Sign up for our weekly newsletter

बिहार की 1.30 करोड़ आबादी को खाने के लाले: ज्यां द्रेज

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लिखे पत्र में ज्यां ने कहा है कि 30 प्रतिशत आबादी की पहुंच सरकारी राशन दुकानों तक नहीं है

By Umesh Kumar Ray

On: Monday 13 April 2020
 
बिहार के भोजपुर में जरूरतमंदों के लिए घर-घर से राशन इकट्ठा करते एक स्वयंसेवी संस्था के कार्यकर्ता। फोटो: टि्वटर @ryaindia
बिहार के भोजपुर में जरूरतमंदों के लिए घर-घर से राशन इकट्ठा करते एक स्वयंसेवी संस्था के कार्यकर्ता। फोटो: टि्वटर @ryaindia बिहार के भोजपुर में जरूरतमंदों के लिए घर-घर से राशन इकट्ठा करते एक स्वयंसेवी संस्था के कार्यकर्ता। फोटो: टि्वटर @ryaindia

प्रख्यात अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज ने अनुमान लगाया है कि बिहार के करीब 1.30 करोड़ लोग लाॅकडाउन के कारण भूख की चपेट में हैं।

उनके मुताबिक, बिहार में पीडीएस (पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम) का कवरेज 84 प्रतिशत है, लेकिन असल में कवरेज 70 प्रतिशत है क्योंकि सरकार 2011 की जनगणना के बाद बढ़ी आबादी को शामिल नहीं कर रही है। इसका मतलब है कि 30 प्रतिशत आबादी की पहुंच सरकारी राशन दुकानों तक नहीं है। अगर इसकी एक तिहाई आबादी के सामने खाने का संकट  है, तो इसका मतलब है कि लगभग 1.30 करोड़ लोगों को भोजन नहीं मिल रहा है। 

उन्होंने बिहार सरकार को पत्र लिखकर इस हालात से निबटने का उपाय सुझाया है। पत्र में ज्यां द्रेज ने लिखा है, "बिहार सरकार को चाहिए कि केंद्र सरकार से अपील कर वह अतिरिक्त खाद्यान्न नि:शुल्क (या एनएफएसए दर पर) आवंटित करने को कहे। फूड कारपोरेशन आफ इंडिया के पास 1 मार्च, 2020 तक 80 मिलियन टन खाद्यान्न है। रबी सीजन में अधिप्राप्ति होने से स्टाक और बढ़ेगा।"

उन्होंने आगे लिखा है, "बिहार स्पेशल खाद्यान्न कोटे का इस्तेमाल उन जरूरतमंद परिवारों के लिए कर सकती है, जिनके पास राशन कार्ड नहीं है। इसके अलावा इसका इस्तेमाल कम्युनिटी किचेन में भी किया जा सकता है।"

उल्लेखनीय हो कि पिछले दिनों बिहार सरकार ने 184 करोड़ रुपए लोगों के बैंक अकाउंट में ट्रांसफर करने की घोषणा की। इसके तहत राशनकार्ड धारी हर परिवार के खाते में 1000 रुपए ट्रांसफर किए गए। नीतीश सरकार ने ये भी घोषणा की थी कि सभी राशन कार्डधारियों को जून तक नि: शुल्क राशन मुहैया कराया जाएगा।  लेकिन, जिनका राशन कार्ड नहीं है, उनके लिए कोई बड़ी घोषणा नहीं की गई। इस, बीच पिछले दो हफ्तों में बिहार में कथित तौर पर भूख से दो लोगों के मरने की खबर है। पहली घटना 26 मार्च की है। भोजपुर जिले के आरा में मलिन बस्ती में रहने वाले एक महादलित परिवार के 8 साल के राकेश मुसहर नाम के बच्चे की मौत हो गई थी। वह बीमार था और लाॅकडाउन के चलते काम ठप हो जाने से उसके घर में खाना नहीं बन रहा था।

इसी तरह 10 अप्रैल को बांका जिले के दुबराज पर गांव में एक 10 साल के किशोर की मृत्यु हो गई। उसके परिजनों के मुताबिक, उसके पेट में दर्द हो रहा था। परिजनों का कहना है कि कामधंधा बंद होने से घर में खाना नहीं बन रहा था। हालांकि दोनों ही मामलों में प्रशासन का कहना है कि इसकी जांच कराई जा रही है।

ज्यां द्रेज ने अनुमान लगाया है कि बिहार को पीडीएस से छूटी ग्रामीण आबादी और मलिन बस्ती में रहने वाले परिवारों के लिए  महज 20 लाख टन खाद्यान्न (पांच किलो/प्रति व्यक्ति/प्रति माह) की ज़रूरत पड़ेगी। इससे वे सालभर आराम से खा सकते हैं।

उन्होंने पत्र में लिखा है कि इस 20 लाख टन में से 10 लाख टन खाद्यान्न केंद्र सरकार पर राज्य का बकाया है। अतः इस संकट के दौर में बिहार में भूख और भुखमरी को रोकने के लिए केंद्र के के पास मौजूद अतिरिक्त स्टाक में से थोड़ा खाद्यान्न ले लेना तर्कसंगत होगा।"

ज्यां द्रेज ने सरकार को सलाह दी है कि इन एहतियाती कदमों के अलावा सरकार को ये भी सुनिश्चित करना चाहिए कि पीडीएस सही से काम करे। राशन दुकानों की कड़ी निगरानी होनी चाहिए, औचक निरीक्षण करना चाहिए और एसएमएस अलर्ट शुरू करना चाहिए और भ्रष्ट राशन डीलरों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। आने वाले कुछ महीनों में पीडीएस बिहार की गरीब आबादी के लिए जीवनरेखा होगी, इसलिए इसपर उच्चस्तर पर निगरानी करने की जरूरत है।