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बचपन में मकड़ी देखकर उपजे जुनून ने बनाया वैज्ञानिक

पांच दशकों से देशभर में पाए जाने वाले सैकड़ों प्रकार के स्पाइडर (मकड़ियों) पर काम कर रहे वैज्ञानिक डॉ. सुमित चक्रवर्ती की दास्तान

By Anil Ashwani Sharma

On: Friday 14 February 2020
 

 डॉ. सुमित चक्रवार्ती लगभग पांच दशकों से देशभर में पाए जाने वाले सैकड़ों प्रकार के स्पाइडर (मकड़ियों) पर काम कर रहे हैं। न केवल शोध कर रहे हैं बल्कि अब तक 150 से अधिक प्रजाति के स्पाइडर एकत्रित कर देश का पहला मकड़ालय (अरेकनेरियम) तैयार किया है। उनसे डाउन टू अर्थ ने बातचीत की। प्रस्तुत हैं, प्रमुख अंश

 

आप को सबसे पहले मकड़ियों ने कब आकर्षित किया ?

जब मैंने मकड़ों पर काम शुरू किया था तो लोग मुझसे सवाल पूछते थे कि इतने विषयों को छोड़ कर मैं मकड़ों पर क्यों काम कर रहा हूं। मकड़े देखने में भी अच्छे नहीं लगते हैं। तब मैंने उन्हें बताया कि सातवीं कक्षा से ही मुझे मकड़े आकर्षित करने लगे थे। फिर मेरे माता-पिता ने भी मेरा बहुत साथ दिया। वे मकड़ों पर आधारित तमाम देशी-विदेशी किताबें लाकर देते थे। शिक्षक भी मुझे प्रोत्साहित करते थे। किसी ने भी हतोत्साहित नहीं किया।

क्या आपकी स्कूली दिनों से ही मकड़ियों के बारे में दिलचस्पी पैदा हो गई थी?

जब नौवीं कक्षा में था, तभी मकड़ों पर मेरी खास नजर थी। उस वक्त मैं बंगाल में था। हमारी कक्षा के दूसरे छात्रों की भी प्रकृति में बहुत दिलचस्पी थी। किसी को पक्षियों में रुचि थी, तो किसी में तितलियों को लेकर जिज्ञासा थी। प्रकृति में रुचि होने के चलते हम लोगों ने अपने गांव में एक साइंस क्लब बनाया। मेरे कुछ साथियों ने पक्षियों की गतिविधियों पर नजर रखना और उनकी तस्वीरें उतारना शुरू किया, लेकिन मैंने मकड़े को चुना।

कया आप उस घटना को बता सकते हैं जब सबसे पहली बार आप मकड़ी के बारे में जिज्ञासु हुए?

दरअसल मकड़ों में मेरी दिलचस्पी एक घटना से शुरू हुई। उस वक्त मैं छठवीं या सातवीं में रहा होऊंगा। मैंने देखा कि एक कीड़ा मकान के एक कोने में मिट्टी का घोंसला बना रहा है। कीड़ा मिट्टी का घोंसला बनाता था और उसके भीतर कुछ लाकर रख देता था और उसका प्रवेशद्वार बंद कर देता था। मैंने उस घोंसले के प्रवेशद्वार को हटाया और उसके भीतर रखी चीज को निकाला तो देखा कि भीतर मकड़े थे। मैंने उन मकड़ों को दोबारा उस घोंसले में डाल दिया और 10-15 दिन बाद दोबारा उसे खोला, तो देखा कि उसमें एक बड़ा लार्वा है। ये देख कर मैं रोमांचित हो गया। मुझे लगा कि मैंने कोई खोज कर ली है। मैं लगातार उस घोंसले पर नजर रखने लगा। दो-तीन साल तक मैंने उस पर नजर रखी और पाया कि असल में मिट्टी का घोंसला बनानेवाला मकड़े का शिकारी (स्पाइडर हंटर) है। ये स्पाइडर हंटर पहले मिट्टी का घोसला बनाता है और फिर जंगल में जाकर वहां मकड़ा पकड़ता है। मकड़ों को पकड़ कर उन्हें काट लेता है, जिससे हमेशा के लिए वे मकड़े मदहोशी की हालत में चले जाते हैं। वे जिंदा तो रहते हैं, लेकिन हिल-डुल पाने की हालत में नहीं होते हैं। स्पाइडर हंटर उस घोंसले में बहुत छोटा अंडा देता है। अंडा फूटता है, तो उसमें से लार्वा निकलता है। ये लार्वा मकड़ों को खाना शुरू करता है और बड़ा होता है। ये सबकुछ मैंने अपनी आंखों से देखा। उसी घटना के बाद मकड़ों में मेरी दिलचस्पी दिवानगी की हद तक बढ़ गई। मेरे पुश्तैनी मकान में एक बड़ा बागीचा था, जहां मैंने मकड़ों को नजदीक से देखने-समझने लगा। इसके बाद ही मैंने श्यामबाजार विज्ञान परिषद क्लब ज्वाइन किया और इस घटना के बारे में वहां बताया। बाद में मैंने एफआरसी ज्वाइन किया। उस वक्त कोई ये कल्पना नहीं कर सकता था कि मकड़ा शोध का विषय हो सकता है सिवाय टैक्सोनॉमी के। जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया और अन्य संस्थानों में टैक्सोनॉमी पर तो शोध हो रहा था, लेकिन मकड़े के व्यवहार आदि पर कोई शोध नहीं हो रहा था, इसलिए मुझे मकड़ों को लेकर कोई प्रोजेक्ट नहीं मिला। 

क्या भारत में मकड़ियों पर आपसे पहले किसी ने शोध कार्य किया है?

भारत के मुकाबले विदेशों में मकड़ों पर काफी काम हुआ है क्योंकि वहां इस पर शोध करने के लिए काफी पहले से फंड जारी किए जाते थे। भारत के मकड़ों पर भी विदेशी विशेषज्ञों ने ही ज्यादा काम किया है। भारत में अभी टैक्सोनॉमी और फोटोग्राफी पर हमलोग ज्यादा काम कर रहे हैं। यहां डॉ विनय टीकादार ने काम किया है। केरल के कृष्णाचंद्र कॉलेज में भी काम हो रहा है। जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने भी काम करने के पुराने तरीकों को बदला है और नए शोधकर्ताओं को लेकर नए सिरे से काम कर रहा है। लेकिन, मास लेवल पर लोकप्रियता जरूरी है। हालांकि, बुनियादी स्तर पर काम शुरू हो गया है।

क्या मकड़ी के शोध के लिए भविष्य में संभावनाएं हैं?

शोध करने के लिहाज से इसमें बहुत फ्यूचर है। मॉडर्न बायोलॉजिकल फील्ड में इसका बहुत महत्व है, इसलिए इसमें काम किया जाना चाहिए। जो फॉर्माकोलॉजी में काम कर रहे हैं, उन्हें मकड़े से काफी मदद मिलेगी। वे शोध कर सकते हैं कि किस मकड़े का इस्तेमाल वे मेडिकल फील्ड में कर सकते हैं। टेक्सटाइल इंडस्ट्री में जाने के इच्छुक लोग भी मकड़े पर काम कर सकते हैं, इससे उन्हें मदद मिलेगी। टेक्सटाइल की बात करें, तो एक मकड़ी है जिसका नाम है जाइंट वुडस्पाइडर। ये मकड़ी का जाल काफी बड़ा होता है। इस जाल के धागे और उसी माप और मोटाई के स्टील के धागे को ले लीजिए, तो मकड़ी के जाल के धागे की मजबूती स्टील के धागे के मुकाबले 10 हजार गुना ज्यादा होती है। दक्षिण अमरीका और अन्य देशों में इस मकड़े के जाल से मछलियां पकड़ी जाती हैं। अमरीका और ऑस्ट्रेलिया में इस मकड़े की प्रजाति (जीन) का पता लगाया और उनकी मदद से बैक्टीरिया तैयार किया और तरल रूप में प्रोटीन बना कर उसकी रीलिंग कर रहे हैं। उन्हें इस पर शोध करने में 20 साल लग गए। उन्होंने इसका पेटेंट भी करवा लिया और सबसे पहले इसकी मदद से बुलेटप्रूफ जैकेट तैयार किया गया। एक सामान्य बुलेटप्रूफ जैकेट कोई जवान पहनता है, तो उसका वजन 10 से 15 किलोग्राम होता है, लेकिन इस सिल्क से बने जैकेट का वजन किसी भी सामान्य जैकेट जितना ही है यानी दो से ढाई किलोग्राम। डीआरडीओ इसमें काम कर सकता है। चीन भी इस फील्ड में काम कर रहा है। मकड़े के जाल से बुलटेफ्रूफ जैकेट इस सदी की सबसे बड़ी खोज है।

 क्या मकड़ी के जहर से कोई दवाई तैयार होती है?

-मकड़े के जहर पर हमने काम नहीं किया है, लेकिन सूचना के तौर पर मैं बता सकता हूं कि इसका इस्तेमाल एंटी वेनम बनाने में किया जा सकता है। होम्योपैथी की 100 से ज्यादा दवाइयों में मकड़े के जहर का इस्तेमाल किया जाता है। मसलन टेरंटूला और लैक्ट्रोडेक्टस बनाने में मकड़े के जहर का प्रयोग होता है। इसके अलावा दूसरी दवाइयां बनाने में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। मकड़े के जहर से ऑस्ट्रेलिया में हृदय व मस्तिष्क रोग से बचाव के लिए दवाइयां बनाई जा चुकी हैं। अतः किस मकड़े के जहर का इस्तेमाल कर दवाइयां बनाई जा सकती हैं, इस पर शोध किया जा सकता है। हम लोग उन्हें हर तरह की मदद देने को तैयार हैं। 

 

क्या मकड़ी के बारे में इतिहास में कहीं उल्लेख मिलता है?

जी हां, आइन-ए-अकबरी में अकबर, अबु फजल से कहते हैं कि हम शिकार कैसे करेंगे, क्योंकि हमें देख कर शिकार भाग जाता है। ये सुन कर अबु फजल दीवार की तरफ इशारा करते हुए कहता है, वो दीवार देखिए। मकड़ा जाल बना रहा है और शिकार को बार-बार पकड़ने की कोशिश कर रहा है क्योंकि वही उसका भोजन है। इसलिए आपमें शिकार को लेकर मकड़ी जैसा जुनून होना चाहिए। तस्वीरों में भी मकड़े देखे जा सकते हैं। अकबर जब कंधार गए थे, वहां एक तस्वीर बनाई थी, जिसमें मकड़े और सांप के बीच लड़ाई दिखाई गई थी।  इसके अलावा रामपुर राजा लाइब्रेरी में मकड़े से जुड़ी पेंटिंग्स हैं। अबु फजल का लिखा हुआ बहुत कुछ यहां पर। हमनें ऐसी बहुत तस्वीरें देखीं, जिससे पता चलता है कि मकड़ी ने अबु फजल समेत उस वक्त के लेखकों को बहुत आकर्षित किया था।

 

क्या उपनिषदों या वेदों में भी मकड़ी का जिक्र है?

-उपनिषद सभी वेदों का वैज्ञानिक जिस्ट है। इसी उपनिषद में एक खंड है मुंडकोपनिषद। इसमें एक श्लोक है–

“जथर्मनाभि सृजते नतिच”। मकड़ा को संस्कृत में उन्ननाभ कहा जाता है। उन्ननाभ का मतलब है जो अपने पेट से सिल्क निकालते हैं। सिल्क में प्रोटीन होता है। जब मकड़े का जाल काफी पुराना हो जाता है और उसमें शिकार नहीं फंसता है, तो  मकड़े उस जाल को खा भी लेते हैं, क्योंकि उसमें प्रोटीन होता है। इस तरह जाल की रिसाइक्लिंग भी हो जाती है। 4-5 हजार वर्ष पहले ही तब के विद्वानों ने इस रहस्य का उद्घाटन कर दिया था। 

यही प्रक्रिया प्रकृति भी अपनाती है। वह कुछ चीज पैदा करती है और फिर खा भी लेती है। दुनिया की रचना इसी नियम से हुई है। मैक्समुलर ने उपनिषद पर काफी काम किया है। उन्होंने अंग्रेजी और जर्मन भाषा में इसका अनुवाद किया है। उनकी किताब में 20 से 30 ऐसे श्लोक हैं, जिनमें मकड़े का जिक्र आया है। इसका मतलब है कि सदियों पहले मकड़े पर व्यापक शोध हुआ होगा।