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अपना तन, मन और धन लगाकर इस सेवानिवृत्त अधिकारी ने बनवा दिए 100 तालाब  

एक रुपये में करीब 30 से 50 लीटर वर्षा जल संचयन करने वाले चेकडैम तालाब का तरीका बेहद सस्ता और टिकाऊ है । खास बात यह है कि सड़क निर्माण के दौरान किनारों पर ऐसे तालाब आसानी से बनाए जा सकते हैं।

By Vivek Mishra

On: Saturday 30 November 2019
 
मध्य प्रदेश के झाबुआ में स्थित गांव मनासिया में बनाया गया तालाब।

एक तरफ सैकड़ों बेहतरीन तालाब राज और समाज की उपेक्षा के शिकार हैं तो दूसरी तरफ 68 वर्षीय रामचंद वीरवानी जैसे लोग हैं जो अपने दम पर अकेले ही सैकड़ों तालाब बना देने का माद्दा रखते हैं। आपको जानकर हैरानी हो सकती है कि संसद के उच्च सदन राज्यसभा में निदेशक रह चुके रामचंद वीरवानी ने अपना तन, मन और धन लगाकर देश के अलग-अलग हिस्सों में न सिर्फ लगभग 100 तालाब बना दिए हैं बल्कि बंजर जगहों को वर्षाजल और हरियाली से गुलजार कर दिया है। 

रामचंद वीरवानी डाउन टू अर्थ को बताते हैं कि उनके पुरखे पाकिस्तान से उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में आकर बस गए थे। बाद में उनका परिवार दिल्ली आ गया। और अब वे पूरी तरह दिल्ली के ही हो चुके हैं। उनकी नौकरी से सेवानिवृत्ति 2012 में हुई, तब से करीब आठ बरस बीत चुके हैं और वे जल संरक्षण की सरंचनाओं के लिए लगातार काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि इस सामाजिक काम की शुरूआत में बड़ी कठिनाई पेश आई। हालांकि अब स्थिति यह हो गई है कि उन्हें तालाब बनाने या वर्षा जल संरचनाओं को ठीक कराने के लिए दूर-दराज के गांवों से फोन आ जाते हैं।  

समाज को कैसे और क्या दिया जाए?

रामचंद वीरवानी बताते हैं कि राज्यसभा में उच्च अधिकारी होने के कारण मुझे हमेशा वीआईपी उपचार ही मिलता था। ऐसा हमेशा महसूस होता था कि इसकी अदाएगी समाज को कैसे की जाए? शास्त्रों में वर्णित है कि तालाब बनवाया जाए या फिर तालाब ठीक कराया जाए दोनों ही कामों में पुण्य मिलता है। मैं इसी रास्ते पर बढ़ चला। मैंने चेक डैम बनाकर तालाब बनाने का काम शुरु किया। यह तरीका इतना सस्ता और टिकाऊ साबित हुआ कि न सिर्फ करोड़ो लीटर पानी बेहद कम खर्च में बचाया जा सकता है बल्कि ऐसे क्षेत्र जहां सूखे की समस्या है वहां वर्षा जल का सरंक्षण कर बेहतर तरीके से पानी का इस्तेमाल लिया जा सकता है। मैंने समाज को ऐसा ही कुछ देने का निर्णय लिया, जो अब भी जारी है।

नीचे दी गई तस्वीर मध्य प्रदेश के झाबुआ में मनासिया गांव की है। जहां 2016 में तालाब बनाने का काम रामचंद वीरवानी ने शुरु किया गया। यह तालाब करीब डेढ़ मीटर गहरा, 40 मीटर चौड़ा और करीब 50 मीटर लंबा है। इस तालाब की क्षमता करीब 30 लाख लीटर वर्षा जल के संग्रहण की है। यह दृश्य ऊपर प्रदर्शित किए गए हरे-भरे तालाब से दो बरस पहले का है। 

दो साल ये थे हालात।

 

बिना अनुभव हुई शुरुआत

रामचंद वीरवानी बताते हैं कि जब मैंने यहा सामाजिक कार्य शुरु किया तब मेरे पास कोई अनुभव नहीं था। शुरु में मैंने जो पैसे खर्च किए उसके सकारात्मक परिणाम नहीं भी मिले। लेकिन कहते हैं कि कोई सवार घोड़े की सवारी तभी सीखता है जब वह सवारी के दौरान कई बार गिर जाए। उनके जल संरक्षण के काम का आगाज मध्य प्रदेश के बालाघाट में 2012 में एक कुंआ खोदकर शुरू हुआ था। इसके बाद 2013 में उन्होंने मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में हाथी पावा पहाड़ी पर काम किया। यहां दो मिट्टी का चेक डैम बनाकर तालाब बनाया। बाद में इस पहाड़ी पर पौधारोपण का काम भी हुआ, यह तालाब बेहद मददगार साबित हुआ। तब से उनका हौसला और अधिक बढ़ गया।   

ऐसे बना सकते हैं बेहद सस्ता और टिकाऊ मैदानी तालाब

रामचंद वीरवानी ने बताया कि तालाब निर्माण के लिए सबसे पहले वे उस क्षेत्र का विस्तृत सर्वे करते हैं। इसके दो कारण हैं पहला वह जगह तालाब बनाने हेतु कितनी उपयुक्त है और दूसरा तालाब बनाने हेतु वहां आस-पास चिकनी मिट्टी या काली मिट्टी, मुरम और पत्थर आदि उपलब्ध हैं या नहीं ताकि लागत कम आये। तालाब में पानी आने का रास्ता अर्थात कैचमेंट एरिया और निकासी का रास्ता दोनों ही काफी अहम होते हैं। इनका ख्याल रखना पड़ता है।  पुराने तालाबों को बनाते समय भी इन बातों का विशेष ख्याल रखा जाता था।

मिट्टी वाले चेक डैम पहले भी बनाये जाते थे और अब भी बनाये जाते हैं। पहले नींव खोदकर तराई करके उसमें बहुत अच्छी वाटर प्रूफ या जल रोधी टाइप की मिट्टी भरी जाती है और उसको बीच-बीच में पानी की तराई करके दबाते हुए ऊपर उठाते जाते हैं। इसकी ऊंचाई जितना पानी का लेवल रखना चाहते हैं उससे दो फुट ऊपर तक रखते हैं। फिर इस मिट्टी के बांध को जिसे पडल (पाल) भी कहते हैं चारों ओर से मुरम से ढक देते हैं और उसके बाद पानी के ऊपर से नीचे गिरने के लहरिया एक्शन से मिट्टी / मुरम के क्षरण को रोकने और बांध की मजबूती के लिए इसके पानी की ओर वाले ढलान को पत्थरों से ढक देते हैं अर्थात पिचिंग करते हैं। बांध के पीछे वाले हिस्से में भी नीचे की और से बड़े बड़े पत्थर आधी ऊंचाई तक लगा देते हैं ताकि मिट्टी ढहे नहीं।

उन्होंने बताया कि यदि कोई कम खर्च में चेकडैम बनाकर तालाब बनाना चाहें तो कम ऊंचाई वाले बांधों में लागत बहुत कम आती है कहीं कहीं उपयुक्त जगहों पर केवल चिकनी मिट्टी के बनाये छोटे चेक डैम भी सालों तक जल भंडारण करते रहते हैं। इनमें खर्च बहुत कम आता है और जगह के हिसाब से कभी-कभी अपेक्षतया कम कीमत में अधिक जल भंडार मिल जाता है। हरियाली और भूगर्भ जल पुनर्भरण के लिए बंजर आदि स्थानों में ऐसे तालाब बहुत उपयोगी होते हैं।  

एक रुपये में 30 से 50 लीटर पानी के संचय का मकसद

रामचंद वीरवानी का कहना है कि मैं सुंदरता पर ध्यान नहीं देता। मेरा सारा ध्यान लागत कम करने और संरचना को टिकाऊ बनाने पर होता है। लाखों खर्च करने के बजाए बेहद कम लागत में पानी को रोका जा सकता है, भू-जल रीचार्ज या अन्य पानी वाले कार्यों के लिए ऐसी तमाम संरचनाएं बनाई जा सकती हैं। मैं जिन छोटे चेक डैम की बात कर रहा हूं उनकी लागत का हिसाब यह है कि एक रुपये में करीब 30 से 50 लीटर तक पानी का संचय किया जा सकता है। संचय की मात्रा के हिसाब से यह लागत कुछ भी नहीं है। खासतौर से सड़कों के किनारे चेकडैम तालाब बनाने का काम तो बेहद आसानी से किया जा सकता है। एमपी के झाबुआ जिले में पेटलावाद के गामड़ी गाव स्थित सड़क पर ऐसा प्रयोग मैने किया है। एक तरफ सड़क और तीन तरफ छोटे-छोटे बांध बनाए। जिसमें तीन तालाब बन गए। इस बार बरसात में न सिर्फ इन तीनों तालाब में लाखों लीटर वर्षा जल भरा है बल्कि पुनर्भरण से हरियाली भी है। सड़कों किनारे इस तरह के तालाब का तरीका संभवत : पहला तरीका होगा। यह बहुत आसान काम है और बस इसे शुरू करने की देर भर है।  

तालाब को गहरा कराना, एक पंत तीन काज

रामचंद वीरवानी ने बताया कि तालाबों के काम के लिए जल्दी जगह मिलती नहीं है। लोगों ने जंगल काट दिए हैं या फिर तालाबों पर अतिक्रमण है। हालांकि, अधिकांश जंगलों, गांव और शहरों के किनारे ऐसी कई जगह अब भी मौजूद हैं जहां न हरियाली होती है और न ही पानी के कोई साधन। ऐसी जगहों पर तालाब आसानी से बनवाए जा सकते हैं। तालाबों को गहरा कराने का काम भी मैं कर रहा हूं। इससे जो उपजाऊ मिट्टी मिलती है वह किसानों को दे दी जाती है और कुछ मिट्टी से आस-पास ही छोटे बंधे बनाकर तालाब बना दिए जाते हैं। यह एक पंत तीन काज हो जाता है।

ग्रामीणों की मुस्कान मेरा ईनाम

रामचंद वीरवानी बताते हैं कि उत्तराखंड में  अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड, मध्य प्रदेश में झाबुआ और बुरहानपुर, खंडवा इन सभी जगहों पर कुएं, चाल-खालें, चेक डैम आदि बनवाए हैं। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश में ही कालीघाटी में एक सरकारी बांध था जो कि 200 फुट लंबा था। यह बांध टूट गया था और यहां आठ वर्षों से पानी का भीषण संकट बना हुआ था। मैंने उस बांध को रिपेयर कराया। आज वहां जलसंकट खत्म है। लोग सिंचाई और अन्य कामों के लिए पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं। पूरे गांव ने मेरा अभिवादन किया, उससे जो खुशी मिली वह किसी ईनाम से कम नहीं है। इसी तरह उत्तर प्रदेश के महोबा जिले में कुलपहाड़ गांव में दो चेकडैम तालाब बनवाए। एक सड़क किनारे ही था। वहां भी काफी सराहना मिली। यही अच्छे कामों का असली ईनाम है।

इस सामाजिक काम का दुखद पक्ष 

उन्होंने तमाम खुशियों के बीच यह भी कहा कि मुझे ग्रामीणों से और लोगों से कुछ सलाह तो मिल जाती है लेकिन यह कड़वी सच्चाई है कि बिना पैसों के कोई भी न मदद करने के लिए खुद-ब-खुद आगे नहीं आता है और न ही तालाबों की देख-रेख के काम में हाथ बंटाता है। पुराने जमाने से अब यह बदलाव आ गया है कि लोग पूंजी और अपने लाभ को देखे बिना कुछ करते नहीं। कुछ अच्छे और मददगार लोग मिले हैं और मैं यह काम जारी रखूंगा।