इस साल पैदा हो सकता है 5.7 करोड़ टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा, चीन की विशाल दीवार से भी ज्यादा है भारी

दुःख की बात है कि दुनिया में ज्यादातर ई-वेस्ट को ऐसे ही डंप कर दिया जाता है जो पर्यावरण के लिए एक बड़ा खतरा है 

By Lalit Maurya

On: Thursday 14 October 2021
 

डब्लूईईई के शोधकर्ताओं द्वारा लगाए गए अनुमान के अनुसार 2021 में 5.7 करोड़ टन से ज्यादा इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा हो सकता है। बेकार इलेक्ट्रॉनिक और बिजली के उपकरणों के इस पहाड़ का वजन चीन की विशाल दीवार से भी ज्यादा है, जो धरती पर मानव द्वारा निर्मित सबसे भारी चीज है। 

वहीं पिछले साल जारी ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर रिपोर्ट 2020 के अनुसार वर्ष 2019 में करीब 5.4 करोड़ मीट्रिक टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा हुआ था। यह 2014 के बाद से करीब पिछले पांच वर्षों में करीब 21 फीसदी बढ़ चुका है। वहीं अनुमान है कि  2030 तक यह बढ़कर 7.4 करोड़ मीट्रिक टन पर पहुंच जाएगा।

अकेले एशिया में 2019 के दौरान दुनिया में सबसे ज्यादा करीब 2.5 करोड़ मीट्रिक टन ई-वेस्ट उत्पन्न हुआ था। इसके बाद अमेरिका में 1.3 करोड़ टन, यूरोप में 1.2 करोड़ टन, अफ्रीका में 29 लाख टन और ओशिनिया में करीब 7 लाख टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा हुआ था। अनुमान है कि केवल अगले 16 वर्षों में ई-वेस्ट की यह मात्रा लगभग दोगुनी हो जाएगी।

वहीं यदि भारत की बात करें तो सीपीसीबी द्वारा दिसंबर, 2020 में जारी एक रिपोर्ट  से पता चला है कि 2019-20 के दौरान भारत में करीब 10.1 लाख टन ई-कचरा पैदा हुआ था। वहीं रिपोर्ट के मुताबिक, 2017-18 और 18-19 के दौरान जो ई-कचरा एकत्र किया गया था वो क्रमश: 25,325 टन और 78,281 टन था। इसका मतलब है कि भारत ने 2018 के दौरान केवल 3 फीसदी ई-वेस्ट एकत्र किया था, जबकि 2019 में यह आंकड़ा केवल 10 फीसदी था। स्पष्ट है कि देश में रीसायकल करना तो बड़ी दूर की बात है इस कचरे की एक बड़ी मात्रा एकत्र ही नहीं की जाती है। 

क्या है इस बढ़ते ई-कचरे की वजह

आज जिस तरह से दुनिया भर में इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स सामान के प्रति चाव बढ़ता जा रहा है, वो अपने आप में एक बड़ी समस्या है। समय के साथ इन उत्पादों में बड़ी तेजी से बदलाव आता है जिस वजह से इन्हें तेजी से बदला जा रहा है, नतीजन इससे पैदा होने वाला इलेक्ट्रॉनिक कचरा भी तेजी से बढ़ रहा है।

कई देशों में इन इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के मरम्मत की सीमित व्यवस्था है, यदि है भी तो इन्हें ठीक कराना बड़ा महंगा पड़ता है ऐसे में जब कोई इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद ख़राब होता है तो लोग उसे ठीक कराने की जगह बदलना ज्यादा आसान समझते हैं। यही नहीं इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों का छोटा जीवन चक्र भी एक बड़ी समस्या है। जो इस तेजी से बढ़ते इलेक्ट्रॉनिक कचरे में इजाफा कर रहा है।

ई-वेस्ट: कचरा या संसाधन    

ग्लोबल ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर रिपोर्ट के अनुसार 2019 में केवल 17.4 फीसदी ई-वेस्ट को एकत्र और रिसाइकल किया गया था। इसका मतलब है कि बाकी 82.6 फीसदी वेस्ट में मौजूद लोहा, तांबा, चांदी, सोना, टैंटलम, गैलियम, ईण्डीयुम, अट्रियम जैसी अन्य बहुमूल्य धातुओं को ऐसे ही डंप या फिर जला दिया जाता है। ऐसे में इस कचरे में मौजूद कीमती धातुएं जिनको पुनः प्राप्त किया जा सकता है वो बर्बाद चली जाती हैं। इससे संसाधनों की बर्बादी के साथ-साथ पर्यावरण पर भी दबाव बढ़ रहा है।

शोधकर्ताओं के अनुसार उदाहरण के लिए यदि हम करीब 10 लाख मोबाइल फोन को देखें तो उनमें करीब 24 किलो सोना, 16,000 किलो तांबा, 350 किलो चांदी, और 14 किलो पैलेडियम होता है, जिसे रीसायकल करके पुनः प्राप्त किया जा सकता है। वहीं यदि इसे ऐसे ही छोड़ दिया जाए तो इन संसाधनों को नए मोबाइल फ़ोन बनाने के लिए दोबारा प्राप्त करना होगा जिससे पर्यावरण पर दबाव और बढ़ जाएगा। 

यदि इस कचरे की कुल कीमत की बात करें तो वो करीब 4.3 लाख करोड़ रुपए के बराबर थी, जोकि कई देशों के जीडीपी से भी ज्यादा है। आमतौर पर इस कचरे को फेंक दिया जाता है पर यदि इसका ठीक तरीके से नियंत्रण और प्रबंधन किया जाए तो यह आर्थिक विकास में मदद कर सकता है और यह बात हमारे देश पर भी लागु होती है।  

आज जब सारी दुनिया पर्यावरण और जलवायु को लेकर चिंतित है ऐसे में यदि ई-कचरे को रीसायकल किया जाए तो न केवल पर्यावरण पर बढ़ता दबाव को कम किया जा सकता है साथ ही बढ़ते उत्सर्जन में भी कटौती की जा सकती है। डब्लूईईई के अनुसार हर टन ई-कचरे को रीसायकल करने से करीब 2 टन कार्बन उत्सर्जन को कम किया जा सकता है। इस लिहाज से देखें तो यदि 2021 में पैदा होने वाले कुल ई-वेस्ट को रीसायकल कर दिया जाए तो उससे करीब 11.4 करोड़ टन कार्बन उत्सर्जन को रोका जा सकता है। 

1 डॉलर = 75.23 भारतीय रुपए