Sign up for our weekly newsletter

इंसान कितना कर चुके हैं समुद्रों पर निर्माण, वैज्ञानिकों ने पहली बार किया आंकलन

अब तक समुद्र के करीब 32,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर इंसानों ने निर्माण कार्य किया है। अनुमान है कि यह 2028 तक बढ़कर 39,400 वर्ग किलोमीटर हो जाएगा

By Lalit Maurya

On: Tuesday 01 September 2020
 

विकास की चाह में इंसान ने समुद्र पर कितना निर्माण और विकास कार्य किया है, वैज्ञानिकों ने उसका आंकलन कर लिया है। यह पहली बार है जब समुद्रों पर बढ़ते इंसानी प्रभाव को आंका जा सका है। वैज्ञानिकों के अनुसार अब तक समुद्र के लगभग 32,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर इंसानों ने अपनी जरुरत के हिसाब से निर्माण कार्य किया है। यह समुद्र के करीब 0.008 फीसदी के बराबर है। अनुमान है कि यह 2028 तक बढ़कर 39,400 वर्ग किलोमीटर हो जाएगा। 

यह तो वह प्रभाव है जो सीधे तौर पर इंसानों द्वारा किए निर्माण कार्यों के कारण पड़ रहा है। यदि इसमें अप्रत्यक्ष प्रभावों जैसे प्रदूषण और जल प्रवाह में किये बदलावों को भी इसमें सम्मिलिति कर लिया जाए तो यह असर 34 लाख वर्ग किलोमीटर का हो जाता है, जोकि समुद्र के कुल हिस्से के 0.5 फीसदी से भी ज्यादा है। सिडनी स्कूल ऑफ लाइफ एंड एनवायरनमेंटल साइंसेज और सिडनी इंस्टीट्यूट ऑफ मरीन साइंस द्वारा किया गया यह शोध जर्नल नेचर सस्टेनेबिलिटी में प्रकाशित हुआ है। 

मनुष्य ने समुद्रों पर अपनी कितनी छाप छोड़ी है उसे इस तरह समझ सकते हैं यह वैसा ही है जैसे कि जमीन पर शहरों की बसावट है। जबकि प्राकृतिक आवासों से इसकी तुलना करें तो यह दुनिया भर में फैले मैन्ग्रोव के जंगल से भी कहीं ज्यादा है। समुद्रों के जिन क्षेत्रों में विकास और निर्माण का असर पड़ा है उसमें सुरंग और पुलों के कारण प्रभावित हुआ क्षेत्र शामिल है। इसके साथ ही ऊर्जा के लिए तैयार किये गए बुनियादी ढांचे जैसे तेल और गैस के कुंए, विंड फार्म, पोर्ट और बंदरगाह, एक्वाकल्चर के लिए तैयार किया इन्फ्रास्ट्रक्चर और कृत्रिम रीफ्स भी इसमें शामिल हैं। 

कोई नया नहीं है समुद्रों पर निर्माण का इतिहास 

इस शोध की प्रमुख शोधकर्ता ऐना बगनोट के अनुसार महासागरों पर इंसान द्वारा किया जा रहा यह विकास नया नहीं है। बस सिर्फ उसकी गति पहले से काफी बढ़ गई है। 2000 ईसा पूर्व भी समुद्रों पर निर्माण कार्य किया जाता था। उस समय समुद्री यातायात को नियंत्रित करने के लिए वाणिज्यिक बंदरगाहों और समुद्र के पानी से नगर को बचाने के लिए बांध जैसी संरचनाओं का निर्माण किया गया था। 

वहीं दूसरी तरह 20वीं सदी के मध्य से समुद्रों पर हो रहे इन विकास कार्यों की रफ़्तार में वृद्धि हुई है। जिसके कुछ अच्छे और कुछ बुरे नतीजे सामने आए हैं। उदाहरण के लिए जो पर्यटन और मछली पकड़ने को बढ़ावा देने के लिए कृत्रिम रीफ्स का निर्माण किया है वो संवेदनशील प्राकृतिक आवासों जैसे कि सीग्रास, मडफ्लैट्स और साल्टर्मास पर भी असर डाल रही हैं। इससे पानी की गुणवत्ता में भी गिरावट आ रही है। 

2028 तक इसमें 70 फीसदी तक की वृद्धि होने का लगाया है अनुमान 

ऐना के अनुसार सबसे ज्यादा समुद्री विकास, तटीय क्षेत्रों में हो रहा है जोकि महासागर का सबसे अधिक जैव विविधता वाला हिस्सा होता है। यह जैविक रूप से महासागरों का सबसे उत्पादक हिस्सा होता है। ऐना के अनुसार जिस तेजी से यह विकास हो रहा है, उसके चलते 2028 तक इसमें 50 से 70 फीसदी की वृद्धि होने का अनुमान है। जिसके लिए मुख्य रूप से बिजली और इंटरनेट के लिए बिछाई जा रही केबल और सुरंगे, एक्वाकल्चर के लिए तैयार किया जा रहा बुनियादी ढांचा आदि जिम्मेदार हैं। 

साथ ही दुनिया भर में जिस तरह से जलवायु परिवर्तन का असर पड़ रहा है उसके कारण समुद्री जल स्तर में वृद्धि हो रही है और तटीय अपरदन भी हो रहा है। जिससे बचाव के लिए तेजी से विकास कार्य किया जा रहा है। इसके साथ ही ट्रांसपोर्ट, ऊर्जा और टूरिज्म के लिए भी समुद्र में संरचनाओं का विकास किया जा रहा है।

 हालांकि उनके अनुसार यह जो आंकड़ा है वो उससे कहीं ज्यादा हो सकता है, क्योंकि दुनिया के कई देशों में कितना विकास कार्य किया जा रहा है उसके बारे में सही जानकारी उपलब्ध नहीं है और उन देशों में नियमों की कमी उसे और छुपा रही है। ऐसे में शोधकर्ताओं का मानना है कि इससे निपटने के लिए बेहतर प्रबंधन की जरुरत है। जिससे समुद्रों पर इस विकास के पड़ रहे नकारात्मक प्रभावों को सीमित किया जा सके।