Sign up for our weekly newsletter

पर्यावरण की सेहत बताता है कवक-शैवाल से मिलकर बना लाइकन

हमारे आसपास लाइकन उग रहे हैं तो समझिए पर्यावरण की सेहत अच्छी है। यदि नहीं तो हम प्रदूषणवाली हवा में सांस ले रहे हैं।

By Varsha Singh

On: Monday 29 June 2020
 
पिथौरागढ़ के मुनस्यारी में बने लाइकन गार्डन में लगे लाइकन। उत्तराखंड में इसे झूला घाट या पत्थर के फूल भी कहा जाता है। फोटो: वर्षा सिंह
पिथौरागढ़ के मुनस्यारी में बने लाइकन गार्डन में लगे लाइकन। उत्तराखंड में इसे झूला घाट या पत्थर के फूल भी कहा जाता है। फोटो: वर्षा सिंह पिथौरागढ़ के मुनस्यारी में बने लाइकन गार्डन में लगे लाइकन। उत्तराखंड में इसे झूला घाट या पत्थर के फूल भी कहा जाता है। फोटो: वर्षा सिंह

एक न दिखाई देने वाले कोरोनावायरस से जूझते हुए हम ये समझ सकते हैं कि इको सिस्टम को बनाए रखने में धरती पर मौजूद छोटे से छोटे जीवों-वनस्पतियों की बड़ी भूमिका है। पिथौरागढ़ के मुनस्यारी में बने लाइकन गार्डन में धरती के सबसे प्राचीन और सूक्ष्म वनस्पतियों में से एक लाइकन के बारे में बेहतर समझ हासिल की जा सकती है। उत्तराखंड में इसे झूला घाट या पत्थर के फूल भी कहा जाता है। 

धरती पर अब डायनासोर नहीं रहे, लेकिन लाइकन उस समय से अब तक मौजूद है। उन्हीं जगहों पर जहां प्रदूषण नहीं है। ये प्रदूषण मुक्त जगह का एक बायो इंडिकेटर भी है। धरती पर लाइकन की 20 हजार से अधिक प्रजातियां मौजूद हैं। भारत में 2,714 और उत्तराखंड में 600 प्रजातियां पायी जाती हैं। हाल ही में ये बताया गया कि कुमाऊं के मुनस्यारी, अस्कोट, बागेश्वर, पिथौरागढ़, रामनगर और नैनीताल में 45 पीढ़ियों और 13 प्रजातियों के लाइकन मौजूद हैं। मुनस्यारी को लाइकन का हॉटस्पॉट माना जाता है। अकेले मुनस्यारी और गोरी गंगा के पास करीब 150 लाइकन प्रजातियां मौजूद हैं। इसके अलावा नीति घाटी, चकराता के घने जंगल और बांज के जंगलों में भी लाइकन खूब मिलते हैं। इनका पाया जाना दर्शाता है कि जंगल की सेहत अच्छी है।

पर्वतीय क्षेत्रों में करीब तीन हजार मीटर की ऊंचाई तक वृक्ष मिलते हैं। 3 से 4 हजार मीटर तक नर्म घासों वाले बुग्याल मिलते हैं। 4 हजार मीटर की ऊंचाई से उपर कोई कोई वनस्पति नहीं होती, लेकिन लाइकन में वहां भी उग आने की क्षमता होती है।

लाइकन, कवक और शैवाल से मिलकर बनी जैविक संरचना है। शैवाल फोटो-सिंथेसिस प्रक्रिया से भोजन तैयार करता है और कवक उसकी रक्षा करता है। रंगरूप कवक की तरह होता है। पानी सहेजने के लिए इसमें कोई जड़ या तना नहीं होता। ये हवा में मौजूद पानी का इस्तेमाल करते हैं। पानी और सूरज की किरणों से अपना भोजन तैयार करने वाले लाइकन अल्ट्रा वायलट किरणों से सुरक्षा भी करते हैं ये पेड़ की छाल, दीवार, पत्थर, छत, मिट्टी पर उग आते हैं।

इस बेशकीमती झूला घास का अवैध व्यापार भी खूब होता है। हैदराबाद की बिरयानी के जायके का सीक्रेट लाइकन ही है। रामनगर और टनकपुर में हैदाराबाद के व्यापारी लाइकन खरीदने आते हैं। वहीं, कन्नौज के इत्र उद्योग की खुशबू में भी लाइकन का ही असर है। चटक रंग वाले लाइकन प्राकृतिक रंग के रूप में भी इस्तेमाल किए जाते हैं। अल्ट्रा-वायलट किरणों से बचाव की क्षमता के चलते त्वचा निखारने का दावा करने वाली क्रीम के कारोबार में भी लाइकन का इस्तेमाल होता है।

उत्तराखंड वन विभाग के रिसर्च विंग के मुख्य वन संरक्षक संजीव चतुर्वेदी बताते हैं कि वित्त वर्ष 2019-20 में रिसर्च एडवायजरी कमेटी की अनुमति के बाद लाइकन को संरक्षित करने के प्रोजेक्ट पर काम शुरू हुआ। मुनस्यारी के पातालथोर रिसर्च सर्कल में 1.5 हेक्टेअर क्षेत्र लाइकन गार्डन बसाया गया। इसका उद्देश्य लोगों में लाइकन की प्रजातियों के बारे में जागरुकता पैदा करना है। साथ ही इस पर अध्ययन के लिए रिसर्च सेंटर तैयार करना है। इसे स्थानीय लोगों की आजीविका से भी जोड़ा जा सकता है।

हमारे आसपास लाइकन उग रहे हैं तो समझिए पर्यावरण की सेहत अच्छी है। यदि नहीं तो हम प्रदूषणवाली हवा में सांस ले रहे हैं।