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वायु प्रदूषण से आंखों पर पड़ रहा है गंभीर असर: रिपोर्ट  

यह अध्ययन ताइवान की आबादी पर किया गया है, लेकिन भारत में इसका असर देखा जा सकता है  

By Shagun Kapil , Raju Sajwan

On: Tuesday 27 August 2019
 
Photo: Creative commons
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हाल के एक अध्ययन में कहा गया है कि ट्रैफिक से संबंधित प्रदूषण, जैसे- नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (एनओ2) और कार्बन मोनोऑक्साइड (सीओ) के संपर्क में आने से आंखों में  मैकुलर डिजनरेशन (एएमडी) विकसित होने का खतरा अधिक होता है, जो देर से शुरू होने वाली बीमारी है।

बीएमजे जर्नल ऑफ इंवेस्टिगेटिव मेडिसिन में प्रकाशित इस अध्ययन में साल 2000 और 2010 के बीच ताइवान में रह रहे 39,819 लोगों के स्वास्थ्य बीमा डेटा और वायु गुणवत्ता का विश्लेषण किया, इसमें 50 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोगों को शामिल किया गया है।  

लोगों को प्रदूषण जोखिम की चार श्रेणियों में विभाजित किया गया था और यह पाया गया कि एनओ2 और सीओ के उच्चतम एकाग्रता वाले क्षेत्रों में रहने वालों की एएमडी की उच्चतम दर क्या रही। 11 साल के अध्ययन के बाद यह पाया गया कि 1,442 प्रतिभागियों में सबसे अधिक तेजी से यह रोग विकसित हुआ।

क्या है एएमडी?  

एएमडी एक देर से शुरू होने वाली बीमारी है जो लिपिड-समृद्ध बाह्यकोशिकीय जमाव, स्थानीयकृत सूजन और अंततः रेटिना के मध्य भाग (जिसे मैक्युला कहा जाता है) में न्यूरोडीजेनेरेशन का कारण बनता है। अध्ययन के अनुसार, एएमडी तेजी से एक वैश्विक मुद्दा बन गया है और 50 वर्ष से अधिक आयु के एशियाई लोगों को एएमडी के शिकार बन रहे हैं। यह पहले ऐसा अध्ययन है, जिसमें वायु प्रदूषण की वजह से आंखों में होने वाली बीमारी का अध्ययन किया गया है। इससे पहले आंखों पर वायु प्रदूषण के प्रभाव पर बहुत बहस नहीं हुई है।

भारत में भी हो रहा है अध्ययन 

उधर, ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स) के ऑप्थल्मोलॉजी की प्रोफेसर डॉ राधिका टंडन का कहना है कि पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले लगभग सभी तत्वों से आँखों पर प्रभाव पड़ता है।  वह मानती हैं कि ताइवान में जो अध्ययन से जो परिणाम निकले हैं, लगभग ऐसे ही परिणाम भारत में भी देखने को मिल सकते हैं।

खासकर भारत में सूखी आंखें, आंख की एलर्जी आदि ऐसी बीमारियां हैं, जिनमें पिछले दशक में कई गुणा वृद्धि हुई है। एम्स में ही औसतन हर सप्ताह 50 से 100 मामले सामने आते हैं।

 दिल्ली की शहरी आबादी की आंखों पर वायु प्रदूषण और पराबैंगनी विकिरण जोखिम के प्रभाव को जानने के लिए संस्थान (एम्स) अपना अध्ययन कर रहा है। अध्ययन के लिए लगभग 12,000 लोगों की जांच की जा रही है जो प्राथमिक प्रदूषकों जैसे पीएम 2.5 (पार्टिकुलेट मैटर) और पीएम 10, एरोसोल, एनओ 2 (नाइट्रोजन डाइऑक्साइड), एसओ 2 (सल्फर डाइऑक्साइड), सीओ (कार्बन मोनोऑक्साइड) को सूरज के संपर्क में ले रहे हैं। और भौगोलिक स्थिति और स्थानीय व्यक्तिगत कारकों को भी देखेंगे।