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बधाई हो! आखिरकार कृषि भारत में राजनीतिक एजेंडा बन ही गया

दिल्ली बॉर्डर पर विरोध प्रदर्शनों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क्रिसमस के दिन सांता क्लॉस बने। किसानों के लिए फंड का आवंटन किया और उनकी समस्याओं पर चर्चा की

By Richard Mahapatra

On: Friday 25 December 2020
 
25 दिसंबर को किसानों को संबोधित करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। फोटो: पीआईबी
25 दिसंबर को किसानों को संबोधित करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। फोटो: पीआईबी 25 दिसंबर को किसानों को संबोधित करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। फोटो: पीआईबी

दिल्ली में चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों के नाम जो संदेश दिया, उसमें छिपे संकेतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। क्रिसमस के दिन उन्होंने पीएम किसान सम्मान योजना में शामिल किसानों के खातों में 18,000 करोड़ रुपये सीधे ट्रांसफर करने का बटन दबाया। 

ठीक उसी वक्त, मुझे सांता क्लॉस और उनके तोहफों वाली कहानियां याद आईं और मैंने खुद को समझाया कि हो सकता है कि त्योहारों के मौसम में ऐसी किसी चीज की उम्मीद की जा रही हो। लेकिन अगले ही पल मोदी ने कहा, "क्रिसमस के दिन, यह किसानों के लिए तोहफा है।" 

केंद्रीय कृषि व किसान कल्याण मंत्री के मुताबिक प्रधानमंत्री ने वर्चुअल तरीके से तकबरीन 8 करोड़ किसानों को संबोधित किया। इसका मतलब यह है कि उन्होंने खेती-किसानी में लगे देश के कुल किसानों में से 50 फीसदी से ज्यादा को संबोधित किया। इस लिहाज से उनका यह संबोधन 'ऐतिहासिक' हुआ, जैसा कि उनके द्वारा लिया गया लगभग हर कदम और फैसला आधिकारिक रूप से ऐतिहासिक ही होता है।

उन्होंने आश्वासन दिलाया कि सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) हटाने और कृषि को कॉरपोरेट के हवाले करने को लेकर किसानों के मन में जो डर है, वो बेमतलब है। उन्होंने कई बार इस बात को दोहराया, "सरकार ऐसा नहीं कर रही है।"

हालांकि, उनके संबोधन का एक बड़ा भाग विपक्षी पार्टियों के नाम समर्पित रहा कि कैसे पार्टियों ने किसानों और उनकी परेशानियों का 'राजनीतिकरण' कर दिया है। उन्होंने एक के बाद एक कई बिंदु गिनाए कि कैसे विपक्षी पार्टियां या गैर-भाजपाई दल राजनीति में प्रासंगिक बने रहने के लिए कृषि संकट का इस्तेमाल कर रहे हैं। 

उन्होंने अपनी सरकार की योजनाएं गिनाते हुए कई बार दोहराया कि, "जब वे दशकों तक सरकार में थे, तो कुछ भी नहीं हुआ। छोटे किसान गरीब होते गए और वे चुनावों पे चुनाव जीतते गए। मेरी सरकार कृषि में एक नई सोच ला रही है।"

देश के हर क्षेत्र से चुने गए किसानों के साथ अपनी बातचीत में उन्होंने दो सवाल पूछे: "क्या निजी कंपनियों के साथ व्यापार करने से आपको अपनी ज़मीन खोनी पड़ी?" और "क्या सरकारी नियंत्रण वाले बाजारों के बाहर माल बेचने से आपकी ज्यादा कमाई नहीं हो रही है?" 

उनसे बात करने वाले किसानों ने इनकार में जवाब दिया। उन्होंने किसानों से अनुरोध किया कि वे अपने गावों में इस संदेश को फैलाएं।  

लेकिन विपक्षी पार्टियों पर किसानों के मुद्दों का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाते हुए उन्होंने एक ऐसा एजेंडा सेट कर दिया, जिसको लेकर खुश हुआ जा सकता है कि किसान और किसानी राजनीति की मुख्यधारा में आ चुकी है। 

उन्होंने जिक्र किया कि कैसे पश्चिम बंगाल सरकार ने अब तक पीएम किसान योजना को भी लागू नहीं किया है। इस राज्य में जल्द ही चुनाव होने वाले हैं, और भाजपा कि कोशिश है कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से हटा सके।

उन्होंने जिक्र किया कि क्यों अब तक केरल ने कृषि उपज विपणन समिति स्थापित नहीं की है, जबकि सत्ताधारी पार्टी दिल्ली और पंजाब में किसानों का समर्थन कर रही थी। भाजपा केरल में भी रास्ता बनाने की कोशिश कर रही है।

उन्होंने ये भी कहा की कैसे राजस्थान के स्थानीय चुनावों में, जो लोग तीन कृषि कानूनों का विरोध कर रहे थे, उनकी हार हुई। उन्होंने कहा- "चुनावी नतीजे हमारे कानूनों का समर्थन करते हैं।"

विरोध प्रदर्शन कर रहे किसानों की मांगों को बिना संबोधित किए उन्होंने यह साफ कर दिया कि यह सत्ताधारी और विपक्षी पार्टियों के बीच की जंग है। प्रदर्शन कर रहे किसानों को उन्होंने अपने भाषण से बाहर ही रखा। 

लेकिन जिस बात के लिए खुश होना चाहिए वो ये है कि किसानों के प्रदर्शन ने प्रधानमंत्री का ध्यान खींचा, वो भी ऐसे कि उन्हें किसानों की समस्याओं पर चर्चा करने के लिए इस प्रभावशाली आयोजन की मदद लेनी पड़ी। इस मुद्दे को सत्ताधारी और विपक्षी पार्टियों के बीच का मुद्दा बनाकर वे कृषि को राजनीतिक संवाद में ले आए।