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विशेष रिपोर्ट भाग-5: असंगठित मजदूर क्यों हो रहे हैं अपने अधिकारों से वंचित

स्वंतत्र रूप से प्रवासी मजदूरों की असंगठित क्षेत्र में तादाद बढ़ रही है, इस तरह वे समूह पर लागू होने वाले कानूनी प्रावधानों और सामाजिक सुरक्षा के दायरे से बाहर हो जाते हैं। 

By Vivek Mishra

On: Thursday 30 April 2020
 

भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को देशभर में कहीं भी स्वतंत्रता के साथ रहने और बसने व काम करने की इजाजत देता हो लेकिन पलायन करने वाले असंगठित मजदूरों को सामाजिक, स्वास्थ्य और कानून से जुड़े तमाम बुनियादी फायदों से आज भी वंचित होना पड़ता है। नेशनल फूड सिक्योरिटी एक्ट, 2003 के तहत सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) हो, राज्य और राष्ट्रीय चुनावों में वोट देने का अधिकार हो या फिर राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की सुविधाएं हो, श्रमिक जैसे ही अपनी मूल जगह छोड़ते हैं, अपने अधिकारों से वंचित हो जाते हैं। या यूं कहिए कि और अधिक सामाजिक असुरक्षा, अनाज की कमी और भेदभाव की चपेट में आ जाते हैं। क्या यह तस्वीर बदल सकती है?

आवास एवं शहरी गरीब अपश्मन मंत्रालय के 18 सदस्यीय वर्किंग ग्रुप ने पलायन पर तैयार अपनी रिपोर्ट के एक हिस्से में ऐसे मजदूरों के लिए कानूनी, सामाजिक और स्वास्थ्य सुरक्षा तय करने के लिए कई अहम सफारिशें की हैं। इसमें कहा गया है कि पोर्टेबिलिटी, विशेष पहचान पत्र, स्वास्थ्य सेवाओं की व्यापकता जैसे विषयों पर काम हो तो प्रवासी मजदूरों की समस्याओं को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।

वर्किंग ग्रुप ने कहा है कि प्रवासी असंगठित मजदूरों को खासतौर से यदि उनके ही कार्यक्षेत्र में सामाजिक, खाद्य और स्वास्थ्य सेवाएं मिलें तो स्थिति में बदलाव आ सकता है। मिसाल के तौर पर प्रवासी मजदूरों को कार्यस्थल पर ही सामाजिक और स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने के लिए 2012 में भारत सरकार ने उड़ीसा और अविभाजित आंध्र प्रदेश से एमओयू पर हस्ताक्षर किया था। यह अंतरराष्ट्रीय श्रमिक संगठन (आईएलओ) परियोजना के तहत था, जिसके तहत आंध्र प्रदेश के ईंट-भट्ठों पर काम करने वाले उड़ीसा के प्रवासी मजदूरों की जिदंगी और कार्य दशा में सुधार के लिए प्रयास किया जाना था। साथ ही दो राज्यों के बीच प्रवासियों के लिए आपसी समझ और सहयोग को भी बढ़ाना था। बोलांगीर, नौपाडा, कालाहांडी, सोनपुर, बारगढ़, कोरापुट, गजपति, मलकानगिरी, गंजम, रायगाड़ा और नौरांगपुर जिलों की पहचान की गई थी जहां से ज्यादा मजदूर पलायन करते थे। यह मजदूर (अब तेलंगाना) के मेडक और रांगारेड्डी में पहुंचते थे।

एमओयू के तहत दोनों राज्यों ने विभिन्न नागरिक समिति को यह जिम्मेदारी सौंपी। उड़ीसा के श्रम विभाग और ईएसआई ने प्रवासी मजदूरों के लिए एक विभाग बनाया, लेबर कमिश्नर की नियुक्ति की ताकि वह सीजनल प्रवासी मजदूरों का पीछा कर सकें और उनके रोजगार संबंधी आंकड़ों को अपडेट कर सकें। यह आंकड़े ग्राम पंचायत से जुटाए जाते थे और आंध्र प्रदेश सरकार को सौंप दिए जाते थे, ताकि प्रवासी मजदूरों को उनके कार्यस्थल पर ही बच्चों को नजदीकी स्कूलों में शिक्षा, ईंट-भट्ठों के पास ही अस्थायी मकान, पीडीएस प्रणाली के तहत अनाज और एनआरएलएम के तहत स्वास्थ्य सुरक्षा उपलब्ध हो सके। इससे उड़ीसा के प्रवासी मजदूरों को राहत जरूर मिली हांलाकि ऐसा प्रयास देश के अन्य सभी राज्यों में आकार नहीं ले सका।

जानकारी का अभाव

वर्किंग ग्रुप ने कहा कि निर्माण क्षेत्र या फिर ईंट-भट्ठों में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों की मदद के लिए कई पहल हैं लेकिन उन्हें इसकी जानकारी नहीं है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट की देख-रेख (सिविल याचिका संख्या 318/2016) के बावजूद कंस्ट्रक्शन वर्कर्स एंड वेलफेयर बोर्ड (सीडब्ल्यूडब्ल्यूबी) उपकर के तहत योजनाओं को लागू करने में कई कमियां भी हैं। वर्किंग ग्रुप ने अपनी सिफारिश में कहा है कि केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्रालय (एमओएलएंडई) राज्यों में सीडब्यूडब्यूबी उपकर राजस्व के इस्तेमाल में सुधार के लिए काम कर रहा है, ऐसे में उसे अपना दायरा बढ़ाते हुए निर्माण क्षेत्र के मजदूरों को भी सामाजिक सेवाएं व आवास जैसी सुविधाएं देनी चाहिए। वहीं अंतर्राज्यीय यानी एक राज्य से दूसरे राज्य में प्रवास करने वाले एससी/एसटी प्रवासी मजदूरों की (मूल स्थान व गंतव्य स्थान) सूची में फर्क हो जाता है जिसकी वजह से उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलता। ज्यादातर ऐसे प्रवासी मजदूर बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल की सीमाओं से जुड़े हुए हैं।

स्वतंत्र रहकर मजदूरी ढ़ूढ़ने वाले सुरक्षा कानून दायरे से बाहर

अंतर्राज्यीय प्रवासी श्रमिक कानून, 1979 प्रवासी मजदूरों के लिए एक प्रमुख कानून है। यह कानून उड़ीसा दादन श्रमिक (नियंत्रण एवं नियामक) कानून, 1975 के बाद आया। दादन एक शब्द विशेष है जिसका इस्तेमाल उन लोगों के लिए होता था जो बिना किसी सेवा और शर्त के मजदूरों की भर्ती ठेकेदारों या एजेंट्स के मार्फत करते थे। इन मजदूरों के लिए काम के घंटे व श्रम दर कुछ भी तय नहीं होता था। वहीं, इन्हें किसी तरह की सामाजिक सुरक्षा भी नहीं दी जाती थी।

रजिस्टर श्रमिकों के लिए अंतर्राज्यीय प्रवासी श्रमिक कानून, 1979 सामधान करता है। इस कानून के तहत अंतर्राज्यीय प्रवासी मजदूरों को रोजगार देने वाले नियोक्ता का रजिस्ट्रेशन होता है। साथ ही ठेकेदारों को लाइसेंस भी दिया जाता है। यदि मजदूरी के लेन-देन और मजदूरों के साथ भेदभाव जैसी कोई भी वाद-विवाद की स्थिति होती है तो इस कानून के तहत प्रवासी श्रमिकों को भी मदद मिलती है। हालांकि, आजकल अंतर्राज्यीय प्रवासी मजदूर ठेकेदारों के जरिए नहीं आते हैं। खासतौर से निर्माण क्षेत्र और ईंट-भट्ठों के काम में वह स्वतंत्र रूप से काम ढ़ूंढ़ते हैं और ऐसे प्रवासी मजदूर इस कानून के दायरे से ही बाहर होते हैं।

एक अन्य श्रमिक सुरक्षा कानून है जो खासतौर से असंगठित मजदूरों के लिए है। इनमें भवन और निर्माण श्रमिक, साथ ही ईंट-भट्ठों के श्रमिक शामिल हैं। एक अनिवार्य उपकर फंड राज्य को जाता है, जिसे वह प्रबंधित करता है और जिसके जरिए राज्य विभिन्न तरीके से राज्य श्रमिक कल्याण बोर्ड को सेवाएं देता है। हालांकि, इस उपकर का बहुत ही छोटा हिस्सा वास्तव में खर्च किया जा रहा  है।  

वर्किंग ग्रुप ने कहा है कि कानून बनाने वालों को असंगठित समूह के प्रवासी मजदूरों को भोजन व सामाजिक सुरक्षा देने के साथ उनके काम की दशा व वेतन को सुधारने के लिए विचार करना चाहिए। यह एक बहस का विषय हो सकता है कि इस तरह के प्रयास लेबर मार्केट की अवधारणा तक सीमित रखा जाए या क्षेत्रवार प्रयास किया जाए। क्योंकि स्वंतत्र रूप से प्रवासी मजदूरों की असंगठित क्षेत्र में तादाद बढ़ रही है। इसलिए इस पर कदम उठाना बेहद जरूरी है। 

बीमा सुरक्षा का दायरा बढ़ाने की सिफारिश

किसी भी प्रतिष्ठान में 20 श्रमिकों के समूह को अनिवार्य रूप से ईपीएफओ कानून के दायरे में आना पड़ता है वहीं, 10 से 20 श्रमिक वाले प्रतिष्ठान भवन व अन्य निर्माण श्रमिक कानून के तहत कवर होते हैं। वहीं, 10 से नीचे श्रमिक वाले प्रतिष्ठान को केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के तहत असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा कानून, 2008 के जरिए कवर किया जाता है। हालांकि इस कानून के तहत बहुत ही कम असंगठित मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा मिलती है। साथ ही इसे राज्यों के जरिए प्रभावी तरीके से लागू किया जाना बाकी है।

वर्किंग ग्रुप ने अपनी सिफारिश में कहा है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना अभी बीपीएल परिवारों को ही कवर करता है ऐसे में इसका दायरा बढ़ाकर सड़क के वेंडर, बीड़ी वर्कर्स, घरेलू श्रमिक, भवन और अन्य निर्माण श्रमिक, एमजीएनआरईजीए श्रमिक (जो बीते वित्तीय वर्ष में 15 दिन से अधिक काम कर चुका हो), रिक्शावान, कचरा बीनने वाले, खनन श्रमिक, सफाई कर्मचारी, ऑटो रिक्शा और टैक्सी ड्राइवर्स को मिलनी चाहिए। यह सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा का ढ़ांचा है जिस पर प्रगति होनी चाहिए।

सुझावों में यह भी कहा गयाी है कि राज्य असंगठित मजदूरों के लिए एक सामाजिक सुरक्षा बोर्ड का गठन करें साथ ही उनके पंजीकरण की एक सहज व्यवस्था बनाए। मोबाइल-एसएमएस का सहारा लिया जाए। इसके अलावा श्रम एवं रोजगार मंत्रालय की तरफ से प्रवासी असंगठत मजदूरों को पोर्टेबल आईडी कार्ड भी दिया जाना चाहिए ताकि वे सभी तरह के सरकारी सामाजिक सुरक्षा योजना का लाभ ले पाएं।

सिफारिश में कहा गया है कि प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत सड़कों के सुधार का काम हो रहा है हालांकि राज्यों को ग्रामीण सड़कों के  अंतर्जाल को और बेहतर बनाने के साथ ही ग्रामीण सेवाओं के लिए उपयुक्त ट्रांसपोर्टर्स को लाइसेंस भी जारी करना चाहिए। साथ ही संचार माध्यमों का भी सहारा लेकर प्रवासी मजदूरों को योजनाओं व अधिकारों के लिए जागरुक करना चाहिए।