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उत्तराखंड पंचायत चुनाव में प्लास्टिक प्रचार सामग्री पर रोक, क्या देश भर में होगा लागू?

उत्तराखंड पंचायत चुनाव, देशभर में संभवतः पहला ऐसा चुनाव होने जा रहा है, जिसमें प्रचार सामग्री के रूप में प्लास्टिक का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं होगा।

 
By Trilochan Bhatt
Last Updated: Thursday 19 September 2019
Photo: Vikas Choudhary
Photo: Vikas Choudhary Photo: Vikas Choudhary

उत्तराखंड में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। ये चुनाव आगामी 11 और 16 अक्टूबर को हरिद्वार को छोड़कर राज्य के बाकी 12 जिलों में होने जा रहे हैं। इन चुनावों के माध्यम से इन 12 जिलों में 10 हजार से ज्यादा ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य और जिला पंचायत सदस्य चुने जाने हैं। राज्य में इस बाद उम्मीदवारों के लिए कई तरह के दिशा निर्देश जारी किये गये हैं। अन्य अनेक शर्तों के अलावा इस बार राज्य के त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में प्लास्टिक की प्रचार सामग्री पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी गई है। यह देशभर में संभवतः पहला ऐसा चुनाव होने जा रहा है, जिसमें प्रचार सामग्री के रूप में प्लास्टिक का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं होगा। अब देखना यह है कि क्या इसे पूरे देश में लागू किया जा सकता है?

राज्य निर्वाचन आयुक्त ने इस बारे में स्पष्ट दिशा निर्देश जारी किये हैं। उम्मीदवारों को नामांकन पत्र भरते समय शपथ पत्र देना होगा कि वे प्लास्टिक की चुनाव प्रचार सामग्री बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं करेंगे। इसके साथ ही सभी जिलों के डीएम को आदेश दिये गये हैं कि यदि कोई उम्मीदवार प्लास्टिक की प्रचार-सामग्री का इस्तेमाल करता है तो उसके खिलाफ तुरन्त कार्रवाई की जाए। चुनावों में प्लास्टिक का सबसे ज्यादा इस्तेमाल बैनर बनाने में होता है। उम्मीदवार 6 गुना 3 वर्ग फुट से लेकर 20 गुना 10 वर्ग फुट तक के प्लास्टिक बैनर चुनावों में इस्तेमाल करते हैं।  यदि यह नियम कड़ाई से लागू होता है कि उत्तराखंड के त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में इस बार फ्लैक्स बैनर नजर नहीं आएंगे।

एक अनुमान के अनुसार फ्लैक्स बैनर इस्तेमाल न किये जाने से उत्तराखंड राज्य इन चुनावों में इस्तेमाल होने वाले करीब 2 करोड़ वर्ग फुट प्लास्टिक से बच जाएगा। उत्तराखंड के 12 जिलों में ग्राम पंचायत,  क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायतों के 10 हजार से अधिक पद हैं। यदि प्रत्येक पद के लिए औसतन 5 उम्मीदवार चुनाव लड़ते हैं तो उम्मीदवारों की कुल संख्या 50 हजार होगी। हर उम्मीदवार यदि 20 फ्लैक्स बैनर लगाता है तो कुल 10 लाख बैनर इन चुनावों में इस्तेमाल किये जाएंगे। यदि प्रत्येक बैनर का साइज सबसे छोटा यानी 6 गुना 3 वर्ग फुट भी माना जाय तो इसका सीधा अर्थ यह होता है कि राज्य में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में न्यूनतम 2 करोड़ वर्ग फुट प्लास्टिक फ्लैक्स बैनर के रूप में इस्तेमाल किया जाने वाला था। यदि पंचायत चुनाव में प्लास्टिक पाबंदी पूरी तरह अमल में लाई गई तो राज्य इस 2 करोड़ वर्ग फुट प्लास्टिक के संभावित इस्तेमाल से बच जाएगा।

उत्तराखंड में सिंगल यूज प्लास्टिक को लेकर लगातार मुहिम चला रहे गति फाउंडेशन संस्था के अध्यक्ष अनूूप नौटियाल राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा प्लास्टिक की प्रचार सामग्री पर लगाई गई पाबंदी को प्लास्टिक उन्मूलन की दिशा में उठाया गया एक बेहतर प्रयास मानते हैं, लेकिन साथ ही यह भी कहते हैं कि असली परीक्षा तो इसे लागू करने की होगी। यदि प्रशासन वास्तव में ऐसा करवाने में सफल हो जाता है तो आने वाले दूसरे चुनावों के लिए भी यह एक मिसाल होगी और न सिर्फ उत्तराखंड, बल्कि देश के अन्य राज्यों में ऐसा करना संभव हो पाएगा।

अनूप नौटियाल कहते हैं कि प्लास्टिक की प्रचार-सामग्री के साथ ही चुनाव संबंधी पार्टियों और भोजों में भी सिंगल यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल न करने संबंधी शपथ पत्र उम्मीदवारों से लिया जाता तो ज्यादा अच्छा होता। वे कहते हैं कि लगभग हर उम्मीदवारा चुनाव प्रचार के दौरान छोटे-बड़े सामूहिक भोज का आयोजन करता है। इन भोजों और पार्टियों में सिंगल यूज प्लास्टिक का जमकर इस्तेमाल किया जाता है। वे कहते हैं कि उम्मीदवारों को अपने स्तर पर भोजों और पार्टियों में सिंगल यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए।

देहरादून में पंचायत चुनाव के लिए प्रचार सामग्री की दुकानें सज गई हैं। फोटो: त्रिलोचन भट्ट
अनूप नौटियाल प्लास्टिक फ्लैक्स बैनर की जगह कपड़े के बैनर इस्तेमाल करने को भी बहुत बड़ा क्रान्तिकारी कदम नहीं मानते हैं। वे कहते हैं कि कपड़े का कार्बन फुट प्रिंट प्लास्टिक से ज्यादा होता है। ऐसे में कपड़े का बैनर तत्काल होने वाले वाले प्रदूषण से बेशक मुक्त रख सकता है, लेकिन लंबेे समय के लिए यह कोई विकल्प नहीं है। वे कहते हैं कि अब समय आ गया है जब हमें चुनाव प्रचार के तौर-तरीकों को पूरी तरह से बदलना होगा।

दूसरी तरफ जन प्रतिनिधि इस व्यवस्था का विरोध तो नहीं करते, लेकिन यह जरूर मानते हैं कि इससे चुनाव प्रचार करना कुछ कठिन हो जाएगा। जोशीमठ विकास खंड के पूर्व अध्यक्ष प्रकाश रावत कहते हैं कि पहले गांवों में एक-दो बैनर लगा दिये जाते थे, इससे गांव के ज्यादातर लोगों तक उम्मीदवार का नाम और चुनाव निशान पहुंच जाता था, लेकिन अब एक-एक वोटर तक पहुंचने के लिए ज्यादा मेहनत और समय लगाना पड़ेगा। वे इस कदम को उचित बताते हैं, लेकिन यह भी कहते हैं कि प्लास्टिक के उत्पादन पर ही पूरी तरह से रोक लगाई जानी चाहिए।

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