

यह रेजिन अलीबाबाडॉटकॉम जैसी वेबसाइटों पर भी उपलब्ध हैं। चीन की अग्रणी सनरेजिन है जो सेपलाइट बेचती है। यह एक ऐसा रेजिन है जो शहद की शुद्धिकरण के लिए है। दावा है कि संबंधित रेजिन के जरिए एंटीबायोटिक, कीटनाशक, कवकनाशक और एमएमएफ (हाइड्रोक्सी मिथाइल फुरफुरल) जैसे हानिकारक पदार्थों को हटाया जा सकता है। कंपनी की वेबसाइट इस तकनीक के जरिए शहद के रंग को बेहतर करने और उसकी उम्र बढ़ाने का भी दावा करती है।

लेकिन रेजिन से फिल्टर होने वाली शहद को सरकारें, विशेषज्ञ और मधुमक्खी पालक शहद नहीं मानते। मिसाल के तौर पर 2018 में ईयू कमीशन ने शहद मिलावट पर तकनीकी सत्र में एक रिपोर्ट में यह इंगित किया कि रेजिन उपचार या अल्ट्राफिल्ट्रेशन (ब्लेंडिंग के बाद) दरअसल शहद क्षेत्र में एक बहुत ही बड़ा धोखा है। यह भी गौर किया गया कि शहद से एंटीबायोटिक, कीटनाशक आदि जैसे तत्वों को हटाने के लिए सिंथेटिक रेजिन का इस्तेमाल गैरकानूनी है।

मार्च 2018 में यूरोपीय संसद प्रस्ताव ने ईयू के एपीकल्चर सेक्टर को चुनौती दी, साथ ही आयोग को रेजिन से फिल्टर होने वाले शहद के वितरण पर जल्द से जल्द प्रतिबंध के लिए पुकार लगाई। ऐसी शहद में जैविक मूल्य कुछ भी नहीं होता।

यह बताता है कि 2002 में शहद में क्लोरमफेनिकॉल समस्या का समाधान चीन से शहद का निर्यात करने वाली कंपनियों ने नियमों का पालन करके नहीं बल्कि रेजिन फिल्टर का उपयोग करके किया था। अंतरराष्ट्रीय मधुमक्खी पालकों के संघों के संघ एपिमोंडिया ने शहद की धोखाधड़ी पर अपने जनवरी 2020 के बयान में कहा है कि आयन-एक्सचेंज रेजिन का उपयोग 1981 के कोडेक्स मानक और यूरोपीय शहद परिषद के निर्देश 2001/110 / ईसी (2001) का उल्लंघन करता है।

इसके अलावा, ऐसे अध्ययन भी हैं जो प्राकृतिक शहद में मैनोज (न्यूट्रिशियन सप्लीमेंट) की उपस्थिति के बारे में बताते हैं। इन्हें या तो उच्चस्तरीय सिरप के मिलावट से या फिर रेजिन पद्धति के जरिए आयनों के विनिमय माध्यम से जोड़ा जाता है।

यह स्पष्ट है कि ऐसे अल्ट्रा-फिल्ट्रेशन के तहत अंत में तैयार होने वाले उत्पाद शहद कहलाने के काबिल नहीं होते। यह शहद की भौगोलिक और वनस्पति मूल की पहचान को ढंक देता है जो न केवल वांछित शहद और सिरप के साथ सम्मिश्रण करने में मदद करता है, बल्कि समस्या को पहचानना भी मुश्किल बनाता है।

लेकिन क्या अल्ट्रा-फिल्ट्रेशन भी शुगर सिरप को प्रयोगशालाओं की जांच से पास करवा देता है। यदि हां, तो कैसे?

अंत में हमारे पास इस सवाल का जवाब अब भी नहीं है कि तकनीक कैसे चावल और गन्ने जैसे पौधों से शुगर बनाती है जिसमें शुगर के चारित्रिक गुणों को छुपा लिया जाता है ताकि वे प्रयोगशालाओं की जांच में पहचाने न जा सकें। कोई नहीं जानता और न ही कोई बताने की इच्छा रखता है।



मिलावट का भारतीय तरीका

भारत में भी शहद में मिलाए जाने वाले सिरप को बनाने का काम शुरू हो चुका है

  • हमने उत्तराखंड के जसपुर में एक फैक्टरी पता लगाई जो शहद में मिलाने वाले सिरप को बनाती है
  • हमें यह भी पता चला कि इसका कोडवर्ड है “ऑल पास सिरप”
  • हमने फैक्टरी से संपर्क साधा और इस “ऑल पास सिरप” का एक नमूना प्राप्त किया
  • फैक्टरी के मालिक ने बताया कि यह नमूना शहद की शुद्धता के सभी परीक्षणों को पास कर लेगा

जसपुर उत्तराखंड के उधमसिंह नगर जिले में हिमालय की तलहटी में एक छोटी सी नगरपालिका है। भले ही इस क्षेत्र का मुख्य व्यवसाय कृषि है, लेकिन कुछ मुट्ठी भर कृषि-प्रसंस्करण इकाइयां हाल के वर्षों में यहां विकसित हुई हैं। हालांकि यह असामान्य नहीं है। मधुमक्खी पालन करने वालों ने हमसे कई बार कहा है कि उनकी समस्या की जड़ कम कीमत पर बिकने वाला मिलावटी शहद है। उनसे हुई बातचीत में जसपुर का नाम कई बार निकलकर आया।

आयात डेटाबेस से मिले सुराग भी जसपुर की ओर इशारा कर रहे थे। उसमें कुछ कंपनियों और उनके मालिकों के नाम थे, जिन्होंने चीन से फ्रुक्टोज सिरप का आयात किया था। ये सभी वैध खाद्य प्रसंस्करण व्यवसाय थे। लेकिन क्या अब ये कंपनियां भारत में संशोधित सिरप बना रही हैं? इसकी पड़ताल के लिए हमने डेटाबेस से मिले सुराग का पीछा करने का फैसला किया और कुछ नंबर डायल किए।

मधुमक्खी पालकों ने हमें पहले ही बता दिया था कि शहद को मिलावटी बनाने के लिए जिस सिरप का इस्तेमाल किया जाता है, उसे “ऑल पास सिरप” कहा जाता है। यह किसी की कल्पना में नहीं है कि ये सिरप वही हैं जो सभी भारतीय परीक्षण से पास हैं। हमने इनमें से एक कंपनी के मालिक से बात की (डाउन टू अर्थ के पास कंपनी और मालिक का विवरण है और प्राधिकरणों के पूछे जाने पर इसे उपलब्ध कराया जाएगा)। कुछ बातचीत के बाद उसने हमें बताया कि उन्होंने वास्तव में ऐसे “ऑल पास सिरप” बनाए हैं और हम इसे उनसे खरीद सकते हैं। इसके बाद 23 अक्टूबर, 2020 का दिन मुलाकात के लिए तय किया गया।

हमने तय तारीख पर ही मुलाकात के लिए जसपुर की यात्रा की। हमने उनसे कहा कि हमें कम लागत वाली जादुई सिरप की जरूरत है जो सी3 और सी4 परीक्षणों को पास कर सके। हमें पता चला कि फैक्टरी ने सिरप, चावल और अन्य बहुत से उत्पादों से बनाया है और ये प्रभावशाली हैं। इन उत्पादों में सोर्बिटोल, तरल ग्लूकोज, इनवर्ट शुगर, राइस प्रोटीन और अंत में (लेकिन सार्वजनिक रूप से नहीं कहा गया) उच्च फ्रुक्टोज सिरप शामिल थे जो शहद के रूप में पास हो सकते हैं। हमने 50 टन एफ48 या एफ55 सिरप की मांग की, लेकिन हम पहले इनका नमूना चाहते थे। हम इन नमूनों को प्रयोगशाला में भेजकर यह देखना चाहते थे कि ये सी3 और सी4 परीक्षण में पास होते हैं या नहीं।

हमें “ऑल पास सिरप” के नमूने मुफ्त में दिए गए। फैक्टरी के मालिक ने हमें कहा कि जब आगे ये सिरप खरीदे जाएंगे तो इसकी बिलिंग “शहद” के रूप मंे होगी। यह कंपनी की चालाकी थी। अगर कंपनी पकड़ी जाती है तो केवल यह कहकर आरोपों को खारिज कर देगी कि हमें शहद बेचा गया था और यह “ऑल पास सिरप” नहीं थे। आधिकारिक घोषणा में भी ऐसा कुछ नहीं था। कीमत और हमारी बातचीत ही तथ्य है।

हम फिर सिरप के नमूने के साथ दिल्ली लौट आए। हमें बताया गया था कि यह एनएमआर को छोड़कर सभी भारतीय परीक्षण पास कर लेगा।

बताया जाता है कि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब में कम से कम आधा दर्जन ऐसी फैक्टरियां हैं जो “ऑल पास सिरप” बना रही हैं। यह अब भी स्पष्ट नहीं है कि इन संशोधित सिरप को बनाने के लिए किस तकनीक का उपयोग किया जाता है। दबी जुबान में यह तकनीक चाइनीज बताई जा रही है।

लेकिन यह स्पष्ट है कि भारतीय मधुमक्खी पालक इस सिरप के कारोबार से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे। उत्पादन की उनकी न्यूनतम लागत 100 रुपए प्रति किलोग्राम से अधिक है। जिस शहद को हम खाते हैं यदि उसमें 50 प्रतिशत भी सिरप मिला जाए यह शहद के कारोबार की रीढ़ तोड़ देगा। स्वास्थ्य की तो बात ही मत कीजिए।

जब हमने चाइनीज और भारतीय सिरप की मिलावट की

अगर ये नमूने शुद्धता के परीक्षणों को पास कर लेते हैं तो पता चलेगा कि ये सिरप वाकई कारगर हैं

  • हमने शुद्ध शहद के नमूनों में मिलावट की
  • चीनी और भारतीय “ऑल पास सिरप” की 25 प्रतिशत, 50 प्रतिशत और 75 प्रतिशत मिलावट की
  • ये नमूने जांच के लिए प्रयोगशाला में भेजे गए
  • 25 प्रतिशत और 50 प्रतिशत शुगर की मिलावट वाले नमूने शुद्धता के परीक्षण मंे पास हो गए
  • हम कह सकते हैं कि एफएसएसएआई के 2020 के शहद मानकों को भी ये शुगर सिरप बाईपास कर सकते हैं

अब हम तक चीन और भारत के “ऑल पास सिरप” के नमूने पहुंच चुके थे। अब सवाल यह था कि क्या ये सिरप कंपनियों के दावे के अनुसार, प्रयोगशाला के परीक्षण पास कर पाएंगे? हमने कच्ची और भारतीय प्रयोगशाला में पास हो चुकी शहद में इन बोतलों का सिरप मिलाया, फिर जांच के लिए प्रयोगशाला में भेज दिया।

अगर एडेड शुगर वाले सिरप के नमूने परीक्षण पास कर लेते हैं तो इसकी बात की पुष्टि हो जाएगी कि मिलावटी शहद भी सी3 और सी4 परीक्षण पास कर सकती है।

सबसे मुश्किल काम था कच्ची शहद लाना जिसमें कोई मिलावट न हो। हम यह शहद सीधे स्रोत से लाना चाहते थे, इसलिए हमने राजस्थान के भरतपुर की यात्रा की। वहां हमारी मुलाकात 42 साल के मधुमक्खी पालक ओम प्रकाश से हुई। उनके पास मधुमक्खी के 1,400 बॉक्स और कच्ची शहद को रखने के लिए भंडारण की व्यवस्था थी। ओम प्रकाश ने हमें बताया कि वह जानते हैं कि शहर में चीनी से बने सिरप मिलाए जा रहे हैं और उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। इससे शहद के दाम गिर गए हैं और उनके लिए व्यापार को जारी रखना मुश्किल हो रहा है। इसके बाद उन्होंने हमें एक बोतल कच्ची और गैर प्रसंस्कृत शहद दी। उनका कहना था कि उनकी मधुमक्खियों ने जैसलमेर में बेर (जिजिफस मॉरिटानिया) के फूलों का रस चूसकर यह शहद बनाया है।



इसके बाद हम नमूना लेकर दिल्ली आ गए और सीएसई की पर्यावरण निगरानी लैब के वैज्ञानिकों ने कच्चे शहद और ब्रांडेड शहद में सिरप मिलाया। इस प्रकार कच्ची और गैर मिलावटी शहद को वैज्ञानिक उपकरणों व प्रक्रिया के तहत व्यवस्थित तरीके से अलग-अलग अनुपात में भारतीय और चाइनीज सिरप में मिलाया गया। हमने दो प्रकार की शहद और तीन प्रकार के सिरप का इस्तेमाल करके छह अनुपात तैयार किए।

हमने एक कच्ची शहद में भारतीय और चाइनीज सिरप 25 और 50 प्रतिशत के अनुपात में मिलाया। हम देखना चाहते थे कि कितनी मिलावट परीक्षण पास कर सकती है, इसलिए हमने 75 प्रतिशत चाइनीज सिरप में एक नमूना मिलाया। ब्रांडेड शहद में हमने 25 और 50 प्रतिशत चाइनीज नमूनों की मिलावट की। हमने कच्ची शहद को कंट्रोल सैंपल के रूप में भेज दिया।

इसके बाद हमने भारतीय नियमानुसार, इन मिलावटी शहद के नमूनों को जांच के लिए गुजरात स्थित नेशनल डेरी डेवलपमेंट बोर्ड के सेंटर फॉर एनेलिसिस एंड लर्निंग इन लाइवस्टोक एंड फूड (सीएएलएफ) की प्रयोगशाला में भेज दिया। जांच के नतीजों में हमारा डर सच साबित हुआ।

सभी नमूने (एक को छोड़कर, जिसे हमने 75 प्रतिशत मिलावट की थी) जांच में पास हो गए। ये नमूने सी3 और C4 टेस्ट में पास हो गए। यहां तक कि विदेशी ओलिगोसेकेराइड टेस्ट पर भी ये खरे उतरे।

इससे साबित होता है कि भारतीय और चाइनीज सिरप विदेशी शुगर को छिपाने में प्रभावी थे और 50 फीसदी तक की मिलावट पकड़ में नहीं आती। दूसरे शब्दों में कहें तो अब इसमें कोई रहस्य नहीं है। चाइनीज और अब भारतीय कंपनियों के पास शुगर सिरप को संशोधित करने की तकनीक है ताकि इसे परीक्षणों में छिपाया जा सके। हम यह भी जानते हैं कि 50 प्रतिशत तक मिलावट वाले नमूने आसानी से परीक्षण पास कर सकते हैं। या शायद इससे भी ज्यादा।

यह भी तथ्य है कि 75 प्रतिशत वाला नमूना विफल रहा। इससे हमें पता चलता है कि प्रयोगशाला ने पूरी देखभाल और पेशेवर तरीके से परीक्षण किया था। वह प्रयोगशाला नहीं थी जिसने नमूनों को पास नहीं किया बल्कि शहद पास हुई थी क्योंकि मिलावट पकड़ में नहीं आई।

मिलावट के इस परिष्कृत तरीके का हमारे स्वास्थ्य पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। प्रकृति के आश्चर्य यानी शहद के बजाय हम शुगर का उपभोग कर रहे हैं। शहद में शुगर की यह मात्रा 50 प्रतिशत या अधिक हो सकती है। यह हमारे स्वास्थ्य के लिए बुरा है, इसमें कोई संदेह ही नहीं है।

शहद के छोटे-बड़े ब्रांड का जब प्रयोगशाला में परीक्षण किया गया...

भारतीय मानकों पर पास हुई शहद जब संशोधित शुगर का पता लगाने वाले उपकरणों पर परखी गई तो फेल हो गई

  • 13 बड़े और छोटे शहद के ब्रांड का चयन किया गया
  • अधिकांश बड़े शहद ब्रांड ने भारतीय मानकों पर प्रयोगशाला के परीक्षणों को पास कर लिया
  • भारत की प्रयोगशाला इन बड़े ब्रांड में सी3 और सी4 शुगर की मिलावट का पता नहीं लगा पाई
  • हालांकि अधिकांश छोटे ब्रांड भारतीय मानकों पर प्रयोगशाला के परीक्षणों को पास नहीं कर पाए
  • शहद में सी4 शुगर की मिलावट सबसे सामान्य थी
  • लेकिन जब इन सभी नमूनों को उन्नत परीक्षण के लिए जर्मनी भेजा गया, तब तस्वीर बदल गई
  • भारत में पास हो चुके बहुत से नमूने ट्रेस मार्कर फॉर राइस (टीएमआर) परीक्षण में फेल हो गए
  • लगभग सभी नमूने न्यूक्लियर मैग्नेटिक रेजोनेंस स्पेक्ट्रोस्कॉपी (एनएमआर) परीक्षण में फेल हो गए। प्रयोगशाला के अनुसार, इससे मिलावट/शुगर सिरप का संकेत मिलता है
  • 13 ब्रांड में केवल 3 ब्रांड ही पास हो पाए
  • 22 नमूनों में से केवल 5 नमूने ही परीक्षण में पास हो सके। अन्य सभी मिलावटी पाए गए

अब हमारे लिए यह जानना जरूरी था कि जिस शहद को हम खा रहे हैं उसमें किस चीज की और कितनी मात्रा में मिलावट की जा रही है। अगस्त 2020 में हमने शहद के आठ ब्रांड के सैंपल एकत्र किए जो दिल्ली के आसपास की दुकानों में उपलब्ध थे और जिनके विज्ञापन भी देखने को मिलते हैं। इन नमूनों को गुजरात स्थित नेशनल डेरी डेवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) के सेंटर फॉर एनालिसिस एंड लर्निंग इन लाइवस्टॉक एंड फूड (सीएएलएफ) में परीक्षण के लिए भेजा गया। इस प्रयोगशाला में एफएसएसएआई द्वारा निर्धारित सभी मापदंडों के तहत शहद के परीक्षण की सुविधा है। हमने नमूनों का 2020 शहद गुणवत्ता मानकों के अनुसार सी4 और सी3 शुगर, फॉरेन ओलिगोसेकेराइड्स और स्पेसिफिक राइस मार्कर (एसएसआर) के लिए परीक्षण करवाया।

शहद की शुद्धता का परीक्षण सीधा-सीधा नहीं है। जांच के लिए प्रयोगशाला विभिन्न तरीकों का उपयोग करती है। लेकिन यह स्पष्ट है कि अगर नमूना किसी भी पैरामीटर पर विफल होता है तो शहद को मिलावटी माना जाता है (देखें “शहद में शुगर के लिए परीक्षण पद्धति”, पेज 44)।

परीक्षण के नतीजे

जब परिणाम आए तो सभी नमूने सी4 और सी3 परीक्षण पर खरे उतरे। केवल एक ब्रांड “एपिस हिमालय हनी” फॉरेन ऑलिगोसेकेराइड्स और एसएमआर परीक्षण में विफल रहा जो बताता है कि शायद इस शहद में राइस सिरप की मिलावट हो।

ये परीक्षण बताते हैं कि जो शहद हम खाते हैं, अगर वह एफएसएसएआई द्वारा निर्धारित मानकों पर खरा उतरेंगे तो माना जाएगा कि उनमें विशेष मिलावट नहीं है।

हमने कुछ और ब्रांड को परीक्षण की कसौटी पर परखा। इस बार हमने पांच अन्य छोटे बड़े ब्रांड का परीक्षण करवाया। इन्हें भी गुजरात की प्रयोगशाला में भेजा गया और पहले वाले पैरामीटर पर जांचा गया।

इस बार परिणामों में विविधता थी। पांच में से तीन शहद के नमूनों में मिलावट के सबूत थे।

इससे यह तो स्पष्ट हो गया कि हमने शहद के जिन नमूनों का परीक्षण किया, उसमें बहुत भिन्नता है।

एपिस हिमालय को छोड़कर, बाकी बड़ी ब्रांड वैल्यू और मार्केट शेयर वाली सभी कंपनियों ने सी3 और सी4 शुगर टेस्ट पास कर लिए।

छोटे शहद ब्रांडों में से तीन-ददेव, हाय हनी और सोयाइटे नैचुरेले- सी4 परीक्षण में और आइसोटोप परीक्षण पर विफल रहे।

हालांकि, ये विदेशी ओलिगोसेकेराइड और चावल के लिए विशिष्ट मार्कर (एसएमआर) टेस्ट में पास हुए। इससे यह पता चलता है कि नमूने मिलावटी थे पर मिलावट के लिए राइस सिरप या सी3 प्लांट सिरप का प्रयोग नहीं किया गया है। इनमें साधारण गन्ने की चीनी इस्तेमाल की गई थी। ददेव और हाय हनी में 20 और 27 प्रतिशत सी4 शुगर था, जबकि सीमा 7 प्रतिशत है।

ददेव, इंडीजीनियस, हाय हनी और सोसाइटे नैचुरेले के नमूनों को अनप्रोसेस्ड शहद के रूप में बेचा जाता है और चिंताजनक है कि इन चार में से तीन के नमूने मिलावटी पाए गए।

बात यहीं खत्म नहीं होती हम इस बात से संतुष्ट नहीं थे कि जो शहद हमें बेचा जाता है और जिसे हम अच्छे स्वास्थ्य के लिए खाते हैं, वह मिलावटी नहीं है।

अब तक की हमारी जांच में निम्न बातों की जानकारी मिली:

  • चीन की कंपनियां अपने ऑनलाइन ट्रेडिंग वेबसाइट पर विज्ञापन में दावा करती हैं कि उनके पास ऐसे शुगर सिरप हैं जो सी3/सी4 परीक्षण पास करेंगे। हमने इन कंपनियों से संपर्क भी किया और इस शुगर सिरप के नमूने भी खरीदे।
  • हमें एक भारतीय कंपनी भी मिली जो “ऑल पास सिरप” बेच रही थी और दावा करती है कि यह एफएसएसएआई के अनिवार्य परीक्षणों को पास करेगी।
  • हमने ऑल पास चाइनीज और भारतीय सिरप के नमूने खरीदे और इनसे शहद के नमूनों को स्पाइक किया पर प्रयोगशाला इनका पता नहीं लगा पाई। अब हमें विश्वास हो गया कि इस तरह के सिरप मौजूद थे जो प्राकृतिक शहद में की गई मिलावट को छुपा सकते हैं।

यह पक्की तरह से नहीं कहा जा सकता है कि जो शहद परीक्षणों में पास हुआ था वह मिलावटी नहीं है। हमें इसकी पुष्टि की आवश्यकता थी।

इसके लिए हमने फिर उसी बैच के नमूनों को लिया और उन्हें एनएमआर स्पेक्ट्रोस्कोपी के द्वारा टेस्ट करने का फैसला किया। यह टेस्ट मिलावट का पता लगाने के लिए स्वर्णिम मानक माना जाता है। भारत सरकार ने शहद के निर्यात के लिए इस परीक्षण को पहले ही अनिवार्य कर दिया था। साथ ही, डाबर और सफोला जैसी बड़ी कंपनियां उपभोक्ताओं को बता रही थीं कि वे अपने उत्पादों को एनएमआर प्रमाणित कर रही हैं।

हमारी रिसर्च बताती है कि दुनियाभर में सरकारों द्वारा शहद में सी3/ सी4 मिलावट का पता लगाने के लिए यह तकनीक उपयोग की जा रही थी। हमने भारत में ऐसी प्रयोगशाला खोजना शुरू किया जो हमारे लिए यह परीक्षण कर सके। लेकिन यहां केवल एक ही प्रयोगशाला के पास यह तकनीक है। मुंबई के पास स्थित एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन काउंसिल (ईआईसी) की यह प्रयोगशाला हमारे लिए उपलब्ध नहीं थी।

बहुत खोज के बाद हमें जर्मनी में एक प्रयोगशाला मिली जो इस तकनीक के उपयोग से शहद की मिलावट का परीक्षण करती है। हमने वहां नमूने भेजने का फैसला किया। हमने इस जर्मन खाद्य परीक्षण प्रयोगशाला के भारतीय यूनिट से संपर्क किया और उन्होंने नमूने लेना स्वीकार किया। इसके बाद परीक्षण के लिए नमूनों को जर्मनी भेजा गया। हमने उन्हीं 13 ब्रांडों का एक बैच तैयार कर भेजा जिसे हमने भारत में टेस्ट किया था।

साथ में हमने डाबर और सफोला के अलग-अलग बैचों के दो और नमूनों को जोड़ा जिससे हम कंपनी के इस दावे को परख सकें कि वह अपने उत्पाद के प्रत्येक बैच को एनएमआर से टेस्ट करती हैं। इस तरह हमने 17 नमूनों को जर्मनी भेजा।

जब परिणाम आए तो हमने एक और बैच तैयार किया जिसमें हमने प्रमुख कंपनियों के अतिरिक्त नमूने भेजने का फैसला किया। ये नमूने पहले दौर के एनएमआर में विफल रहे थे पर हम उन्हें एक और मौका देना चाहते थे और एक बार और पुष्टि करना चाहते थे। ये कंपनियां थीं पतंजलि, बैद्यनाथ, झंडू, नेचर्स नेक्टर और इंडीजीनस।

इस तरह से हमने कुल 22 नमूने जर्मनी भेजे।

जर्मनी की प्रयोगशाला को बताया गया था कि नमूनों का स्रोत भारत है और नॉन ईयू कॉम्पलांयस के लिए नमूनों की जांच की जानी है। दूसरे शब्दों में कहें तो शहद के नमूनों की जांच यूरोपीय यूनियन के बाहर निर्धारित हल्के मापदंडों पर की जानी थी।

सभी शहद के नमूनों का परीक्षण निम्नलिखित पैरामीटर्स के लिए किया गया था:

  • ट्रेस मार्कर फॉर राइस (टीएमआर)- इस पैरामीटर को एफएसएसएआई द्वारा 2020 में बनाए गए मानक में हटा दिया गया था, लेकिन राइस सिरप की उपस्थिति को एक महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है।
  • न्यूक्लियर मैग्नेटिक रेजोनेंस स्पेक्ट्रोस्कोपी (एनएमआर)– इसका उपयोग सी3/ सी4 टेस्ट पास करने के लिए डिजाइन की गई शुगर सिरप द्वारा मिलावट का निर्धारण करने के लिए किया जाएगा।

परिणाम हमने जो पाया वह चौंकाने वाला था।

  • डाबर शहद ने सी3 और सी4 शुगर का परीक्षण पास किया लेकिन तीनों नमूने एनएमआर टेस्ट में विफल हुए। एक नमूना टीएमआर पर भी विफल रहा।
  • पतंजलि शहद सी3 और सी4 शुगर परीक्षण में पास हुई लेकिन दोनों नमूने टीएमआर और एनएमआर परीक्षण में विफल हुए।
  • एपिस हिमालय हनी फॉरेन ओलिगोसेकेराइड और एनएमआर (भारत में किया गया) में विफल रहा और टीएमआर व एनएमआर परीक्षण में भी विफल रहा।
  • बैद्यनाथ शहद ने सी3 और सी4 शुगर के परीक्षण पास किए लेकिन एनएमआर पर विफल रहे। एक नमूना टीएमआर पर भी विफल रहा।
  • झंडु शहद ने सी3 और सी4 शुगर और टीएमआर के परीक्षण पास किए लेकिन एनएमआर पर विफल रहा।
  • नेचर्स नेक्टर ने सी3 और सी4 शुगर के लिए परीक्षण पास किए पर एक नमूना एनएमआर में विफल रहा और एक नमूना एनएमआर पास हुआ।
  • हितकारी ने सी3 और सी4 शुगर के टेस्ट पास किए लेकिन टीएमआर और एनएमआर पर विफल रहे।
  • सफोला शहद ने सी3 और सी4 शुगर परीक्षण पास किया और टीएमआर व एनएमआर टेस्ट भी पास किए।
  • मार्कफेड सोहना ने सी3 और सी4 शुगर परीक्षण पास किए और टीएमआर व एनएमआर परीक्षण भी पास किए।
  • ददेव फॉरेस्ट शहद सी4 शुगर और एनएमआर परीक्षण में विफल रहा। यह टीएमआर परीक्षण पर पास हुआ।
  • इंडीजीनस शहद ने सी3 और सी4 शुगर और टीएमआर परीक्षण पास किया लेकिन एनएमआर पर विफल रहा।
  • हाय हनी सी4 और एनएमआर परीक्षण पर विफल रहा। यह टीएमआर परीक्षण पर पास हुआ।
  • सोसाइटे नेचुरेले शहद सी4 परीक्षण में विफल रहा जबकि टीएमआर और एनएमआर परीक्षण में पास हुआ।

क्या पता चला

  • 13 ब्रांडों में से तीन ब्रांड- सफोला, मार्कफेड सोहना और नेचर्स नेक्टर (1 नमूना)- ने एनएमआर सहित सभी परीक्षणों को पास किया।
  • 22 नमूनों में से केवल 5 बोतलें ही एनएमआर पास करती हैं, 76 प्रतिशत नमूने एनएमआर परीक्षण में विफल रहे।
  • दो ब्रांड- ददेव और हाय हनी- सी4 शुगर सिरप टेस्ट में फेल हुए जिससे यह पता चलता है कि उनकी मिलावट “बेसिक” थी, इसमें संशोधित शुगर सिरप का उपयोग नहीं किया गया।

शहद में शुगर के लिए परीक्षण पद्धति

आइसोटोप परीक्षण (सभी तीन डेल्टा परीक्षण-अधिकतम, p-h, fru-glu) सी4 और सी3 शर्करा की गणना करने के लिए किया जाता है। इसमें उपयोग की जाने वाली विधि शुगर को निर्धारित करने के लिए आइसोटोप रेशियो मास स्पेक्ट्रोमेट्री (आईआरएमएस) है लेकिन छोटे रूपांतर के बाद। सी4 शुगर विश्लेषण के लिए प्रयोगशालाएं एलिमेंटल एनेलिसिस (ईएस) करती हैं और सी3 शुगर के लिए वे लिक्विड क्रोमेटोग्राफी (एलसी) का उपयोग करती हैं। लेकिन यह शुगर की मौजूदगी का टेस्ट है और केवल सी4 शुगर को मात्रा पता की जा सकती है। यह इसलिए है क्योंकि मकई के कार्बन 12,13 रेशियो के शुद्ध मानक उपलब्ध हैं। शहद की शुद्धता की जांच के लिए एफएसएसएआई 2020 मानक आइसोटोप परीक्षण पर आधारित है।

विदेशी ओलिगोसेकेराइड की जांच के लिए स्टार्च-आधारित शर्करा (यानी चावल, गेहूं, मकई के पॉलिसेकराइड) की जांच की जाती है। यह मकई या चावल से निकली स्टार्च-आधारित शुगर से संबंधित है। इसलिए, यदि कोई नमूना विदेशी ओलिगोसेकेराइड के टेस्ट पर विफल रहता है, तो इसका मतलब होगा कि सी3 या सी4 (स्टार्च-आधारित) शुगर द्वारा मिलावट की गई है। इसलिए, गन्ने या चुकंदर से बनी स्टार्च-आधारित नहीं है और इसका इस परीक्षण में पता नहीं लगाया जाएगा।

चावल सिरप से मिलावट की पहचान के लिए दो मार्कर हैं। ये हैं स्पेसिफिक मार्कर फॉर राइस (एसएमआर) यानी 2-एएफजीपी और ट्रेस मार्कर फॉर राइस (टीएमआर)। मार्कर की उपस्थिति से पता चलता है कि नमूने में चावल के सिरप (सी3 शुगर) की मिलावट है।

शुगर की प्रकृति जटिल है और विभिन्न प्रकार की शुगर परस्पर प्रभाव डालती है, इसलिए एक साथ जांच की आवश्यकता पड़ती है। यदि कोई नमूना उपरोक्त परीक्षणों में विफल रहता है तो यह दिखाता है कि यह सी3 या सी4 शुगर द्वारा मिलावटी है। यदि नमूना एमएमआर और टीएमआर पर विफल रहता है, तो हम जानते हैं कि शुगर का स्रोत चावल का सिरप है।

परिणाम के निष्कर्ष

इन परिणामों के साथ हमारी जांच पूरी हुई। हमने जब पहली बार सुना था कि शुगर सिरप के साथ शहद की मिलावट की वजह से मधुमक्खी पालकों की आजीविका को खतरा है, तब से अब तक के हर बिंदु को जोड़कर हमें एक कहानी मिली।

अब हम निश्चितता के साथ यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि हम जो शहद खाते हैं वह ज्यादातर मिलावटी है। शीर्ष 13 ब्रांडों में से केवल 3 ऐसे हैं जिन्हें मिलावटी नहीं कहा जा सकता।

शहद में मिलावट सोची समझी है। इसमें “संशोधित” शुगर सिरप का इस प्रकार उपयोग होता है जिससे ये अनिवार्य प्रयोगशाला परीक्षणों में पकड़ में नहीं आते।

यह सिरप चीन से आयात किए जाते हैं और अब भारत में भी निर्मित होते हैं। कंपनियों का दावा है कि 80 प्रतिशत तक शहद में मिलावट नहीं पकड़ी जा सकती। हमारे परीक्षणों से पुष्टि होती है कि 50 प्रतिशत तक की मिलावट तो निश्चित रूप से संभव है और यह प्रयोगशाला जांच में नहीं पकड़ी जाएगी। इसलिए, शहद की बोतल में शुगर सिरप के साथ मिलावट की मात्रा 50 फीसदी या उससे भी अधिक हो सकती है।

हम यह भी जानते हैं कि इस तरह की मिलावट कंपनियों के लिए फायदेमंद है। असली शहद की लागत की तुलना में इसका उपयोग सस्ता है। यह सिर्फ 60 रुपए प्रति किलोग्राम में मिलती है वहीं मधुमक्खी पालकों को बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए 120 रुपए प्रति किलोग्राम की लागत लगती है। मिलावट मिलावट आसान भी है। सिरप को थोक में खरीदा जा सकता है और धड़ाधड़ बिकने वाले शहद में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें उस आपूर्ति श्रृंखला की भी जरूरत नहीं होती। हमें पता है कि शहद प्रकृति की देन है और मधुमक्खी पालन करने वाले फूलों की तलाश में जगह-जगह जाते हैं। मधुमक्खियां जब चूसती हैं, तब हमें शहद की अच्छाई प्राप्त होती है।

शुगर सिरप का प्रयोग करके कंपनी को मधुमक्खी पालकों के साथ काम करने की आवश्यकता नहीं होती और न ही मधुमक्खी पालक को मधुमक्खियों और मौसमी फूलों की तलाश में भटकना पड़ता है।

हम जानते हैं कि मिलावट का कारोबार भी समय के साथ विकसित हुआ है। मिलावट में पहले सिर्फ गन्ने के रस से बनी साधारण शुगर का प्रयोग किया जाता था, फिर चावल की सी3 शुगर प्रयोग की गई और अब संशोधित शुगर प्रयोग में लाई जा रही है जो लैब परीक्षणों को भी पास कर सकती है। हम जिन बड़े ब्रांड का शहद खा रहे हैं, वे पहले ही संशोधित शुगर मंे महारथ हासिल कर चुके हैं। ये बड़े ब्रांड एफएसएसएआई के 2018 व 2020 के मानकों को पास कर रहे हैं। एनएमआर तकनीक इस संशोधित शुगर की जांच का एकमात्र तरीका है।

परीक्षणों से पता चलता है कि 77 प्रतिशत शहद मिलावटी है। जर्मन प्रयोगशाला ने एनएमआर में फेल होने वाले नमूनों की विश्लेषण रिपोर्ट में कहा है, “यह शुगर सिरप की मिलावट” दर्शाता है।

यह भी स्पष्ट है कि यह शहद की मिलावट की कहानी का अंत नहीं है। बहुत जल्द बाजार में एक और मिलावट होगी। इस बार यह एनएमआर टेस्ट भी पास कर लेगी। इसलिए, हमें इस शुगर युक्त शहद के हमारे स्वास्थ्य पर प्रभाव को समझने की आवश्यकता है। यह हमारे शरीर, हमारे स्वास्थ्य से जुड़ी है और कोविड-19 के समय में इसका दोहरा-तिहरा खतरा है।

 

इम्यूनिटी बढ़ेगी या बदतर होगी?

शहद को कौन-सी खूबियां विशेष बनाती हैं और शहद मंे शुगर से की गई मिलावट क्यों बुरी है?

  • शहद भी शुगर है लेकिन यह विशेष है, इसमें प्रकृति की बहुत-सी खूबिया हैं
  • कोविड-19 के समय में हम इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए अधिक से अधिक शहद का सेवन कर रहे हैं
  • ओवरवेट लोगों को कोविड-19 का खतरा अधिक है
  • इसलिए शुगर से मिलावट वाली शहद खाकर हम पर बीमारी का खतरा और बढ़ जाएगा

उपभोक्ता के रूप में हमारे मन में एक सहज सवाल यह उठता है कि जो शहद हम खा रहे हैं, अगर उसमें शुगर है तो इससे क्या फर्क पड़ेगा? इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए हमें कुछ बिंदुओं पर गौर करने की जरूरत है।

सबसे पहले, शहद का विशेष गुण क्या है जो इसे शुगर से अलग करता है? दूसरा अगर शहद में शुगर मिल जाए तो इससे हमारा स्वास्थ्य कैसे प्रभावित होगा? कोविड-19 के समय में इसके क्या निहितार्थ हैं?

आज हम यह भी जानते हैं कि शहद ब्रांड अपने उत्पादों को इम्यूनिटी बूस्टर के रूप में बेच रहे हैं। कहा जा रहा है कि कोविड-19 से लड़ने में यह मददगार है। हम यह भी जानते हैं कि हम अधिक शहद खा रहे हैं। महामारी की शुरुआत में ही मार्च में बाजार विश्लेषक नीलसन ने बताया था कि इस अच्छाई से भरे हुए उत्पाद की बिक्री में काफी उछाल आया है। शहद की बिक्री में 35 फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी। तब से यह माना जा रहा था कि हममें से अधिकांश लोग शहद के गुणों के कारण इसका सेवन कर रहे हैं। जब हमें पता चला कि वायरस से सुरक्षा में यह मददगार है तो हम आवश्यक रूप से इसका सेवन कर रहे हैं (देखें “मधुमक्खियों की...”)।

कैसे अलग है शहद

शहद भी शुगर लेकिन यह खास है। एक चम्मच शहद (21 ग्राम) में शुगर की तुलना में थोड़ी अधिक कैलोरी होती है। इसमें मुख्य रूप से शुगर कार्बोहाइड्रेट होता है जो असल में ग्लूकोज और फ्रुक्टोज है। लेकिन शहद की “शुगर” गुणकारी हो जाती है। यह मधुमक्खियों द्वारा पौधों के मकरंद को इकट्ठा करने और छत्ते में उसे बनाने के अद्भुत तरीके के कारण है। मधुमक्खियां पराग का सेवन करती हैं, उसे पचाती हैं और उगलती हैं। इस तरह शहद गुणकारी बन जाता है। इसके बाद शहद शुगर नहीं बल्कि एंजाइम, अमीनो एसिड, फेनोलिक यौगिक जैसे फ्लेवोनोइड, खनिज और अन्य फाइटोकेमिकल्स बन जाता है। ये शहद को एंटीऑक्सीडेंट, रोगाणुरोधी, सूजन-जलन में राहत पहुंचाने वाले गुणों से युक्त कर देते हैं। वैज्ञानिक इस बात की पुष्टि कर चुके हैं शहद हमारे इम्यून सिस्टम के लिए अच्छा है और इससे हमारा भला होता है।



यही कारण है कि गर्म पानी में शहद के साथ अपना दिन शुरू करने की सलाह दी जाती है। यह हमें ऑक्सीडेटिव तनाव को प्रबंधित करने की क्षमता प्रदान करता है जो जीवन शैली, आहार और पर्यावरणीय तनाव से उत्पन्न होता है। ऑक्सीडेटिव तनाव कोशिकीय पतन का कारण है जो उम्र बढ़ने के साथ-साथ चयापचय और हृदय रोगों जैसे कई पुरानी बीमारियों का कारण बनता है। इसके अलावा, शहद आंत के स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा माना जाता है।

शुगर का स्वास्थ्य पर असर

अब अपने दिन की शुरुआत शुगर सिरप के सेवन से करने की कल्पना करें। अगर आप जिस शहद का सेवन कर रहे हैं, उसमें 50 प्रतिशत भी शुगर सिरप मिला हुआ है, तो इसका मतलब है कि आपको बिना किसी लाभ के खाली कैलोरी मिल रही है। इससे फायदा नहीं केवल नुकसान पहुंचेगा।

अब कोविड-19 के दौरान इस पर विचार करें। यह जहर जैसा है। शुगर से हमें वह नहीं मिल रहा है जो हमारे संपूर्ण स्वास्थ्य और प्रतिरक्षा में सुधार करके वायरस से हमारी रक्षा करेगा। इससे भी बुरा यह है कि हम शहद का शुगर सिरप के साथ सेवन कर रहे हैं। यह हमारा वजन बढ़ाकर हमें खतरे में डाल देगा और हमें वायरस के प्रति और संवेदनशील बना देगा।

अमेरिका में सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) ने कहा है कि मध्यम से अधिक वजन वाले लोगों में गंभीर कोविड​-19 संक्रमण का जोखिम बढ़ सकता है। इस जोखिम के दायरे में बड़ी संख्या में वे लोग आ सकते हैं जिन्हें भले ही “मोटा” घोषित न किया गया हो लेकिन ओवरवेट हैं।

कोविड-19 महामारी के शुरुआती महीनों में यह स्पष्ट नहीं था कि वजन को बीमारी के जोखिम से क्यों जोड़ा गया है। लेकिन जैसे-जैसे महीने बीते यह रिश्ता स्पष्ट हो गया है। एक संबंध हमारे शरीर के वसा ऊतक के साथ भी है जिसे जैविक रूप से सक्रिय माना जाता है।

यह शरीर को बिना संक्रमित किए क्रोनिक सूजन व जलन की तीव्रता को बढ़ाने में मददगार है। इससे हमारे शरीर की इम्यूनिटी क्षीण और कोरोनावायरस के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती है। इसके बाद पेट के मोटापे की समस्या होती है, जो फेफड़ों में दबाव को बढ़ाती है। अध्ययनों में मोटापे और कोविड-19 को दो समानांतर महामारियों के रूप में देखा जा सकता है, क्योंकि ये एक-दूसरे के साथ नकारात्मक व्यवहार करते हैं, जिससे बीमारी और गंभीर हो जाती है। दोनों महामारियां संयुक्त रूप से स्वास्थ्य प्रणाली पर भारी बोझ डाल देती हैं।

इस तरह शुगर के साथ शहद का सेवन हम सभी को मोटापे के जाल में फंसा सकता है। वह भी ऐसे समय में जब मोटे लोगों में भारतीयों की हिस्सेदारी बहुत बड़ी है। हम यह भी जानते हैं कि मोटापा उच्च रक्तचाप, टाइप -2 मधुमेह और कई पुरानी बीमारियों को बढ़ाने में मददगार है। भारत दुनिया का “ओबिसिटी कैपिटल” बनने की राह पर है। पिछले एक दशक में ओवरवेट और मोटे लोगों की आबादी (15-49 आयुवर्ग) दोगुना हो गई है। शहरी क्षेत्रों की आबादी में लगभग एक तिहाई से अधिक ओवरवेट या मोटापे से ग्रस्त है।

ये सब स्थितियां समस्या को बेहद घातक बनाती हैं। इन दिनों हम शहद का सबसे अधिक सेवन कर रहे हैं ताकि कोविड-19 संक्रमण से लड़ सकें। लेकिन शुगर के साथ मिलावटी शहद हमें मजबूत नहीं बनाएगा। यह हमें कोविड-19 के प्रति और संवेदनशील बना देगा। यह पूरी तरह से गलत और अस्वीकार्य है।

मधुमक्खियों की जरूरत सिर्फ शहद के लिए नहीं

... बल्कि हमारे दैनिक आहार को तैयार करने के लिए मधुमक्खियों के बिना यह दुनिया बिना भोजन वाली दुनिया बनकर रह जाएगी। तथ्य यह है कि मधुमक्खियां केवल शहद ही नहीं बल्कि परागण की “सेवाएं” देने के लिए भी जरूरी हैं। मधुमक्खियां जैसे-जैसे एक से दूसरे पौधे की ओर बढ़ती हैं और फूलों का रस चूसती हैं, वे पराग भी फैलाती हैं।

पारिस्थितिकी तंत्र में उर्वरापन मधुमक्खियों पर निर्भर है। इसके अलावा मधुमक्खियां क्रॉस परागण के माध्यम से फसल की पैदावार बढ़ाती हैं। साथ ही साथ परागण और उसे स्थायी रखकर जंगली व फसली पौधों के जरिए जैव विविधता में भी वृद्धि करती हैं।

एफएओ का अनुमान है कि परागण करने वाले दुनिया के 35 प्रतिशत फसल उत्पादन को प्रभावित करते हैं, वहीं दुनियाभर में 87 प्रमुख खाद्य फसलों के आउटपुट को बढ़ाते हैं, साथ ही कई औषधीय पौधों को भी समृद्ध करते हैं।

इस तरह, मधुमक्खी पालक की आजीविका हमारे द्वारा खाए जाने वाले भोजन से जुड़ी होती है। यदि मधुमक्खी पालक मिलावटी शहर के कारण अपने व्यवसाय से अलग हो जाता है तो हमारे भोजन पर ही खतरा मंडराने लगेगा। मधुमक्खी के बिना, हम शहद के गुणों के अलावा अपने पारिस्थितिकी तंत्र की उत्पादकता भी खो देंगे।

हमें शुद्ध शहद चाहिए

हमने मिलावट के कारोबार से पर्दा उठा दिया है। अब सरकार को चाहिए कि निर्णायक कार्रवाई करे। उद्योग को चाहिए कि जिम्मेदारी निभाए और उपभोक्ताओं को चाहिए कि शहद को समझें और परिवर्तन की आवाज बुलंद करें

शहद में मिलावट के कारोबार को जल्द से जल्द बंद करना बहुत जरूरी है। यह न केवल उपभोक्ता को बल्कि मधुमक्खी पालकों को भी फायदा पहुंचाएगा। अभी कृषि उत्पादकता और जैव विविधता को फिर से बहाल करने के लिए लंबा सफर तय करना है। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि मधुमक्खी पालन केवल हमारे शहद से ही नहीं जुड़ा है, यह परागण करने वाली मधुमक्खियों की रक्षा से भी संबंधित है। इसके लिए सरकार, उद्योग और उपभोक्ताओं को ठोस कदम व आक्रामक कदम उठाने होंगे। इससे कम में काम नहीं चलेगा।

पहला कदम : चीन से सिरप और शहद का आयात बंद करें और इसे दूसरे देशों (सिरप लॉन्डरिंग) के माध्यम से भी आने से रोकें

पहला जरूरी कदम है कि चीन से आने वाले मिलावट के स्रोत और तमाम रूटों पर तत्काल रोक लगाई जाए। केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय को सभी प्रकार के सिरप और शहद के आयात को विनियमित करना चाहिए या इसे पूरी तरह रोकना चाहिए। विनियमन में व्यापारियों द्वारा इसके अंतिम उपयोग और शहद सेक्टर से इसके संबंध की घोषणा करनी होगी। मंत्रालय को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी सिरप और शहद उचित एचएस कोड के तहत आयात हों व ताजा डेटाबेस सार्वजनिक रहे। जरूरत पड़ने पर नए एचएस कोड बनाए जा सकते हैं।

हमारा अनुभव बताता है कि सरकारी एजेंसियां इस काले कारोबार पर अंकुश लगाने में पूरी तरह असमर्थ हैं। हम देख चुके हैं कि एफएसएसएआई आयात की जांच में कैसे लड़खड़ाता है। उसे सिरप से होने वाली गड़बड़ियों की जानकारी मिली, फिर भी वह इनके अंतिम उपयोगकर्ता का पता नहीं लगा पाया। हम यह भी जानते हैं कि इस व्यवसाय का एक वैध चेहरा चीनी कंपनियों की वेबसाइटें हैं जो संशोधित सिरप का साइड बिजनेस घोषित नहीं करतीं। इस सिरप के आयातक यह कभी स्वीकार नहीं करेंगे कि वे इसे लैब टेस्ट को बाईपास करने के लिए खरीद रहे हैं। वे बस यही कहेंगे कि फ्रुक्टोज या ग्लूकोज सिरप का आयात कर रहे हैं, जिनके शहद के अलावा भी कई औद्योगिक उपयोग हैं।

शहद के इस कारोबार की जड़ तक पहुंचना मुश्किल है। इसलिए, हमारी दलील है कि आयात ही बंद कर दिया जाए। इससे सफाई का काम शुरू हो जाएगा।

हालांकि, हम यह भी मानते हैं कि यह पर्याप्त नहीं होगा। चीनी तकनीक ने भारत में जड़ें जमा ली हैं। हमने एक ऐसी फैक्टरी भी खोज निकाली है जो “ऑल पास सिरप” बना सकती है। अन्य भी बहुत से लोग इस जुगत में होंगे। इसलिए, हमें और कदम उठाने की जरूरत है।

दूसरा कदम : सख्त मानकों, टेस्टिंग की मदद से निगरानी को मजबूत किया जाए। शहद बेचने वाली हर कंपनी के लिए शहद के स्रोत का पता लगाना अनिवार्य किया जाए, चाहे वह मधुमक्खी पालक हों या छत्ते।

नि:संदेह शहद उद्योग तर्क देगा कि वह कानून के दायरे में काम कर रहा है। बड़े ब्रांडों के अधिकांश शहद के नमूनों ने भारत में निर्धारित परीक्षणों को पास किया है। लेकिन उन्नत प्रयोगशाला की जांच बताती है कि इनमें मिलावट की गई है।

इसे जांचने के तीन तरीके हैं :

पहला, शहद के मानकों और परीक्षण की आवश्यकताओं को और सख्त किया जाए। इसके लिए एफएसएसएआई को ट्रेस मार्कर फॉर राइस सिरप (टीएमआर) परीक्षण को शामिल करना होगा। दुर्भाग्य से 2018 से 2020 के बीच के संशोधन मानक में इस मापदंड को हटा दिया गया है। न्यूक्लियर मैग्नेटिक रेजोनेंस (एनएमआर) को अनिवार्य करना भी जरूरी है। निर्यात होने वाले शहद में इसका इस्तेमाल पहले से किया जा रहा है।

वर्तमान में इन उपायों की सख्त करने की जरूरत है, बाद में इन्हें लागू करके सीमित नतीजे ही हासिल हो पाएंगे। हमने देखा है कि कैसे उद्योग मिलावट के नए-नए रास्ते ईजाद कर रहे हैं। यह खबर भी सुनने में आ रही है कि चीन की कंपनियों ने एनएमआर परीक्षण को मात देने वाले सिरप भी “डिजाइन” कर लिए हैं। जब तक एनएमआर अनिवार्य नहीं हो जाता, तब तक एनएमआर पास सिरप ही इस्तेमाल किए जाएं।

दूसरा तरीका है जांच और उसके आंकड़े सार्वजनिक करना। हमें लगता है कि इस तरीके को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। एफएसएसएआई को बाजार से नमूने खरीदने और जांच के नतीजे सार्वजनिक पटल पर रखने होंगे। साथ ही मिलावटी शहद बेचने व भ्रामक दावा करने वाली कंपनियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करनी होगी। अगर टीएमआर और एनएमआर को अनिवार्य नहीं किया जाता, तब आधिकारिक टेस्टिंग सिस्टम में इन्हें शामिल करना चाहिए। यह सार्वजनिक है और उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए की जाती है।

तीसरा और बहुत जरूरी उपाय है खाद्य प्रणाली दृष्टिकोण। ऐसा करने के लिए शहद की आपूर्ति श्रृंखला में एक पारदर्शिता और सबकी पहुंच वाली प्रणाली की आवश्यकता है। सभी उत्पादकों को शहद के वानस्पतिक स्रोत के साथ उसके भौगोलिक स्थान को जानना होगा।

उपभोक्ताओं सहित सभी स्टेकहोल्डरों को इसकी जानकारी होनी चाहिए। आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े संग्रहकर्ता, व्यापारी, पैकर और विक्रेताओं आदि का रिकॉर्ड रखना चाहिए और यह निरीक्षण के लिए भी उपलब्ध होना चाहिए। अगर प्रत्येक मधुमक्खी पालक पंजीकृत हो, प्रत्येक मधुमक्खी के बॉक्स में नंबर या कोड हो तो इसे संभव किया जा सकता है। तकनीक के माध्यम से इनकी लोकेशन पता लगाई जा सकती है। इसके अलावा सभी कंपनियों को शहद की ट्रेसेबिलिटी के लिए बाध्य किया जाए। साथ ही सरकार के पास एक ऐसा तंत्र होना चाहिए जो देश में मधुमक्खी पालकों द्वारा उत्पादित शहद को ट्रेस कर सके। इस मामले में हम सबसे कमजोर हैं। हमारे पास तो शहद उत्पादन का सटीक आंकड़ा भी नहीं है। ऐसा तब है जब कई सरकारी एजेंसियां इस व्यवसाय से जुड़ी हैं (देखें “शहद के उत्पादन से अनजान सरकार”)।

तीसरा कदम : हम उपभोक्ताओं को शहद को समझना होगा। हमें इस लायक बनना होगा कि स्वाद, रंग और गंध से मिलावट पता लगा सकें। हमें शुद्ध शहद की मांग करनी होगी, रिफाइंड शहद की नहीं जो कोई सिरप हो सकता है

उपभोक्ताओं की प्राथमिकताएं शहद के कारोबार को आकार दे रही हैं। हम साफ दिखने वाला तरल शहद पसंद करते हैं जो क्रिस्टलाइज न हो। हमारी लापरवाही से ही शहद में मिलावट का धंधा फलता-फूलता है। हमें जानना होगा कि जो शहद क्रिस्टलाइज नहीं होती, वह शुद्धता की गारंटी नहीं है। क्रिस्टलाइजेशन शहद में प्राकृतिक रूप से होता है, इसे फैक्टरी में प्रोसेसिंग के जरिए न्यूनतम कर दिया जाता है। हमारी गलत पसंद बड़ी कंपनियों को मदद पहुंचाती है। वे शहद में अल्ट्रा फिल्टर्ड रंगहीन सिरप बेधड़क मिलाती हैं। ऐसा करके ही बड़ी कंपनियां शहद बना रही हैं। अपनी नासमझी से हम खुद का ही नुकसान कर रहे हैं।

अब हमें बदलाव की मांग करनी होगी। हमें सरकार और उद्योग को जवाबदेह बनाना होगाा। हमें याद रखना होगा कि बहुत कुछ दाव पर लगा है। यह हमारे स्वास्थ्य के साथ हमारी खाद्य प्रणाली के स्वास्थ्य का भी मामला है। हमें समझना होगा कि मधुमक्खियों के बिना उत्पादकता नहीं रहेगी।

शहद के उत्पादन से अनजान सरकार

शहद के उत्पादों के आंकड़े कमजोर हैं, इसलिए नियमन भी कमजोर है

भारत में शहद का उत्पादन बढ़ाने और मधुमक्खी पालकों को आजीविका देने की जिम्मेदारी राष्ट्रीय मधुमक्खी बोर्ड (एनबीबी) की है। बोर्ड कहता है कि 2018-19 में भारत में कुल शहद का उत्पादन 1,15,000 मीट्रिक टन था। दूसरी ओर, संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) के डेटाबेस से पता चलता है कि भारत ने इस साल लगभग 67,500 मीट्रिक टन शहद का उत्पादन किया। एनबीबी का अनुमान एफएओ के अनुमान से 1.7 गुना अधिक है। इतना अधिक अंतर आंकड़ों को जुटाने और उत्पादन गणना की मूलभूत समस्या की ओर इशारा करता है।

एनबीबी के ऐतिहासिक आंकड़ों पर नजर डालने पर पता चलता है कि 2013-14 की तुलना में उत्पादन में बहुत वृद्धि हुई है। उदाहरण के लिए 2007-08 में उत्पादन 62,000 मीट्रिक टन था जो 2012-13 में 72,300 मीट्रिक टन हो गया। इस दौरान वार्षिक वृद्धि दर 0-4.8 प्रतिशत थी। वहीं 2013-14 में 76,200 मीट्रिक टन उत्पादन हुआ। 2018-19 के लिए नवीनतम आंकड़े वार्षिक वृद्धि दर 5.3-11.1 प्रतिशत बताते हैं।

प्रधानमंत्री की आर्थिक परिषद के अध्यक्ष बिबेक देबरॉय की अध्यक्षता में बी कीपिंग डेवलपमेंट कमिटी की जून 2019 की रिपोर्ट में पाया गया था कि एनबीबी उत्पादन डेटा विभिन्न राज्यों में अग्रणी मधुमक्खी पालकों से प्राप्त अनुमानों पर आधारित है, जो एकत्रित और व्यक्त किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि शहद उत्पादन का आंकड़ा वैज्ञानिक तरीके से नहीं जुटाया गया है। इसे एक व्यवस्थित दृष्टिकोण की आवश्यकता है। एनबीबी व एफएओ के आंकड़े में विसंगति को वैज्ञानिक रूप से सत्यापित करने की जरूरत है। रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि शहद उत्पादन का अनुमान लगाने का एक बेहतर तरीका मधुमक्खी पालन करने वालों की संख्या, मधुमक्खी के छत्ते और कॉलोनी, जंगली शहद के छत्ते, घरेलू छत्ते पता लगाकर किया जा सकता है। इससे शहद उत्पादन का वास्तविक आंकड़ा पता करने में मदद मिलेगी।

अभी वास्तविक आंकड़े न होने पर यह पता लगाना लगभग असंभव है कि बाजार में कितनी मिलावटी शहद है। शहद की धोखाधड़ी को दूर करने के लिए यह जानना अक्सर जरूरी होता है। ट्रेसेबिलिटी का सिस्टम बनाना भी असंभव है। मधुमक्खी को जानना उतना ही जरूरी है जितना शहद खाना।