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जैविक खेती का सच-1: खेती बचाने का एकमात्र रास्ता, लेकिन...

पर्यावरण और स्वास्थ्य पर रासायनिक खेती के गंभीर दुष्प्रभाव को देखते हुए जैविक व प्राकृतिक खेती की तरफ लोगों का झुकाव बढ़ रहा है

By Amit Khurana, Vineet Kumar

On: Thursday 26 November 2020
 
फोटो: विकास चौधरी
फोटो: विकास चौधरी फोटो: विकास चौधरी

पर्यावरण और स्वास्थ्य पर रासायनिक खेती के गंभीर दुष्प्रभाव को देखते हुए धीरे-धीरे ही सही लेकिन जैविक व प्राकृतिक खेती की तरफ लोगों का झुकाव बढ़ रहा है। यह खेती अपार संभावना ओं का दरवाजा खोलती है। हालांकि भारत में यह खेती अब भी सीमित क्षेत्रफल में ही हो रही है। सरकारों द्वारा अभी काफी कुछ करना बाकी है। अमित खुराना व विनीत कुमार ने जैविक खेती के तमाम पहलुओं की गहन पड़ताल की

उत्तर प्रदेश में मेरठ जिले के भामौरी गांव के किसान सुनील कुमार खेती में इस्तेमाल हो रहे अंधाधुंध रसायनों से छुटकारा चाहते थे। सेना से रिटायर होने के बाद वह पिछले तीन साल से अपनी 4 एकड़ जमीन पर गन्ने, गेहूं, फल, सब्जियों आदि की जैविक खेती कर रहे हैं। शुरुआत में पैदावार काफी घट गई और नुकसान भी उठाना पड़ा, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। मेहनत और लगन से आज जैविक खेती की पैदावार अच्छी हो गई है। वह जैविक उत्पाद सीधे उपभोक्ता को बेचकर अच्छा लाभ कमा रहे हैं। उनका कहना है, “जैविक खेती में शारीरिक श्रम और भागदौड़ काफी बढ़ गई है, लेकिन जैविक फसलों का प्रीमियम मूल्य मिलने से अच्छा लाभ हो जाता है।” 

सुनील कुमार की तरह आंध्र प्रदेश के प्रकाशम जिले के गोनेवारीपालेम गांव के किसान रामनजनेयुलु भी पिछले पांच वर्ष से 10 एकड़ जमीन पर सहजन, करेला, बाजरा, धान, काला चना, हरा चना, कपास, मिर्च आदि की प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। वह बताते हैं, “पहले रासायनिक खेती के लिए मुझे लगभग 1.5 लाख रुपए का रासायनिक खाद, कीटनाशक आदि खरीदना पड़ता था, लेकिन अब प्राकृतिक खेती में प्रयुक्त होने वाला सारा सामान जैसे जीवामृत, देसी बीज आदि खेत में ही बना लेता हूं। बाजार से कुछ खरीदना नहीं पड़ता। पहले वर्ष पैदावार करीब 20 प्रतिशत घट गई थी, जो अब मिट्टी का स्वास्थ्य सुधरने से अच्छी हो गई है।” वह आगे बताते हैं, “प्राकृतिक खेती से पैदा किए उत्पाद का स्वाद बहुत अच्छा है, जो मेरे परिवार और ग्राहकों को बहुत पसंद आता है। हालांकि, मेरा शारीरिक श्रम पहले की तुलना में काफी बढ़ गया है।” 

आज देश के कई हिस्सों में ऐसे किसानों के उदाहरण मिल जाते हैं, जो सफलतापूर्वक जैविक और प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। हालांकि, ऐसे किसान सिर्फ गिनती के हैं। मेरठ जिले के किसान नितिन काजला पिछले 6 साल से जैविक खेती कर रहे हैं। वह बताते हैं, “यह चुनौतियों भरा सफर है। इसमें सिर्फ जुनूनी किसान ही टिक पाते हैं। रासायनिक खेती से जैविक खेती में बदलने पर शुरुआती वर्षों में पैदावार का नुकसान अधिकतर किसान झेल नहीं पाते और वापस रासायनिक खेती में लौट जाते हैं। यह खेती बहुत ज्यादा श्रम और समय मांगती है।” उत्तर भारत में सबसे पहले रसायन मुक्त खेती की शुरुआत करने वाले किसानों में गिने जाने वाले शूरवीर सिंह बताते हैं, “आज किसान और सरकारें रसायन मुक्त खेती का सही ज्ञान और स्पष्टता न होने के कारण भ्रमित हैं। अगर सही ज्ञान और विधि का इस्तेमाल हो तो पैदावार भी रासायनिक खेती के बराबर हो जाती है। आज किसानों के पास श्रम, देसी बीज, पशु आदि सही मात्रा में नहीं हैं और न ही स्थानीय जलवायु आधारित कृषि संबंधी ज्ञान और रसायन मुक्त खेती में प्रयुक्त होने वाली विधियों का ज्ञान है।”



हरियाणा के करनाल जिले के अनुभवी जैविक किसान जितेंदर मिगलानी बताते हैं, “अक्सर रसायन मुक्त खेती सिखाने वाले ट्रेनर के पास खुद के खेत में ही कोई मॉडल नहीं होता। ऐसे में वह हवा हवाई बातें करते हैं जिससे किसान को बड़ी मुश्किल का सामना करना पड़ता है। किसान को अपनी समस्या के समाधान के लिए कई जगह भटकना पड़ता है।” जमीनी स्तर पर इसी तरह की चुनौतियों के चलते बहुत से किसान रसायन मुक्त खेती नहीं अपना पा रहे हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आज खेती के भविष्य को लेकर चर्चाएं छिड़ी हैं।

संयुक्त राष्ट्र समर्थित इंटरनेशनल असेसमेंट ऑफ एग्रीकल्चर नॉलेज, साइंस एंड टेक्नोलॉजी, 2008 और संयुक्त राष्ट्र संघ के वर्ल्ड फूड सिक्योरिटी के हाई लेवल पैनल ऑफ एक्सपर्ट्स ऑन फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन, 2019 द्वारा रसायन आधारित और इनपुट इंटेंसिव कृषि के टिकाऊपन और चिरस्थायी होने पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। संयुक्त राष्ट्र के फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन (एफएओ) ने भी 2015 में कहा कि कृषि भूमि क्षरण की वजह से सिर्फ अगले 60 साल तक ही भूमि कृषि लायक बची रह पाएगी। 

भारत में भी आज खेती के रसायन आधारित उत्पादन मॉडल और अन्य कृषि संबंधी नीतियों ने भारतीय कृषि और किसानों के सामने पर्यावरण, आर्थिक और अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है। 1960 के दशक में शुरू हुई हरित क्रांति ने देश का खाद्यान्न उत्पादन तो बढ़ा दिया, लेकिन कई तरह की विकट समस्याएं भी खड़ी कर दीं। हरित क्रांति में अन्न उत्पादन बढ़ाने के लिए नए बीजों, रासायनिक उर्वरकों व सिंचाई सुविधाएं बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया गया। आज स्थिति यह है कि देश का काफी बड़ा हिस्सा भूमि क्षरण और जल प्रदूषण, जैव विविधता के क्षय, मनुष्यों और पशुओं के गिरते स्वास्थ्य जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है।

देश की खाद्य उत्पादन व्यवस्था मिट्टी के बिगड़ते स्वास्थ्य, बंजरपन, घटती कृषि विविधता, घटती पैदावार, रासायनिक कीटनाशकों के प्रदूषण और पेस्ट रेसिस्टेन्स जैसी समस्याओं से जूझ रही है। खेती में आने वाला खर्च कृषि उत्पाद के मूल्य की तुलना में तेजी से बढ़ा है। नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन (एनएसएसओ) के सर्वे 2013 के मुताबिक, देश में दो तिहाई कृषि परिवारों के खर्चे, उनकी आमदनी से ज्यादा थे। किसानों को कृषि उत्पाद का सही दाम न मिलना, खेती में बढ़ता खर्च और कर्जे, किसान आत्महत्याएं, ग्रामीण युवाओं का खेती में घटता रुझान, मजदूरों का गैर कृषि कार्यों में पलायन और खेती के लिए उपलब्ध न होना बड़ी समस्याएं बनकर उभरे हैं। इन सब समस्याओं के अलावा अब जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे से कृषि संकट और ज्यादा गहरा रहा है। आज आत्मनिर्भर भारत की बातें हो रही हैं, जो कृषि को इस संकट से उबारे बिना संभव नहीं क्योंकि कृषि किसी भी देश की संप्रभुता का एक मुख्य आधार स्तम्भ है। 

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