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कोरोनावायरस के खौफ चक्र में फंसा किसान

 कोरोनावायरस की वजह से किसानों की आमदनी पर सीधा-सीधा प्रभाव दिखने लगा है

By Shahnawaz Alam

On: Friday 20 March 2020
 

कैथल के छोटे किसान अमित मलिक ने बीस किले (एकड़) में बासमती चावल-1401 पैदा करने के लिए जिले के सहकारी बैंक के अधीन जिले में प्राथमिक कृषि सहकारी समिति 70 हजार रुपए का लोन लिया था। पैदावार से दस कुंतल बचाकर मार्च महीने में अच्‍छी कीमत पर बेचने के लिए रख लिया था। इसी से बैंक का कर्जा भी चुकाने के लिए सोचा था, लेकिन यही चतुराई अमित पर भारी पड़ रही है। अब कैथल मंडी के व्‍यापारी दो महीने पहले से भी कम कीमत दे रहे है। इसकी वजह कोरोनावायरस की वजह से निर्यात रुकना बताया जा रहा है। अब उसे मार्च तक मिली फसली ऋण की अवधि समाप्‍त होने के बाद 07 प्रतिशत का ब्‍याज दर देने का डर सता रहा है।

पहले बारिश-ओलावृष्टि और अब कोरोना के खौफ से खेती-किसानी पर आश्रित ग्रामीण अर्थव्‍यवस्‍था प्रभावित होने लगी है। देश के सबसे बड़े बासमती चावल उत्‍पादक राज्‍य हरियाणा के किसानों को अब दिक्‍कतों का सामना करना पड़ रहा है। पॉल्‍ट्री फार्मिंग करने वाले किसान पूरी तरह से बर्बादी के कगार पर पहुंच गए है। जबकि सरकारी खरीद से पहले सरसो बेचने वाले किसानों को मंडी से लौटाया जा रहा है। फूलों की मांग कम होने से पैदावार को खेतों में छोड़ दिया है।

हरियाणा में हर साल फरवरी-मार्च का महीना बासमती चावल की खेती करने वाले किसानों के लिए मुफीद रहा है। कैथल, करनाल, झज्‍जर, फतेहाबाद जिले में इसकी अधिक पैदावार होती है। यहां से बासमती चावल ईरान, ईराक और सऊदी अरब में निर्यात होता है। कोरोनावायरस के कारण बासमती चावल का निर्यात नहीं हो पा रहा, खपत कम हो गई है। जिस कारण मंडियों में इनकी कीमतें लगभग 15 से 25 फीसदी तक कम हो गई हैं, जिसका सीधा नुकसान किसानों को हो रहा है। किसानों को पुरानी पेमेंट भी नहीं मिल रही है। अकेले कैथल जिले में 400 से अधिक किसानों का चावल एक्‍सपोटर्स के पास बकाया है। एक किसान का 70 हजार से अधिक का बकाया है। निर्यात में ऐसे समय पाबंदी लगी है, जब ईरान में त्‍योहार होने के कारण सबसे अधिक मांग रहती है।

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कैथल के किसान अमित मलिक का कहना है, फरवरी और मार्च का महीना बासमती उगाने वाले किसानों के लिए फायदेमंद रहता था। ईरान में 1121 और 1401 चावल की सबसे अच्‍छी डिमांड रहती है और मंडी में इस समय अच्‍छी कीमत मिल जाती थी। दो महीने पहले 3400-3500 रुपये प्रति कुंतल पर बिक रहा था, जो अब 2300 रुपये व्‍यापारी दे रहा है। अभी इस कीमत पर बेचने पर भी पैसे बाद में देने को कहा जा रहा है। एक अन्‍य किसान देवेंद्र का कहना है कि मार्च- अप्रैल का खर्चा बासमती चावल बेच कर ही चलता है क्योंकि इस दौरान कोई दूसरी फसल होती नहीं।  पुराना बकाया भी इन्‍हीं से चुकाते है। व्‍यापारी कह रहे है, उन्‍हें पेमेंट नहीं मिला तो तुम्‍हें कैसे दे।

वहीं, ऑल इंडिया चावल एक्‍सपोटर्स एसोसिएशन के प्रधान नाथी राम गुप्‍ता का कहना है कि कोरोनावायरस के कारण पिछले 15 दिनों से चावल का निर्यात सबसे ज्‍यादा प्रभावित हुआ है। डिमांड घटने की वजह से रेट कम हो गए है। ईरान जाने वाले करीब 60 हजार टन बासमती चावल का निर्यात रुका हुआ है। सब बंदरगाहों पर जमा है। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2019-20 (अप्रैल से नवंबर तक ) में ईरान ने कुल 4,489.64 करोड़ रुपए का 5,91,419.42 कुंतल भारतीय बासमती चावल का आयात किया था। इस मामले में सऊदी अरब दूसरे जबकि ईराक तीसरे नंबर पर है।

इसी तरह सरसो की फसल काट चुके किसान खुले बाजार में सरसो बेच नहीं पा रहे है। मंडी से उन्‍हें लौटा दिया जा रहा है। हरियाणा में सरकारी एजेंसियों की खरीददारी के कड़े मानक होने की वजह से किसान खुले बाजार में समय से पहले बेच देते है। मंडियों में आठ से फीसदी नमी को नजरअंदाज कर सरकारी दर (4200 प्रति कुंतल) से 500 से 700 रुपये कुंतल खरीद लेते है, लेकिन इस बार मंडियों में आढती की संख्‍या और ट्रांसपोर्ट पर आघोषित तौर पर पाबंदी लगने की वजह से किसानों को वापस लौटाया जा रहा है। किसान क्‍लब के पूर्व प्रधान प्रेम कुमार बताते है नमी होने से सरसो का वजन अधिक होता है, इससे कम दाम बेचने पर भी ज्‍यादा नुकसान नहीं होता है और फिर दूसरे काम धंधे मिल जाते है। लेकिन इस बार फसल बेचना ही मुश्किल हो गया है।