Water

जल संकट का समाधान: इस सरकारी स्कूल ने पेश की मिसाल

आगरा का एक सरकारी स्कूल रेन वाॅटर हार्वेटिंग के दम पर बारिश के पानी का प्रयोग साल भर तक पीने और खाना बनाने में करता है।

 
Last Updated: Thursday 22 August 2019
आगरा के राजकीय स्कूल में बारिश के पानी को टैंक में रखा जाता है, जिसका इस्तेमाल साल भर किया जाता है। फोटो: प्रदीप श्रीवास्तव
आगरा के राजकीय स्कूल में बारिश के पानी को टैंक में रखा जाता है, जिसका इस्तेमाल साल भर किया जाता है। फोटो: प्रदीप श्रीवास्तव आगरा के राजकीय स्कूल में बारिश के पानी को टैंक में रखा जाता है, जिसका इस्तेमाल साल भर किया जाता है। फोटो: प्रदीप श्रीवास्तव

प्रदीप श्रीवास्तव

तेजी से बढ़ती जनसंख्या और पानी के अंधाधुंध प्रयोग के कारण आगरा शहर के कई इलाके डार्क जोन में तब्दील होते जा रहे हैं। यमुना नदी से करीब एक किलोमीटर दूर कालिंदी विहार मोहल्ले का भूजल स्तर 150 फीट से ज्यादा नीचे जा चुका है। यहां के कई इलाकों के हैंडपंप फेल हो चुके हैं। निवासियों को पानी टैंक से खरीदना पड़ रहा है। जबकि, यहां का सरकारी स्कूल मिसाल पेश कर रहा है। यहां पानी की बूंद को सहेजा जाता है और उसका इस्तेमाल किया जाता है। 

यूं तो आगरा के शहरी क्षेत्र में 430 सरकारी प्राथमिक एवं पूर्व माध्यमिक विद्यालय हैं। स्कूलों में सरकारी हैंडपंप ही पानी के एक मात्र साधन हैं, जिसकारण कई स्कूलों में पीने का पानी घर से लाना पड़ता है। परंतु कालिंदी विहार स्थित प्राथमिक एवं पूर्व माध्यमिक विद्यालय में ऐसा नहीं है।

2017 सेंटर फाॅर अर्बन एंड रीजिनल एक्सिलेंस - क्योर - ने एक पाॅयलट प्रोजेक्ट के तरह स्कूल मैनेजमेंट कमेटी और बेसिक शिक्षा अधिकारी के साथ बैठक कर पानी की समस्या झेल रहे स्कूल में वर्षा जल संग्रहण सिस्टम लगाने का ऑफर रखा। क्योर संस्था से जुड़े राजीव कहते हैं कि अधिकारियों के मानने के बाद कालिंदी विहार के स्कूल में 72 हजार लीटर का एक स्टोरेज टैंक बनाया गया। एक हजार वर्ग फीट के स्कूल भवन के छत को पाइप लाइन के माध्यम से टैंक से जोड़ा गया। पानी की गंदगी को साफ करने के लिए टैंक व छत के बीच में एक सैंड पिट बनाया गया। वाटर हारवेटिंग सिस्टम को तैयार करने में करीब 3 लाख रूपये खर्च क्योर संस्था ने वहन किया। 

वह बताते हैं कि बारिश का पानी पूरी तरह से साफ रहता है। बस कुछ बारीक धूल के कण होते हैं, जिसे सेटल करने के लिए साल में एक बार 1.5 किलोग्राम फिटकरी डालना पड़ता है। इसके अलावा मिनरल्स की भरपाई के लिए तीन किलोग्राम चीनी और एक किलोग्राम नमक डालते हैं। पानी की गुणवत्ता जांचने के लिए हर दो माह में पीएच और टीडीएस लेवल चेक करते हैं। प्रमाणिक लैब में पानी की संपूर्ण जांच साल में एक बार की जाती है।

प्रिंसिपल भारती कहती हैं कि अभी तक हर मानसून में टैंक में पानी पूरा भर जाता है। भूजल रिचार्ज का सिस्टम नहीं होने के बाजवूद टैंक भर जाने के बाद बारिश के पानी को पौधों और जमीन में डाल देते हैं। स्कूल ग्रीष्मकालीन व राजकीय अवकाश के बाद साल भर में 240 दिन खुलता है। एक बच्चा औसतन एक दिन में एक लीटर पानी पीता है। स्कूल में दो सौ बच्चे हैं, इस हिसाब से पूरे साल मात्र 48 हजार लीटर पानी खर्च होता है। शेष पानी का प्रयोग मिड डे मिल व दूसरे कामों में किया जाता है।

स्कूल में जीरो वेस्ट वाटर सिस्टम का पालन किया जाता है। पानी की बेहतर व्यवस्था के बाद से स्कूल में हर साल बच्चों की संख्या बढ़ती जा रही है, सन 2018 में 145 बच्चे थे, जबकि सन 2018-19 सत्र में 200 से ज्यादा बच्चे हैं। स्कूल की रसोइया विद्या कहती है कि स्टोर किए गए पानी से खाना जल्दी पकता है। हल्दी का कम प्रयोग करना पड़ता है। वहीं, स्कूल का एक छात्र जावेद कहता है कि खाना भी और जगहों से ज्यादा स्वादिष्ट लगता है। 

आगरा जिले में 4,150 प्राथमिक व उच्च प्राथमिक विद्यालय हैं, जहां करीब 4.5 लाख छात्र - छात्राएं पढ़ते हैं। भूगर्भ जल विभाग के अनुसार आगरा का भूजल स्तर हर साल करीब एक मीटर तक नीचे गिर रहा है। पानी की बढ़ती समस्या को देखते हुए रेन वाॅटर हाॅर्वेटिंग स्कूलों के लिए वरदान साबित होगा।

Subscribe to Weekly Newsletter :

Comments are moderated and will be published only after the site moderator’s approval. Please use a genuine email ID and provide your name. Selected comments may also be used in the ‘Letters’ section of the Down To Earth print edition.