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भारत में इमारतों व निर्माण कार्यों के मलबे का केवल 1 फीसदी हिस्सा किया जा रहा है रिसाइकल: सीएसई

देश में हर साल कंस्ट्रक्शन एंड डेमोलिशन से जुड़ा करीब 15 करोड़ टन कचरा उत्पन्न होता है। जबकि उसकी आधिकारिक रूप से ज्ञात रीसाइक्लिंग क्षमता केवल 6,500 टन प्रतिदिन है

By DTE Staff

On: Wednesday 26 August 2020
 

25 अगस्त 2020 को सीएसई द्वारा जारी एक नई रिपोर्ट से पता चला है कि भारत में कंस्ट्रक्शन एंड डेमोलिशन वेस्ट का केवल 1 फीसदी हिस्सा ही रिसाइकल किया जा रहा है| बाकि को खुले स्थानों या फिर लैंडफिल में छोड़ दिया जाता है जोकि वायु और जल को प्रदूषित कर रहा है|

बिल्डिंग मटेरियल प्रमोशन काउंसिल के अनुसार देश में हर साल कंस्ट्रक्शन एंड डेमोलिशन से जुड़ा करीब 15 करोड़ टन कचरा उत्पन्न होता है। जबकि उसकी आधिकारिक रूप से ज्ञात रीसाइक्लिंग क्षमता केवल 6,500 टन प्रतिदिन है| जोकि उसके करीब 1 फीसदी के बराबर है|

जबकि यदि गैर आधिकारिक आंकड़ों को देखें तो देश में उत्पन्न होने वाले कंस्ट्रक्शन एंड डेमोलिशन कचरा सरकारी अनुमान से तीन से पांच गुना अधिक है। ऐसे में सीएसई द्वारा जारी यह रिपोर्ट "अनादर ब्रिक ऑफ द वाल: इम्प्रोविंग कंस्ट्रक्शन एंड डिमोलिशन वेस्ट मैनेजमेंट इन इंडियन सिटीज" इस कचरे के प्रबंधन में सुधार करने और एक ठोस योजना प्रस्तुत करने की सिफारिश करती है|

2020 तक केवल 13 शहरों में स्थापित की गई है कंस्ट्रक्शन वेस्ट रीसाइक्लिंग की सुविधा

इस रिपोर्ट को सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण ने एक ऑनलाइन राउंड टेबल के दौरान जारी की थी| उन्होंने बताया कि हमारे अध्ययन से पता चलता है कि 2017 तक 53 शहरों में कंस्ट्रक्शन एंड डेमोलिशन वेस्ट को रीसाइक्लिंग करने के लिए प्लांट स्थापित करने की योजना थी| लेकिन 2020 तक केवल 13 शहरों ने ऐसा किया है। जबकि यदि निर्माण सामग्री की बात करें तो पत्थर, रेत, लौहा, एल्यूमीनियम और लकड़ी की मांग लगातार बढ़ती जा रही है, ऐसे में इस कचरे को रीसाइक्लिंग के बिना ऐसे ही फेंक देना सही नहीं है| 

उन्होंने आगे बताया कि इस वेस्ट का एक बड़ा भाग फिर से पुनःउपयोग किया जा सकता है| जिससे निर्माण के लिए जो प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है उसे कम किया जा सकता है| लेकिन इसके लिए सर्कुलर इकोनॉमी पर जोर देना जरुरी है, जिससे इस कचरे को फिर से संसाधन में बदला जा सके| इससे न केवल ऊर्जा की मांग घटेगी साथ ही बिल्डिंग्स और अन्य निर्माण के कारण पर्यावरण पर जो दबाव पड़ रहा है वो भी कम होगा|

सीएसई की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अनुमिता रॉय चौधरी के अनुसार कंस्ट्रक्शन एंड डेमोलिशन से जो वेस्ट उत्पन्न हो रहा है वह देश के कई शहरों में जलस्रोत, सार्वजनिक स्थानों और हरित क्षेत्रों के लिए एक बड़ी समस्या बन गया है| उन्होंने बताया कि एक तरफ जहां शहरों में 2024 तक वायु प्रदूषण के स्तर में 20 से 30 फीसदी कटौती करने का लक्ष्य है वहीं दूसरी ओर इस मलबे से निकलने वाली डस्ट, वायु को और प्रदूषित कर रही है|

सीएसई के शोधकर्ताओं के अनुसार हालांकि कंस्ट्रक्शन एंड डेमोलिशन वेस्ट (सीएंडडीएस) के पुनःउपयोग में जो कानूनी बाधाएं थी, वो दूर हो चुकी हैं इसके बावजूद इस कचरे के पुनःउपयोग की स्थिति अभी भी खराब बनी हुई है| गौरतलब है कि भारतीय मानक ब्यूरो ने भी कंस्ट्रक्शन एंड डेमोलिशन वेस्ट को रीसायकल करने से बने कंक्रीट के उपयोग को अनुमति दे दी है| इसके साथ ही द कंस्ट्रक्शन एंड डिमोलिशन वेस्ट रूल्स 2016 में भी रिसाइकल मैटेरियल के उपयोग को जरुरी कर दिया है|

स्वच्छ भारत मिशन में भी सीएंडडीएस वेस्ट मैनेजमेंट को दी है मान्यता

यहां तक कि स्वच्छ भारत मिशन ने भी सीएंडडीएस कचरा प्रबंधन की आवश्यकता को मान्यता दी है। स्वच्छ सर्वेक्षण 2021के लिए भी सीएंडडी वेस्ट प्रबंधन के लिए रैंकिंग के 100 अंकों को दोगुना कर दिया गया है| जो प्रबंधन के बुनियादी ढांचे और अपशिष्ट प्रसंस्करण दक्षता के बीच समान रूप से विभाजित है। इसके अंतर्गत शहरों में जगह-जगह सीएंडडी वेस्ट कलेक्शन सिस्टम लगाना होगा| जिसमें कचरे की प्रसंस्करण दक्षता के आधार पर रैंकिंग के अंक दिए जाएंगे। साथ ही इसमें एकत्र किये कचरे के पुन: उपयोग को भो ध्यान में रखा जाएगा|

अनुमिता रॉयचौधरी के अनुसार, स्वच्छ भारत मिशन और सीएंडडी वेस्ट रूल्स द्वारा इस कचरे को मान्यता देना एक नया अवसर प्रदान करेगा|

उनके अनुसार “हमारे इस नए अध्ययन में कंस्ट्रक्शन एंड डेमोलिशन वेस्ट सम्बन्धी नियमों को लागु करने में सामने आने वाली चुनौतियों से लेकर तकनीकी और नियमों सम्बन्धी बाधाओं का विस्तृत विश्लेषण किया गया है| इसमें उन आवश्यक रणनीतियों की पहचान की है जिसकी मदद से नियमों को लागु किया जा सकता है और रिसाइकल मैटेरियल को तेजी से बाजार में लाया जा सकता है| साथ ही इस विश्लेषण में कई शहरों की जमीनी हकीकत की भी जांच की गई है|"