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पीपीपी मोड का इंतजार कर रही हैं उत्तराखंड की स्वास्थ्य सेवाएं

उत्तराखंड के सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं हैं। गर्भवती महिलाओं के लिए आईसीयू नहीं है। सीटी स्कैन मशीनें नहीं चल रही हैं, क्योंकि अस्पतालों को पीपीपी मोड पर चलाने की तैयारी है

By Manmeet singh

On: Monday 25 November 2019
 
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए कतारों में लगे लोग। फाेटो: मनमीत
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए कतारों में लगे लोग। फाेटो: मनमीत उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए कतारों में लगे लोग। फाेटो: मनमीत

उत्तरकाशी के सुदूर पूर्व सीमांत इलाका सरबडियार क्षेत्र में डिंगाडी गांव से 54 साल की शकुंतला देवी उपचार के लिये अपने बड़े पुत्र कैलाश रावत संग देहरादून के दून मेडिकल कॉलेज में आई हुई है। उनके छाती में दर्द रहता है। अपने गांव से 200 किलोमीटर का सफर कर उन्हें पहले उत्तरकाशी जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन जरूरी उपकरण और विशेषज्ञ डाक्टर न होने के चलते उन्हें 250 किलोमीटर दूर देहरादून के लिये रेफर कर दिया गया। दर्द से कराह रही शकुंतला देहरादून में दून अस्पताल पहुंची तो उन्हें बताया गया कि दून अस्पताल में भी वो जांच मशीन खराब पड़ी हुई है। जिसकी उन्हें जरूरत है। अटल आयुष्मान कार्ड साथ लेकर आये परिवार के सामने अब सकंट है कि वो निजी लैब में सिटी स्कैन कैसे कराये। क्योंकि इतनी लंबी यात्रा करने में ही उनका पूरा पैसा खत्म हो गया है।

अकेले शकुंतला देवी ही नहीं, ऐसे कई मरीज हर दिन रुद्रप्रयाग, टिहरी, चमोली, पौड़ी, हरिद्वार और श्रीनगर से राज्य के सबसे बड़े दून अस्पताल को रेफर किये जाते हैं। लगभग एक करोड़ बीस लाख की आबादी वाले राज्य उत्तराखंड में दम तोड़ती स्वास्थ्य सेवाओं का हाल इस कदर बदहाल है कि गढ़वाल मंडल की लगभग अस्सी लाख जनसंख्या के लिये राजधानी देहरादून में महज पांच बेड का आईसीयू है। इससे भी दयनीय स्थिति महिलाओं की है। राज्य के किसी भी प्रसव केंद्र में गर्भवती महिला की स्थिति बिगडऩे पर आईसीयू ही नहीं है। गढ़वाल मंडल के सभी सरकारी अस्पतालों में सीटी स्केन मशीन खराब पड़ी हुई है। खराब मशीनों की मरम्मत की फाइल सचिवालय में धूल फांक रही है। लेकिन एक साल बीत जाने के बावजूद, फाइल इधर से उधर नहीं की गई।

स्वास्थ्य विभाग के प्रभारी सचिव डॉ. पंकज पांडेय बताते हैं कि अस्पतालों की सीटी स्कैन मशीन बार बार खराब हो रही है। इसलिये नई सीटी स्कैन खरीदने के बजाये सरकार इन्हें पीपीपी मोड पर देने जा रही है। टिहरी जिला अस्पताल पीपीपी मोड पर दिया जा चुका है। अन्य जिलों में भी जल्द ही सीसी स्कैन मशीन ठीक या नई खरीद ली जाएगी। चिकित्सा शिक्षा निदेशालय को इस काम को जल्द से जल्द करने को कहा गया है। ताकि मरीजों को दिक्कत न उठानी पड़े। दून मेडिकल कॉलेज के चिकित्सा अधीक्षक डा केके टम्टा बताते हैं आठ माह से अस्पताल में सीसी स्कैन मशीन खराब पड़ी हुई है। मरीजों को मशीन खराब होने से बड़ी दिक्कत हो रही है। कई बार शासन को इस संबंध में लिखा गया है।

कुछ दिनों पूर्व ही नीति आयोग ने देश के सभी राज्यों से संबंधित स्वास्थ्य सेवा रिपोर्ट जारी की थी। जिसमें केरल, महाराष्ट्र, पंजाब, गुजरात और आंध्रा प्रदेश में सबसे बेहतर स्वास्थ्य सेवायें है। जबकि उत्तराखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं का सबसे बुरा हाल है। उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में सात जिले आते हैं। जिसमें देहरादून, हरिद्वार, उत्तरकाशी, पौड़ी, टिहरी, रुद्रप्रयाग और चमोली है। उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग और पौड़ी के जिला अस्पतालों में विशेषज्ञ डाक्टरों की भारी कमी है। श्रीनगर मेडिकल कॉलेज की सीटी स्कैन मशीन पिछले दो साल से बंद पड़ी हु़ई है। जबकि पौड़ी की आठ महीनों से खराब है।

राज्य का सबसे बड़ा अस्पताल दून मेडिकल कॉलेज में सीटी स्कैन मशीन पिछले नौ माह से खराब पड़ी हुई है। जिसके कारण अस्पताल में भर्ती गरीब मरीजों को अगर डाक्टर सीटी स्कैन की जांच लिखकर देता है तो उसे पहले निजी वाहन में बैठाकर प्राइवेट लैब में सीटी स्कैन के लिये ले जाना होता है। जिसमें गरीब मरीज के तिमारदार को पांच से सात हजार रुपये तक खर्च करने होते हैं। मरीज के पास अगर बीपीएल कार्ड या अटल स्वास्थ्य कार्ड भी हो, तो भी निजी केंद्र में उसे पूरी फीस चुकानी पड़ती है।  राज्य में स्वास्थ्य मंत्रालय की जिम्मेदारी खुद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के पास है।  

राज्य में सरकारी अस्पतालों में एक भी हृदय रोग विशेषज्ञ नहीं है। वैसे मैदानी इलाकों में सात हृदयरोग विशेषज्ञ हैं। लेकिन उनके पास पीजी डिग्री न होकर डिप्लोमा है। जिस पर एमसीआई कई बार आपत्ति भी करती है। इसी तरह न्यूरो सर्जन, गेस्ट्रो सर्जन, बाल रोग विशेषज्ञ, स्वास रोग विशेषज्ञ, फिजिशियन आदि विशेषज्ञ भी केवल देहरादून आकर ही मिलते है। पर्वतीय जिलों में विशेषज्ञ डाक्टर उपलब्ध नहीं है। अगर किसी को जरूरत पड़ती है तो उसे सैकड़ों किलोमीटर का सफर कर दून या हल्द्वानी तक पहुंचना होता है। स्वास्थ्य महानिदेशक डा अमिता उप्रेती बताती है कि कई विशेषज्ञ डाक्टरों से बात चल रही है। उन्हें ज्वाइन कराया जा रहा है। पीपीपी मोड पर जो अस्पताल दिये गये हैं या दिये जा रहे हैँ, वहां पर भी विशेषज्ञ डाक्टरों की नियुक्ति होनी है।

सबसे बुरी हालत गर्भवती महिलाओं की

उत्तराखंड को मातृसत्तात्मक समाज माना जाता है। मतलब महिलाओं को सम्मान देने वाला समाज। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। राज्य में किसी भी महिला अस्पताल में आईसीयू की व्यवस्था ही नहीं की गई है। अगर प्रसव के दौरान किसी महिला के साथ अप्रिय स्थिति हो जाती है तो उसे एंबुलेंस में डालकर निजी अस्पतालों के आईसीयू में भर्ती कराया जाता है। जहां आईसीयू का एक दिन की फीस लगभग दस से 15 हजार रुपये होती है। एमसीआई के मानकों के अनुसार, दून मेडिकल कॉलेज में ही 35 बेड का आईसीयू होना चाहिये। लेकिन 70 लाख की आबादी वाले गढ़वाल मंडल के लिये महज पांच बेड का आईसीयू है। जिसमें बेड पाने के लिये कई बार मरीज के तिमारदार मुख्यमंत्री कार्यालय तक की सिफारिश ले आते हैं। दून अस्पताल प्रशासन इन सिफारिशों से बेहद दबाव में रहता है। चिकित्सा अधीक्षक डा केके टम्टा बताते हैं कि अधिकांश समय पांचों बेड फुल रहते हैं। ऐसे में किसी की सिफारिश आ जाये तो किस मरीज को बेड से हटायें। क्योंकि आईसीयू में जो मरीज भर्ती होता है। निश्चित तौर पर वो गंभीर होगा। ऐसे में बड़ी विकट समस्या आ जाती है।

गंगोत्री से बीस किलोमीटर पहले पडऩे वाला मुखवा गांव के हर्षमणि सेमवाल बताते हैं कि अगर उनके परिवार में कोई बीमार हो जाये तो उसे 350 किलोमीटर दूर देहरादून जांच के लिये ले जाना पड़ता है। इसलिये उनके गांव से कई लोग देहरादून और अन्य मैदानी इलाकों के लिये पलायन कर चुके हैं। सेमवाल बताते हैं कि गांव में रहना अब बहुत मुश्किल हो गया है। सरकार इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रही है।