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पर्यावरण मुकदमों की डायरी: 628 किमी लंबी गाेमती नदी पर 25 जगह निगरानी

पर्यावरण से संबंधित मामलों में अदालतों में हुई सुनवाई का सार

By Susan Chacko, Dayanidhi

On: Friday 12 June 2020
 

गोमती नदी के प्रदूषण को रोकने के उपायों को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव द्वारा एक रिपोर्ट 11 जून, 2020 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की वेब साइट पर अपलोड की गई है

28 नवंबर, 2019 को उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और शहरी विकास विभाग द्वारा एक रिपोर्ट दायर की गई। रिपोर्ट को देखते हए उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव, ने शहरी विकास विभाग के प्रधान सचिव को संज्ञान लेने का निर्देश दिया। मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश सरकार के पत्र 28 नवंबर , 2019 के माध्यम से गोमती नदी में प्रदूषण को रोकने के लिए तत्काल कार्रवाई करने के लिए कहा गया। जिसमें गोरखपुर में गोमती और रामगढ़ ताल में गिरने वाले अनियंत्रित नालों का जैव-शोधन शुरू करना और नालियों के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) की स्थापना के लिए एक समय सीमा तय करना शामिल है। प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण के लिए, समय-समय पर इसकी नियमित रूप से समीक्षा की जानी भी शामिल है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि गोमती के प्रदूषित नदी खंड की पहचान केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने की है। जो सीतापुर से लेकर  कैथी गांव, जिला गाजीपुर, गंगा नदी के संगम तक है। प्रदूषित नदी खंड की लंबाई 628 किमी है।

गोमती नदी के प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए कार्य योजना क्रियान्वयन और रिवर रेजुवेनशन कमेटी, उत्तर प्रदेश द्वारा समय-समय पर निगरानी की जा रही है। इसके अलावा, पीलीभीत से वाराणसी तक 25 जगहों पर नदी की जल गुणवत्ता की नियमित रूप से निगरानी की जा रही है।

कार्य योजना के कार्यान्वयन के परिणामस्वरूप पानी की गुणवत्ता में सुधार हुआ है और अप्रैल-जून 2019 के महीनों के दौरान, 11 निगरानी जगहों में से, 7 निगरानी जगहों पर प्रदूषण स्तर कम हुआ है। सबूत के तौर पर, रिपोर्ट में उक्त अवधि के पानी की गुणवत्ता की निगरानी के तुलनात्मक आंकड़े भी शामिल किए हैं।

2-झारखंड में रोक के बाद भी जारी है नदी के किनारे रेत खनन

न्यायमूर्ति सोनम फिंटसो वांग्दी की पीठ ने 10 जून को झारखंड के दुमका, पाकुड़ और देवगढ़ जिलों में नदी में खनन के मामले की जांच के लिए एक संयुक्त समिति के गठन करने निर्देश दिया

एमडी रिजवान द्वारा अदालत में दायर एक आवेदन में आरोप लगाया गया था कि उपरोक्त जिलों में नदी के किनारे खनन हो रहा, यहां तक कि बरसात के मौसम में भी यह जारी है। जो कि सस्टेनेबल सैंड माइनिंग मैनेजमेंट गाइडलाइन्स, 2016 का उल्लंघन है। जबकि 2017 से ही झारखंड राज्य ने बरसात के मौसम में नदी के किनारे रेत खनन पर प्रतिबंध लगाया है, लेकिन फिर भी इन जिलों में ऐसी गतिविधिया लगातार चल रही थी।

अदालत ने पाया कि इतने साल बीतने के बाद भी, अवैध गतिविधियों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।

3-एनजीटी ने तीन महीने के अंदर सरबसुखा मौजा में जल श्रोत से अतिक्रमण हटाने का निर्देश दिया

पश्चिम बंगाल के पशिम मेदिनीपुर जिले में सरबसुखा मौज़ा में जल श्रोत का पर्यावरणीय नुकसान होने पर 11 जून को एनजीटी द्वारा इस पर संज्ञान लिया गया।

एनजीटी के आदेश पर इस मामले की जांच के लिए दो रिपोर्टे दायर की गई थीं, जिसमें जल श्रोत के अतिक्रमण का खुलासा किया गया था। पश्चिम बंगाल भूमि सुधार अधिनियम, 1955 के तहत आवश्यक अनुमति प्राप्त किए बिना इस जगह पर दुकानों का निर्माण किया गया। इसके अलावा, पश्चिम बंगाल अंतर्देशीय मत्स्य अधिनियम, 1984 के तहत भी कोई अनुमति नहीं ली गई थी।

रिपोर्ट्स को ध्यान में रखते हुए, एनजीटी ने जिला मजिस्ट्रेट को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि सभी अतिक्रमण कानून के अनुसार हटाए जाएं।

आदेश में कहा गया यदि उस जगह पर दुकानों को स्थायी तौर पर बनाया गया है तो उन्हें उचित प्रक्रिया का पालन करके ध्वस्त किया जाना चाहिए। एनजीटी द्वारा इस काम को तीन महीने के भीतर पूरा करने के लिए निर्देशित किया गया है।

4-एनजीटी ने अधिकारियों को आमी नदी के किनारे वृक्षारोपण अभियान चलाने के लिए निर्देशित किया

संभागीय वन अधिकारी, सिद्धार्थनगर, उत्तर प्रदेश ने एनजीटी से आमी नदी के 5 किमी के हिस्से के किनारे वृक्षारोपण परियोजना को पूरा करने के लिए तीन महीने का समय मांगा है यह बात प्रभागीय वनाधिकारी, सिद्धार्थनगर की ओर से दर्ज कार्रवाई रिपोर्ट में कही गई थी।

यह गोरखपुर में उत्पन्न सीवेज के कारण आमी नदी के प्रदूषण से संबंधित मामला था। एनजीटी ने 28 सितंबर, 2019 के अपने आदेश में आमी नदी के दोनों किनारों पर स्वदेशी वृक्षारोपण के लिए निर्देशित किया था और जिला अधिकारियों को जलाशय की बहाली के निर्देश दिए गए थे।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सिद्धार्थनगर वन प्रभाग द्वारा भू-आकृति विज्ञान (ज्योमोरफ़ोलॉजी) और क्षेत्र की जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल देशी वृक्षारोपण किया गया है। 19.80 हेक्टेयर के क्षेत्र में वृक्षारोपण किया गया था, जिसमें 2019-2020 में 21780 पौधे लगाए गए।