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असम बाढ़: क्यों सरकार पर भरोसा नहीं करते आपदा पीड़ित

इस वक्त असम के 17 जिले बाढ़ से लबालब हैं, जिससे लगभग 7 लाख लोग सीधे प्रभावित हुए हैं

By Ramesh Sharma

On: Friday 10 July 2020
 
साभार: विक्रम नायक, एकता परिषद
साभार: विक्रम नायक, एकता परिषद साभार: विक्रम नायक, एकता परिषद

राष्ट्रीय बाढ़ आयोग और असम सरकार की रिपोर्ट (2018) के अनुसार कुल भौगौलिक क्षेत्र 78.52 लाख हेक्टेयर में से 31.05 लाख हेक्टेयर अर्थात लगभग 40 फीसदी  क्षेत्रफल सालाना बाढ़ से प्रभावित होता रहा है। भारत में बाढ़ से प्रभावित क्षेत्र का लगभग 10 फीसदी इलाका अकेले असम राज्य में है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि विगत 6 दशकों में लगभग 4.27 लाख हेक्टेयर भूमि अर्थात असम के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 7.4 फ़ीसदी क्षेत्रफल अब तक बाढ़ और भूमि कटाव से समाप्त हो चुका है।

सरकारी रिपोर्ट अक्सर बाढ़ और भूमि कटाव के कारण लोगों के आजीविका पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर मौन रहती हैं, लेकिन वो लाखों लोग, हर बरस जिनका घर-बार उजड़ता है मौन नहीं हैं। वास्तव में मौन हो चुके उनके सवालों के जवाब हमेशा से मौजूं हैं- उन तमाम रिपोर्टों में जो दशकों से और हरेक बरस भारत सरकार और राज्य सरकार को दिए तो गये किंतु उनके क्रियान्वयन का आवश्यक अध्याय आधा-अधूरा ही रह गया।

असम आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (2020) के अनुसार इस वक्त असम के 17 जिले बाढ़ से लबालब हैं, जिससे लगभग 7 लाख लोग सीधे प्रभावित हुए हैं। ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियां जैसे जिया भराली गाय और कोपीली आदि खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं। प्राधिकरण के अनुसार इस वर्ष बाढ़ से 21 जिलों के 135 तटबंध क्षत्रिग्रस्त हो चुके हैं। इन सभी जगहों में लोगों को तत्काल सहायता की जरूरत हैं, लेकिन बाढ़ और भूमि कटाव से प्रभावित अधिकांश लोगों का मानना है कि बरसों से जारी, राहत सामग्री के सरकारी उत्सव से अब आगे जाना जरूरी है, ताकि उन संभावित समाधानों का क्रियान्वयन किया जा सके, जो सरकारी वायदों और कायदों के बाद भी भुला दिए गए।

जोरहाट जिले के जाजीमुख क्षेत्र के निपुन कलिता कहते हैं कि देखते-देखते मेरा गांव 3 बार उजड़ चुका है। केवल 28 बरस पहले जहां मेरा गांव था, वहां अब ब्रह्मपुत्र नदी है। फिर हम सब  बाढ़ और मिट्टी कटाव की आशंका में 1992 में एक नई जगह जा कर बसे। शुरू मे ऐसा लगा कि हमारी खेती की जमीन जरूर बाढ़ में समा गयी, लेकिन जान तो बची।  लेकिन 2004 के बाढ़ ने एक बार फिर पूरे गांव को 1 किलोमीटर पीछे हटने के लिए बाध्य कर दिया। आज पूरा गांव, तटबंध (बाढ़ रोकने के लिये ऊंचा बनाया गया मिट्टी की ऊंची मेड़) के इर्द-गिर्द बसा हुआ है। इस भय और उम्मीद के साथ कि यदि बाढ़ और नदी के कटाव की आशंका हुई तो यह तटबंध तो साथ देगी ही।

भारत सरकार की रिपोर्ट कहती है कि असम के विभिन्न जिलों में बने हुए ये अधिकांश तटबंध पुराने हो चुके हैं। बरसों से देख-रेख के अभाव में टूट-फूट भी हुई है। असम विधानसभा की रिपोर्ट (1998) के अनुसार तटबंधों  की कुल लंबाई लगभग 4448 किलोमीटर है, किन्तु लोग कहते हैं कि बमुश्किल यह आधे-अधूरे और कागजों में ही प्रभावी रह गए हैं। 

इनके देख-रेख के लिए बनाया गया भूमि संरक्षण विभाग का कुल बजट, रख-रखाव के लिए न केवल नाकाफी है, बल्कि इसका अधिकांश हिस्सा संबंधित प्रशासनिक मदों में खर्च किया जाता रहा है। 18 जुलाई 2017 को असम सरकार की ओर से भारत सरकार को एक विस्तृत योजना सौंपी गयी, जिसका मकसद 40,000 करोड़ रुपए की लागत से ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों के किनारे लगभग 5000 किलोमीटर लंबे 'तटबंध सह सड़क' (रोड कम एम्बैंकमेंट) का निर्माण था। जमीनी आंकलन कहते हैं कि इस योजना की कछुआ गति पूरे होते होते मालूम नहीं कितने किलोमीटर के तटबंध, आने वाले बाढ़ में बह जाएंगे।

तिनसुकिया की रुक्मणि डेका कहती है बाढ़ हमारे लिये अब आपदा कम - सरकार के लिये अवसर अधिक साबित हुआ है। बाढ़ आते ही राहत के नाम पर समाज हाथ पसारे खड़ा हो जाता है और सरकारें अनाज और अन्य सामग्री के वितरण के रस्मो-रिवाज में व्यस्त हो जाती है। अनेक वायदे किये जाते हैं। हवाई सर्वेक्षण होते हैं। सरकारी महकमे उठ खड़े होते हैं। आपदा राहत की रस्म अदायगी कुछ दिनों तक जारी रहती है और फिर शनैः शनैः बाढ़ के उतरते पानी की तरह वो तमाम सरकारी कवायदें समाप्त घोषित कर दी जाती हैं। बरस दर बरस बस यही रस्मो-अदायगी जारी है।

धेमाजी के बिष्णु भुइयां की लगभग 10 बीघा जमीन ब्रम्हपुत्र की सहायक गाय नदी के बाढ़ में समा गयी। बिष्णु याद करते हैं कि 2004 की बाढ़ में जब उसकी जमीन नदी में समा गई, तब तत्कालीन सरकार ने उसे और अन्य लोगों को एकसोनिया पट्टा (असम सरकार द्वारा वंचित भूमिहीन परिवार को दिया गया एक वर्ष के लिए अस्थायी जमीन और उसका पट्टा) दिया गया। आज 16 बरस से हम सब इंतजार कर रहे हैं कि कब सरकार हमे मियादी जमीन देगी? लखीमपुर के थानसिंह और गोआलपाड़ा के वसीम खान भी विगत 2 दशकों से एकसोनिया पट्टा के भरोसे जिंदा हैं, कि कभी न कभी तो असम सरकार इसे मियादी (लगान) पट्टे में बदलेगी और फिर वो अपनी जमीन के मालिक होंगे।

बहरहाल असम सरकार भूल जाना चाहती है कि एकसोनिया पट्टा को मियादी अथवा स्वामित्व वाली जमीन में बदलना उनकी प्रशासनिक जवाबदेही है। असम भू राजस्व संहिता के अनुसार भूमि प्रबंधन समिति ऐसे समस्त मामलों का निष्पादन करते हुए संबंधित लोगों को मियादी पट्टा देने के लिये वैधानिक रूप से जवाबदेह है।

वर्ष 2016 में तत्कालीन असम सरकार ने एकता परिषद और अन्य संगठनों के सुझावों का स्वागत करते हुये 'मुख्यमंत्री विशेष योजना' घोषित किया। इस योजना के अनुसार बाढ़ और भूमि कटाव से प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और पुनर्स्थापन के लिए आवास और कृषि भूमि आबंटन के प्रावधान सुनिश्चित किए गए थे। बाद में इस योजना में कुछ नकारात्मक संशोधन भी किए गए, किंतु फिर भी यह योजना - वसीम खान, थानसिंह, बिष्णु भुइयां, रुक्मिणी डेका और निपुन कलिता सहित लगभग 20 लाख प्रभावित परिवारों की जिंदगी में एक बड़ा परिवर्तन ला सकती थी, लेकिन सरकारें बदलने के साथ योजनाओं को भी बदल देने की परिपाटी नें इस संभावनाशील प्रावधान को समाप्त कर दिया।

पर्यावरणविद और वैज्ञानिक मानते हैं कि असम में बाढ़ और भूमि कटाव अभी दशकों जारी रहने वाला प्राकृतिक प्रकोप है।  जिसका मूल कारण भू-भौतिकी और इकोसिस्टम में जारी छेड़छाड़ है। इस त्रासदी को कम करने के लिये जिन बड़े कदमों की जरूरत है, उनमें से ही एक है - प्रभावित परिवारों को नई जमीनों का आबंटन ताकि खेती और रोजगार के अवसर बने रहें। वास्तव में इस आपदा में अनेक लोगों की उम्मीदें भी यही है। लेकिन भूमि कटाव से प्रभावित लोगों को भूमि आबंटन के लिये अब तक कोई ठोस सरकारी पहल हुई ही नहीं है।

असम की सदियों पुरानी संस्कृति में बाढ़ पर कई लोकगीत हैं। इन अधिकांश लोकगीतों में संयोगवश महाबली ब्रह्मपुत्र से प्रार्थना है कि वो लोगों को और उनकी अन्नदा भूमि को बचा ले। यह महज संयोग नहीं है कि इन लोकगीतों में सरकार का कहीं कोई जिक्र ही नहीं। कदाचित लोगों को मालूम है कि वो सरकार के कारण नहीं, बल्कि सरकार के बिना ही जिंदा हैं, और रहना होगा। लोग, बाढ़ को ईश्वर का वरदान भी मानते हैं, इसलिये उसके तमाम अच्छे-बुरे परिणाम अब सदियों से उनकी जिंदगी का ही अनिवार्य पक्ष है। सरकार का आधा-अधूरा प्रयास तो अब तक उन लाखों लोगों के लिये अप्रासंगिक ही है, जिन्होंने अपनी जमीन और अपनी जड़ें बाढ़ में हमेशा के लिए गवां दी।

(लेखक एकता परिषद के राष्ट्रीय समन्वयक हैं)