देश के 15 जिलों की जमीनी पड़ताल-4 : गुजरात के इन जिलों में न बेड मिले, न स्टाफ और न ऑक्सीजन

कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान गुजरात के पंचमहल और गोदारा जिले में हालात काफी बिगड़ गए

By Jumana Shah

On: Friday 30 July 2021
 
कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान गुजरात के अस्पतालों की हालत दयनीय रही।
कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान गुजरात के अस्पतालों की हालत दयनीय रही। कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान गुजरात के अस्पतालों की हालत दयनीय रही।

डाउन टू अर्थ ने कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान देश के सबसे अधिक प्रभावित 15 जिलों की जमीनी पड़ताल की और लंबी रिपोर्ट तैयार की। इस रिपोर्ट को अलग-अलग कड़ियों में प्रकाशित किया जा रहा है। पहली कड़ी में आपने पढ़ा कि कैसे 15 जिले के गांव दूसरी लहर की चपेट में आए। दूसरी लहर में आपने पढ़ा अरुणाचल प्रदेश के सबसे प्रभावित जिले का हाल। तीसरी कड़ी में आपने पढ़ा, हिमाचल के लाहौल स्पीति की जमीनी पड़ताल। आज पढ़ें , दूसरी लहर के दौरान गुजरात में कैसे रहे हालात-

गीताबेन वसावा एक मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (आशा) हैं, जिन्होंने कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान कई हफ्तों तक एक भी दिन की छुट्टी नहीं ली। वे पंचमहल जिले के घोघंबा तालुका में काम करती हैं और कभी-कभी एक मरीज तक पहुंचने के लिए उन्हें एक घंटे से अधिक समय तक चलना पड़ता है। यह मरीज सांस की तकलीफ की शिकायत तो कर रहा है लेकिन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक जाने को भी तैयार नहीं है। चूंकि वह एक कोविड-19 रोगी को देखने जा रही हैं, इसलिए वह अपने साथ पेरासिटामोल, विटामिन सी और जिंक की खुराक रखने के साथ-साथ यह प्रार्थना भी करती हैं कि रोगी गंभीर न हो क्योंकि उनके पास न तो रक्तचाप की मशीन है और न ही रोगी की हालत का पता लगाने के लिए ऑक्सीमीटर। वह उनसे फॉलोअप के लिए पीएचसी आने का आग्रह करती हैं लेकिन लोग नहीं मानते। 

आदिवासी बहुल क्षेत्र में ग्रामीण स्वास्थ्य बुनियादी ढांचा प्रभावी ढंग से काम करे, यह सुनिश्चित करने के लिए लोगों को यह विश्वास दिलाना जरूरी है कि यह सुरक्षित है। जो लोग कोविड-19 दवाओं के “मौत या बांझपन की दवा” होने के डर से निकलकर इलाज के लिए उप-केंद्र या पीएचसी तक पहुंचते हैं उन्हें अक्सर कर्मचारियों या परीक्षण किट की कमी के कारण सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भेज दिया जाता है। पंचमहल और दाहोद जिलों के आदिवासी इलाकों में 25 साल से काम कर रही कार्यकर्ता नीता कहती हैं, “पीएचसी में कर्मचारियों की भारी कमी है। प्रत्येक टीम को दो से तीन केंद्रों का काम देखना पड़ता है। मरीजों को टेस्ट के लिए दो से तीन दिन तक रुकना पड़ता है और उनके नतीजे आने में तीन दिन और लगते हैं। सीटी स्कैन या ऑक्सीजन सपोर्ट के लिए मरीजों को हमेशा गोधरा या वडोदरा जैसे शहरी केंद्रों में रेफर किया जाता है।”

गोधरा जिले के शहरी केंद्र में, पिछले साल एक स्थानीय ट्रस्ट द्वारा एक कोविड हेल्थकेयर सेंटर शुरू किया गया था, जिसके नोडल अधिकारी अनवर कछवा हैं। इसे इसी साल फरवरी में बंद कर दिया गया था, लेकिन फिर अप्रैल की शुरुआत में इसे सरकार की सहायता से फिर से खोला गया। अप्रैल की शुरुआत और मई के मध्य के बीच के पांच हफ्तों के दौरान अस्पताल में भर्ती होने वाले कोविड-19 रोगियों की ओर से कछवा को प्रति दिन कम से कम 15 कॉल प्राप्त हुए। एक मस्जिद के परिसर में दान के पैसे से बना यह हेल्थकेयर सेंटर इनमें से आधे लोगों को ही भर्ती कर पाने में सफल रहा। कछवा बताते हैं, “15 में से पांच को वेंटिलेटर सपोर्ट की जरूरत थी, जो हमारे पास नहीं था। इसलिए उन्हें  दूसरे सरकारी या निजी अस्पतालों में जाना पड़ा।” कोविड स्वास्थ्य केंद्र की स्थापना करने वाले ट्रस्ट के सचिव जुबेर मामजी कहते हैं कि उन्होंने दो मरीजों को अस्पताल में एक ही बिस्तर पर इलाज कराते देखा है। 

संकट को देखते हुए, जिला कलेक्टर ने गोधरा नर्सिंग स्कूल के एक हिस्से को 20 वेंटिलेटर के साथ 40 बेड की गहन चिकित्सा इकाई (आईसीयू) में बदल दिया। गोधरा सिविल अस्पताल ने भी 15 वेंटिलेटर लगाए। ताजपुरा, हलोल तालुका स्थित नारायण नेत्र अस्पताल में अप्रैल के मध्य तक 15 वेंटिलेटर बेड और एक मेडिकल फैसिलिटी जोड़ी गई। जिले में बुनियादी ऑक्सीजन सपोर्ट युक्त  400 से अधिक कोविड केयर बिस्तर हैं।

हालांकि, ऑक्सीजन की उपलब्धता की अपनी अलग ही कहानी है। कछवा कहते हैं, “हम ऑक्सीजन और मेडिकल स्टाफ की कमी को छोड़कर हर चीज से निपट सकते थे। किसी को आशंका नहीं थी कि चीजें इतनी गंभीर हो जाएंगी।” पंचमहल में इस साल चुनाव जल्दी शुरू हुए। फरवरी में गोधरा नगर पालिका चुनाव, मार्च में ग्राम पंचायत चुनाव और अप्रैल के मध्य में एक आदिवासी क्षेत्र मोरवा हदफ विधानसभा सीट के उपचुनाव हुए थे। गांधीनगर स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ के निदेशक दिलीप मावलंकर कहते हैं, “प्रशिक्षित चिकित्सा कर्मचारियों की कमी इसलिए है क्योंकि नियुक्तियां 11 महीने के अनुबंध पर की जाती हैं। यह सरकारी नौकरियों को कम आकर्षक और प्रक्रिया को बोझिल बनाता है। हमें तत्काल एक समर्पित पूर्णकालिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता कैडर की आवश्यकता है।”

भुखमरी के चंगुल में 

अर्थव्यवस्था में मंदी ने शहरी क्षेत्रों में विकास को रोक दिया है, लेकिन कुछ ग्रामीण परिवार पहले से ही भुखमरी का सामना कर रहे हैं। इस क्षेत्र के अधिकांश लोग निर्माण मजदूरों के रूप में काम करने के लिए शहरों की ओर पलायन करते हैं। मई की शुरुआत में तालाबंदी के बाद, वे लौट आए हैं और महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत मजदूरी की मांग कर रहे हैं। 

पिछले साल, मनरेगा ने तालाबंदी के दौरान अनौपचारिक कार्यबल की रोजी रोटी का प्रबंध किया। इस वर्ष, वित्तीय वर्ष के रोलओवर और हर साल जॉब कार्ड के नवीनीकरण की आवश्यकता वाले सरकारी कानून के कारण, कई जरूरतमंद परिवार मनरेगा कार्यों के लिए आवेदन करने में असमर्थ हैं। मजदूरी का भुगतान भी समय पर नहीं हो रहा है। गैर-लाभकारी संस्था आनंदी, जो खाद्य सुरक्षा और महिलाओं के स्वास्थ्य के मुद्दों पर काम करती है, के लिए काम करने वाली नीता  हार्दिकर कहती हैं कि घोघंबा और शाहेरा तालुका के लगभग 35 प्रतिशत घरों में भुखमरी की समस्या मौजूद है।

उदयपुर स्थित एक गैर-लाभकारी संस्था सेंटर फॉर लेबर रिसर्च एंड एक्शन ने हाल ही में गुजरात और राजस्थान के आठ जिलों का एक अध्ययन किया, जिसमें महिसागर और दाहोद जिले शामिल हैं। ये जिले पंचमहल से सटे हैं इनकी सामाजिक-आर्थिक स्थितियां समान हैं। यह पाया गया है कि इस क्षेत्र के 58 प्रतिशत परिवार भोजन की कमी से पीड़ित हैं। परियोजना निदेशक सुधीर कटियार कहते हैं,“हम अभी भी पंचमहल और आसपास के क्षेत्रों में असामान्य रूप से अधिक मौतों के कारणों की जांच कर रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि अहमदाबाद में कार्यरत निर्माण मजदूर बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। राशन कार्डों की अंतर-राज्यीय पोर्टेबिलिटी भी काम नहीं कर रही है।”

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