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अब सोनाखान को बचाने के लिए सड़क पर उतरे आदिवासी

608 एकड़ की सोनाखान भूमि की लीज हासिल करने वाली वेदांता-बॉल्को कंपनी के प्रतिनिधियों ने हाल ही में बाघमारा क्षेत्र का दौरा किया, इसके बाद से आदिवासी चिंतित हैं  

On: Thursday 12 December 2019
 
छत्तीसगढ़ में बाघमारा सोना खदान की लीज वेदांता-बॉल्को कंपनी को दिए जाने के विरोध में रैली निकालते आदिवासी। फोटो: अवधेश मलिक
छत्तीसगढ़ में बाघमारा सोना खदान की लीज वेदांता-बॉल्को कंपनी को दिए जाने के विरोध में रैली निकालते आदिवासी। फोटो: अवधेश मलिक छत्तीसगढ़ में बाघमारा सोना खदान की लीज वेदांता-बॉल्को कंपनी को दिए जाने के विरोध में रैली निकालते आदिवासी। फोटो: अवधेश मलिक

अवधेश मलिक 

छत्तीसगढ़ में बाघमारा सोनाखान को खोले जाने की सुगबुगाहट के खिलाफ एक बार फिर से आदिवासियों का विरोध शुरु हो गया है। 608 एकड़ की सोनाखान भूमि की लीज हासिल करने वाली वेदांता-बॉल्को कंपनी के प्रतिनिधियों ने हाल ही में बाघमारा क्षेत्र का दौरा किया है। दौरे पर उनके साथ सरकारी अधिकारी भी थे। इस दौरान कंपनी के प्रतिनिधियों और सरकारी अधिकारियों ने ग्रामीणों को पंचायत से अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) हासिल करने का कागज दिखाते हुए जल्द ही खदान खोलने का दावा किया। हालांकि, एनओसी हासिल करने के दावे को गलत बताते हुए आदिवासियों ने तय किया है कि वे राज्यपाल के समक्ष इसके खिलाफ आवाज उठाएंगे।

बाघमारा सोना खदान सूबे की राजधानी रायपुर से करीब 150 किलोमीटर दूर उत्तर-पूर्व में बलौदाबाजार और महासमुंद जिलों की सीमा पर बसा है। 2016 में सूबे की भूतपूर्व रमन सिंह वाली भाजपा सरकार ने 80 करोड़ रूपये के रॉयल्टी की शर्त पर बाल्को-वेदांता ग्रुप को बाघमारा क्षेत्र की 608 एकड़ भूमि को सोना खनन के लिए लीज पर दिया था। इस क्षेत्र में नदियों से सोने के कण मिलते हैं। वेदांता-बाल्को को खनन लीज देने से पहले यह अनुमान लगाया गया था कि इल लीज साइट से 2.5 टन सोना निकल सकता है।

बाघमारा क्षेत्र के आदिवासियों और खनन का विरोध कर रहे कार्यकर्ताओं का आरोप है कि सरकार के इस फैसले से 24 गांव के 10 हजार से अधिक आदिवासी ग्रामीणों पर विस्थापन का खतरा बन गया है। साथ ही ऐसा करते वक्त सरकार ने आदिवासियों व वन्यक्षेत्र पर पड़ने वाले प्रभावों का ख्याल भी नहीं किया। न ही ग्राम सभा से इसकी अनुमति ली।  इस वक्त सत्ता में मौजूद कांग्रेस सरकार ने भी बीते वर्ष विधानसभा चुनाव में आदिवासियों के साथ इस खनन लीज का विरोध किया था, हालांकि अब उन्हीं की सरकार में लीज साइट खोले जाने की सुगबुगाहट ने आदिवासियों को चिंता में डाल दिया है।

ग्रामीणों का कहना है कि हाल ही में हुए सर्वे करने वाले अधिकारियों ने उनसे कहा कि वे खदान क्षेत्र से सोनाखान की दूरी देखने आए थे और पाया कि सोनाखान से बाघमारा खदान की दूरी 6 किलोमीटर है। खदान होने से सोना खान को कोई नुकसान नहीं होगा। कुल मिलाकर छह कम्पार्टमेंट में खदान है, जिसमें से फिलहाल दो कंपार्टमेंट का सोनाखान से नजदीक होने के कारण छोड़ा गया है। साथ ही, राजा देवरी पंचायत से उन्हें अनाप्त्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) भी मिल चुकी है और शीघ्र ही खदान खोला जाएगा। खदान खोलने हेतु ग्राम सभा से अनुमति अनिवार्य है जो कि अभी तक नहीं लिया गया। सर्वे की पुष्टि असिस्टेंट कमिश्नर (ट्राइबल) राधेश्याम भोई ने की लेकिन इस मुद्दे पर और जानकारी नहीं दी। 

इस मुद्दे पर दलित आदिवासी मंच की राजिम केतवास डाउन टू अर्थ से कहती हैं कि अधिकारियों ने कई ग्रामीणों को पंचायत का एनओसी दिखाते हुए धमकाने की भी कोशिश की है कि वे जल्द ही उन लोगों का वहां से विस्थापित कर खदान खोल देंगें। राजिम कहती है कि एक तो ग्राम सभा से एनओसी नहीं मिली है उसके बाद भी अधिकारी धमकराने की कोशिश कर रहे हैं ऐसे में खदान खोलने संबंधी किसी गतिविधि का यहां पूरी ताकत से विरोध किया जाएगा।

स्थानीय कार्यकर्ता देवेंद्र बघेल ने डाउन टू अर्थ से कहा कि खनन की लीज साइट से ही नजदीक बार-नवापारा अभ्यारण्य जहां कई बार बाघ तक भी देखे गएं हैं वहां संरक्षण के बजाय पैसों के खातिर अंधाधुध जंगल कटाई पर अमादा है। इस मामले पर संबंधित अधिकारियों की ओर से संपर्क किया गया लेकिन उनकी तरफ से कोई बयान नहीं आ सका।