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बांग्लादेशी नदियों में मिले भारी मात्रा में एंटीबायोटिक्स, स्वास्थ्य के लिए हैं बड़ा खतरा

बांग्लादेश जैसे देशों में आज भी इन दवाओं को लेकर कोई तय मानक और नियम नहीं हैं। जिसके कारण आज भी बिना किसी रोकटोक के स्वास्थ्य और कृषि क्षेत्र में रोगाणुरोधी दवाओं का धड़ल्ले से उपयोग हो रहा है

By Lalit Maurya

On: Monday 13 April 2020
 
खेतों तक भी पहुंच चुके हैं एंटीबायोटिक्स के अंश, साभार: बलराम महाल्दर (CC BY-SA 3.0)
खेतों तक भी पहुंच चुके हैं एंटीबायोटिक्स के अंश, साभार: बलराम महाल्दर (CC BY-SA 3.0) खेतों तक भी पहुंच चुके हैं एंटीबायोटिक्स के अंश, साभार: बलराम महाल्दर (CC BY-SA 3.0)

बांग्लादेश में पानी के स्रोतों जैसे तालाब, नहरों, झीलों, नदियों में एंटीबायोटिक्स दवाओं और केमिकल्स के भारी मात्रा में अंश मिले हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि सतह की जल सम्पदा में मौजूद यह एंटीबायोटिक स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा हो सकते हैं। जिससे देश में एंटीबायोटिक रेसिस्टेन्स का खतरा बढ़ सकता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार एंटीबायोटिक रेसिस्टेन्स से तात्पर्य है कि बैक्टीरिया, फंगी, वायरसों और परजीवियों पर एंटीबायोटिक दवाओं का बेअसर होना। ऐसा तब होता है जब गैर जरुरी होने पर भी ज्यादा मात्रा में इन एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग किया जाता है, जिसके चलते धीरे धीरे यह सभी बीमारी फ़ैलाने वाले घटक इन एंटीबायोटिक दवाओं के प्रतिरोधी हो जाते हैं और उनपर इन दवाओं का असर नहीं होता है। जिसके कारण संक्रामक रोगों की रोकथाम, उपचार और प्रसार को रोकना मुश्किल हो जाता है।

शोध के अनुसार जिस तरह से एंटीबायोटिक्स का उपयोग बढ़ रहा है, उसने इस समस्या को और बढ़ा दिया है। इन देशों में आज भी इन दवाओं को लेकर कोई तय मानक और नियम नहीं हैं। यहां आज भी बिना किसी रोकटोक के स्वास्थ्य और कृषि क्षेत्र में धड़ल्ले से इन रोगाणुरोधी दवाओं का उपयोग हो रहा है। वहीँ दूसरी ओर उचित प्रबंधन के आभाव में इन दवाओं के अपशिष्ट तेजी से भूमि और साफ़ जल स्रोंतों को भी दूषित करते जा रहे हैं। यही वजह है कि बांग्लादेश और भारत जैसे देशों में एंटीबायोटिक रेसिस्टेन्स का खतरा तेजी से बढ़ता जा रहा है।

पानी में मिली सिप्रोफ्लोक्सिन और क्लैरिथ्रोमाइसिन जैसे एंटीबायोटिकों की भारी मात्रा

यह अध्ययन साइंस ऑफ द टोटल एनवायरनमेंट जर्नल में प्रकाशित हुआ है। जिसके अनुसार ग्रामीण और शहरी बांग्लादेश के सतही जल में सिप्रोफ्लोक्सिन और क्लैरिथ्रोमाइसिन एंटीबायोटिक की भारी मात्रा मिली है। इसके अलावा पानी में एमोक्सिलिन, क्लिंडामाइसिन, लिनकोमाइसिन, लाइनज़ोलिड, मेट्रोनाइडाजोल, मोक्सीफ्लोक्सिन, नेलीडिक्सिस एसिड और सल्फापिरीडीन जैसे एंटीबायोटिक भी पाए गए हैं। इस अध्यन के लिए शोधकर्ताओं ने अप्रैल से मई 2019 के बीच तालाबों, नहरों, झीलों, नदियों, सबमर्सिबल पंपों और अपशिष्ट जल शोधन संयंत्रों के पास से कुल 17 नमूने लिए थे, जिन्हें क्रोमैटोग्राफी-मास स्पेक्ट्रोमेट्रिक तकनीक की मदद से विश्लेषित किया गया है। इस अध्ययन से जुडी प्रमुख शोधकर्ता और स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ़ न्यूयॉर्क की शोधकर्ता लुइसा एंजिल्स के अनुसार, "चूंकि इन जल स्रोतों का उपयोग इंसानों, पशुओं और सिंचाई के लिए मुख्य रूप से किया जाता है। इसलिए इनमें मौजूद एंटीबायोटिक के अंश ने केवल बीमारियों का कारण बनते हैं। साथ ही यह एंटीबायोटिक रेसिस्टेन्स को भी बढ़ा रहे हैं।"

उनके अनुसार अस्पतालों और वेस्टवाटर ट्रीटमेंट प्लांट से निकलने वाले अपशिस्ट जल के साथ यह एंटीबायोटिक्स वातावरण में मिल रहे हैं। वहीँ शोध के अनुसार गैर-एंटीबायोटिक दवाएं और अन्य सूक्ष्म प्रदूषक भी एंटीबायोटिक-प्रतिरोध के खतरे को और बढ़ा रहे हैं। इसके साथ ही पानी के नमूनों में कृषि में प्रयोग होने वाले पांच प्रकार के फंगीसाइड - हेक्साकोनाज़ोल, इमिडाक्लोप्रिड, प्रोपिकोनाज़ोल, टेब्यूकोनाज़ोल और ट्राईसाइक्लाज़ोल भी प्रमुखता से मिले हैं। जिन्हें खेतों में कीड़ों को मरने के लिए बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है। अध्ययन के अनुसार जल स्रोतों में इन एंटीफंगल का मिलना एक बड़ी समस्या को जन्म दे सकता है क्योंकि इनके कारण बड़े स्तर पर कैंडिडा ओरिस जैसे मल्टी ड्रग रेसिस्टेन्स बीमारियां हो सकती है। गौरतलब है कि हाल ही में दुनिया भर में इस बीमारी के मामले सामने आये थे।

गौरतलब है कि अभी कुछ समय पूर्व भारत में भी नई दिल्ली स्थित गैर लाभकारी संस्था सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) ने भी अपने अध्ययन में बताया था कि पोल्ट्री इंडस्ट्री में एंटीबायोटिक दवाओं के बड़े पैमाने पर अनियमित उपयोग के कारण भारतीयों में एंटीबायोटिक रेसिस्टेन्स के मामले बढ़ रहे हैं । जानी मानी पर्यावरणविद और सीएसई की डायरेक्टर जनरल सुनीता नारायण ने भी इस बारे में बताया कि एंटीबायोटिक्स का प्रयाग आज मनुष्यों की दवाई तक ही सीमित नहीं है । आज कई जगह इनका धड़ल्ले से प्रयोग किया जा रहा है उदाहरण के लिए, पोल्ट्री इंडस्ट्री में मुर्गियों पर बड़े पैमाने पर इनका प्रयोग किया जा रहा है, जिससे मुर्गियों का वजन बढ़ सके और उनका जल्दी विकास हो सके । सीएसई लैब द्वारा अध्ययन किये गए, चिकन के 40 फीसदी नमूनों में एंटीबायोटिक दवाओं के अंश पाए गए थे।

इस खतरे से निपटने के लिए जरुरी है कड़े मानक और नियम

इस खतरे से निपटना अत्यंत जरुरी है। क्योंकि जिस तेजी से एंटीबायोटिक रेसिस्टेन्स का खतरा बढ़ रहा है, उस तेजी से नयी एंटीबायोटिक दवाओं का निर्माण नहीं हो सकता। ऐसे में इनको रोकना ही सबसे बेहतर उपाय है। बांग्लादेश और भारत जैसे देशों को चाहिए कि वो तेजी से बढ़ते इन एंटीबायोटिक्स के इस्तेमाल को सीमित करें। साथ ही इनसे जुड़े नियमों और मानकों को और कड़ा किया जाये। जिससे उनके अनुचित उपयोग को रोका जा सके।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के सुझावों के मुताबिक एंटीबायोटिक दवाईयां केवल तब दी जानी चाहिए, जब मरीजों को वास्तव में उनकी जरूरत हो। डॉक्टर को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे बीमारी का इलाज करने के लिये सही एंटीबायोटिक निर्धारित कर रहे हैं। साथ ही कृषि और अन्य क्षेत्रों में इस तरह की दवाओं और फंगीसाइड के उपयोग को नियंत्रित किया जाये। वहीँ इनके अपशिष्टों के भी उचित प्रबंधन की व्यवस्था की जाये जिससे यह जल और वातावरण को दूषित न कर सकें। हमें इस आने वाले खतरे से निपटने के लिए आज से ही तयारी करनी होगी। जिससे आने वाले वक्त में एंटीबायोटिक रेसिस्टेन्स जैसे समस्या का सामना न करना पड़े|