Pollution

सुसवा नदी में बह कर आ रहा है प्लास्टिक, खेती को नुकसान

उत्तराखंड की सूख चुकी नदियों में शामिल सुसवा नदी में बरसात के बाद पानी आया तो यह पानी लोगों के लिए मुसीबत बन गया 

 
By Varsha Singh
Last Updated: Wednesday 14 August 2019
बारिश के बाद उत्तराखंड की सुसवा नदी पर बहकर आता है कूड़ा। फोटो: वर्षा सिंह
बारिश के बाद उत्तराखंड की सुसवा नदी पर बहकर आता है कूड़ा। फोटो: वर्षा सिंह बारिश के बाद उत्तराखंड की सुसवा नदी पर बहकर आता है कूड़ा। फोटो: वर्षा सिंह

जो नदी कभी अपने साग और मछलियों के लिए जानी जाती थी, जिस नदी का पानी दून बासमती में ख़ुशबू भर देता था, बरसात के इन दिनों में भी देहरादून की इस सुसवा नदी के किनारे बिना मुंह पर रूमाल रखे खड़े नहीं हो सकते। बरसात की शुरुआत में जब निष्प्राण हो चुकी इस नदी में पानी भरना शुरू हुआ तो प्लास्टिक, थर्माकोल समेत इतना कचरा बह रहा था कि सचमुच सुसवा कचरा-मैला ढोने वाली नदी दिखाई दे रही थी। इस नदी की दशा सुधारने और इसे नमामि गंगे प्रोजेक्ट में शामिल के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय को कई पत्र लिखे जा चुके हैं। 

देहरादून की दुधली घाटी के किसान उम्मेद बोरा कहते हैं कि हमारी दून बासमती की धाक कभी दुनियाभर में होती थी। एक घर में चावल पकता था तो कई घरों तक उसकी खुशबू जाती थी। लेकिन दून बासमती की ख़ुशबू उड़ने और इसकी पैदावार कम होने के पीछे एक वजह सुसवा नदी भी है। इसी नदी का प्रदूषित जल खेतों में पहुंचता है। उम्मेद कहते हैं कि बारिश में किसी समय ऐसा भी होता है कि नहर के ज़रिये खेतों तक पहुंचे सुसवा नदी के पानी में इतनी ज्यादा प्लास्टिक आती है कि पूरे खेतों में प्लास्टिक ही प्लास्टिक बिछ जाती है। सिर्फ प्लास्टिक ही नहीं मेडिकल वेस्ट भी कई बार नहर के ज़रिये खेतों तक पहुंचता है। वो कहते हैं कि गंदले पानी से दून घाटी की साग-सब्जियों का ज़ायका बिगड़ गया है। जानवर भी अब उसका पानी नहीं पीते।

दुधली घाटी की किसान कमला देवी और उनके पति के पास खेती के लिए अपनी ज़मीन नहीं है। वे यहां रहनेवाले स्थानीय व्यक्ति के खेत में मेहनत करते हैं। जो भी पैदावार होती है, उसका एक छोटा हिस्सा उन्हें मिलता है बाकि खेत का मालिक ले लेता है। कमला देवी बताती हैं कि सुसवा के प्रदूषित जल की वजह से गांव के लोगों को कई तरह की त्वचा संबंधी बीमारियां हो रही हैं। गंदे पानी का असर यहां उगने वाली साग-सब्जियों के स्वाद पर भी पड़ा है। 

दुधली गांव की प्रधान अंजू कहती हैं कि सुसवा नदी की बदहाली ने लोगों से रोजगार भी छीन लिया है। वे मछलियां बेचकर अपना गुजारा कर लेते थे। लेकिन अब यहां से लोग बाहर निकल रहे हैं। पहले यहां की सब्जियां दिल्ली तक भेजी जाती थीं। लेकिन अब लोग सिर्फ अपने खाने भर की ही सब्जियां उगा रहे हैं।

उत्तराखंड पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक वर्ष 2019 देहरादून के मोथरोवाला क्षेत्र में सुसवा नदी में में जनवरी से जून के बीच पीएच लेवल अधिकतम 8.15 और न्यूनतम 7.79 रहा। बीओडी न्यूनतम 26 और अधिकतम 30 मिलीग्राम प्रति लीटर आंकी गई। टोटल डिजॉल्व्ड सॉलिड 328 मिलीग्राम प्रति लीटर, फेकल कॉलीफ़ॉर्म 8.15 एमपीएन/100 मिली लीटर और कुल कॉलीफॉर्म 1600 (एमपीएन/100 मिली लीटर) से कम आंका गया।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों के मुताबिक पानी में बीओडी यानी बायो-केमिकल ऑक्सीजन डिमांड 3 मिलीग्राम/लीटर से कम होनी चाहिए। जबकि सुसवा नदी के पानी में ये 26 से 30 मिलीग्राम प्रति लीटर तक है। इसी तरह पानी की स्वच्छता का आंकलन कॉलीफॉर्म स्तर से भी किया जाता है। सी ग्रेड का पानी वो होता है जिसमें कुल कॉलीफॉर्म 5000 एमपीएन/100 मिली लीटर या उससे कम हो। यहां सुसवा का पानी सी ग्रेड में है। पीएच लेवल के मानकों के आधार पर सिंचाई के लिहाज से ये डी और ई ग्रेड में आता है।

दुधली घाटी में रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता अजय कुमार ने पिछले वर्ष आरटीआई के ज़रिये जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय से सुसवा नदी में प्रदूषण नियंत्रण को लेकर जानकारी मांगी थी। जिस पर मंत्रालय की ओर से बताया गया कि सुसवा नदी में प्रदूषण नियंत्रण का कोई भी प्रस्ताव एनएमसीजी (नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा) में नहीं आया है। अजय इस मामले में प्रधानमंत्री कार्यालय को कई पत्र लिख चुके हैं। 19 जुलाई को भी उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय को इस मसले पर पत्र लिखा। जिसे जलशक्ति मंत्रालय भेजने की बात कही गई है। अजय कहते हैं कि सुसवा के प्रदूषण का असर भूजल पर भी पड़ा है। उन्होंने बताया कि सुसवा किनारे बसे खट्टा पानी, कैमरी, दूधली, नागल, शिमलाश, झड़ौंद, सत्तीवाला, बुल्लावाला,झगरावाला समेत कई गांवों के किसानों के पास सिंचाई का कोई साधन ही नहीं बचा है। किसान सुसवा नदी के पानी से ही खेतों में सिंचाई करते हैं।

सुसवा नदी का उदगम शिवालिक घाटी से होता है। नदी का नाम यहां पैदा होने वाले सुसवा साग के कारण पड़ा था, जिसे लोग खाते थे। देहरादून की रिस्पना और बिंदाल नदियां भी आगे चलकर सुसवा में मिल जाती हैं। फिर सुसवा लच्छीवाला क्षेत्र में सौंग नदी में मिल जाती है। यहां से आगे रायवाला क्षेत्र में गंगा में मिल जाती है। यहां गंगा स्वच्छता अभियान पर भी सवाल है। जब तक गंगा की सहायक नदियां नहीं साफ नहीं होंगी। गंगा कैसे साफ हो सकती है। सीवर की तरह दिखाई देनेवाली सुसवा का पानी आगे चलकर गंगा के पानी को भी मैला कर रहा है।

सुसवा नदी पर एक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट भी लगा हैं। सामाजिक कार्यकर्ता अजय कुमार बताते हैं कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की भी खानापूर्ति कर दी गई। गांवों में प्लांट के लिए ज़मीन न मिलने पर दून विश्वविद्यालय के पास ये प्लांट लगाया गया है। जहां एक-दो नालों का पानी ही जाता है। उनके मुताबिक उसका भी ट्रीटमेंट सही तरह से नहीं होता है। सुसवा नदी में कुल पांच नाले गिरते हैं।

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