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पर्यावरण मुकदमों की साप्ताहिक डायरी: 7 से 11 सितंबर 2020

देश के विभिन्न अदालतों में विचाराधीन पर्यावरण से संबंधित मामलों में बीते सप्ताह क्या कुछ हुआ, यहां पढ़ें –

By Susan Chacko, Dayanidhi, Lalit Maurya

On: Sunday 13 September 2020
 

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल और सोनम फेंटसो वांग्दी की दो सदस्यीय पीठ ने 9 सितंबर, 2020 को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) को पर्यावरण के हित में, तीन महीने के अंदर, सिगरेट / बीड़ी बट्स के निपटान के लिए दिशानिर्देश जारी करने के निर्देश दिए।

23 सितंबर, 2015 को सार्वजनिक स्थानों पर तंबाकू के सेवन पर प्रतिबंध लगाने के अलावा, सिगरेट और बीड़ी बट्स के निपटान के प्रत्यक्ष नियमन के लिए एक याचिका दायर की गई थी।

केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय,  स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय, सीपीसीबी, तंबाकू बोर्ड और अन्य प्रतिवादियों को 28 सितंबर, 2015 को नोटिस जारी किया गया था।

केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की प्रतिक्रिया में सिगरेट और बीड़ी बट्स खतरनाक के रूप में सूचीबद्ध नहीं थे। सेलूलोज़ एसीटेट, जो सेलूलोज़ को एसिटिक एसिड एस्टर में परिवर्तित करके तैयार किया जाता है, अनिवार्य रूप से एक बायोडिग्रेडेबल पदार्थ है। हालांकि, सेलूलोज़ एसीटेट का उपयोग करना ठीक नहीं है।

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टॉक्सिकोलॉजी रिसर्च (आईआईटीआर) ने 9 जुलाई, 2020 को "सिगरेट और बीड़ी के बट्स जहरीले कचरे की श्रेणी में आते हैं या नहीं" इस पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत की है।

आईआईटीआर रिपोर्ट में कहा गया है कि सिगरेट / बीड़ी बट्स के विश्लेषण से पता चलता है कि विभिन्न मापदंडों की एकाग्रता के अनुसार - वे निर्धारित सीमा से कम हैं और मनुष्यों और पर्यावरण के लिए विषाक्त नहीं होंगे। हालांकि, सेलूलोज़ एसीटेट सिगरेट / बीड़ी बट्स का एक प्रमुख घटक है और इसके क्षरण के अध्ययन से पता चलता है कि यह लंबी अवधि तक बना रह सकता है।


जैसलमेर में बन रहे 1,500 मेगा वाट के सोलर एनर्जी पार्क पर राजस्थान हाई कोर्ट ने लगाई अस्थायी रोक

राजस्थान उच्च न्यायालय ने मंगलवार को 1,500 मेगा वाट के सोलर एनर्जी पार्क पर अस्थायी तौर पर रोक लगा दी है| यह सोलर पार्क जैसलमेर में पोखरण के पास बन रहा था| जिसे राज्य सरकार अदानी समूह के साथ मिलकर बना रही थी|

हालांकि उच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगा दी है पर इसके साथ ही उसने राजस्थान सरकार को भी अपनी बात रखने के लिए कहा है| इस मामले में स्थानीय किसानों ने याचिका दायर कर कोर्ट से लगभग 990 हेक्टेयर कृषि भूमि के आवंटन को रोकने की बात कही थी| जिसे निजी व्यावसायिक घराने को इस प्रोजेक्ट के लिए दिया जाना था|

इस मामले में अगली सुनवाई 29 सितंबर को होगी|


चार धाम राजमार्ग परियोजना से वन क्षेत्र को हुए नुकसान की भरपाई करे सरकार: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वो उत्तराखंड में चार धाम राजमार्ग परियोजना निर्माण के कारण वन क्षेत्र को जो नुकसान हो रहा है, उसकी भरपाई के लिए वृक्षारोपण करे| यह जानकारी मीडिया में छपी रिपोर्टों में सामने आई है।

यह हाईवे 2016 में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किए गए राजमार्ग परियोजना का हिस्सा है| जिसमें 889 किलोमीटर से अधिक लम्बाई राष्ट्रीय राजमार्गों में सुधार किया जाना है| यह राजमार्ग यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ को जोड़ते हैं|

गौरतलब है कि इस परियोजना के पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को समझने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2019 में एक उच्चस्तरीय समिति का भी गठन किया था|


आयल रिफाइनरियों द्वारा बचे हुए कैटेलिस्ट के गैर वैज्ञानिक तरीके से निपटान के मामले में सीपीसीबी ने प्रस्तुत की रिपोर्ट

सीपीसीबी ने वेस्ट कैटेलिस्ट के निपटान के मामले में एनजीटी के सामने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी है| यह रिपोर्ट 8 सितंबर 2020 को कोर्ट के सामने रखी गई है| गौरतलब है कि आयल रिफाइनरियों में जो कैटेलिस्ट इस्तेमाल किया जाता है उसमें निकल, कैडमियम, जस्ता, तांबा, आर्सेनिक, वैनेडियम और कोबाल्ट होते हैं। जिस कारण वो एक हानिकारक वेस्ट कहलाता है|

इस बचे हुए कैटेलिस्ट को 2016 के हानिकारक अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016 की अनुसूची IV के अंतर्गत हानिकारक कचरे के रूप में वर्गीकृत किया गया है


एनजीटी ने टीएनपीसीबी को मरीना समुद्र तट तक पहुंचने वाले प्रदूषण के स्रोतों पर सख्ती से निगरानी करने का दिया निर्देश

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने तमिलनाडु राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (टीएनपीसीबी) और संबंधित अधिकारियों के साथ मिलकर चेन्नई के मरीना समुद्र तट तक पहुंचने वाले प्रदूषण के स्रोतों पर सख्ती से निगरानी करने का निर्देश दिया है। जिसमें सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स (एसटीपी) और कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट्स (सीईटीपी) से सीवेज और अन्य अपशिष्टों को छोड़ा जाना शामिल है।

यह आदेश संयुक्त समिति की रिपोर्ट के आधार पर है। जिसमें कहा गया था कि चेन्नई के मरीना बीच में भारी मात्रा में झाग (फोम) इकट्ठा हो रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार मरीना समुद्र तट पर झाग (फोम) के इकट्ठा होने के लिए निम्नलिखित कारण हो सकते हैं:

भारी बारिश के कारण नदी का प्रवाह बढ़ गया होगा, जिसके कारण तल पर जमा मलबे के तेजी से पानी के साथ मिलकर मिश्रण बना गया, जिसके कारण झाग इकट्ठा हो गई। समुद्री घटना के भयावह होने का एक अन्य कारण अड्यार नदी जो समुद्र में मिलती है, नदी के तलछट में (कार्बनिक युक्त पदार्थ) हो सकते हैं। चेन्नई रिवर रेस्टोरेशन ट्रस्ट (सीआरआरटी) द्वारा किया गया डिसिल्टिंग समुद्र तक पहुंच गया होगा।

विश्लेषण रिपोर्ट में झाग बनने और सामान्य दिन के पानी की गुणवत्ता में अंतर दिखाई दिया, जो बारिश के पानी और सीवेज के मिश्रण का संकेत देती है।  चेन्नई मेट्रो जल आपूर्ति एवं सीवरेज बोर्ड (सीएमडब्ल्यूएसएसबी) में समुद्री झाग की घटना की तारीख से पहले वर्षा के दौरान हो सकता है कि नदी अडयार में संचालित नेसापक्कम में स्थित क्षमता 23 एमएलडी, 54 एमएलडी विस्तार 1 और 40 एमएलडी विस्तार - 2 के कॉमन सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स (सीएसटीपी) से अनुपचारित / आंशिक रूप से उपचार किए गए सीवेज को मिला दिया गया हो।

टीएनपीसीबी नेसापक्कम में सीईटीपी की निगरानी करेगा ताकि अड्यार नदी के संगम पर समुद्री झाग के फिर से बनने से बचा जा सके। इसके अलावा, सीईटीपी पर स्थापित फ्लो मीटर प्रभावी निगरानी के लिए टीएनपीसीबी ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम से जुड़ा होना चाहिए।


दिल्ली हाई कोर्ट ने कोविड-19 की जांच के लिए जारी किया नया निर्देश

दिल्ली हाई कोर्ट ने 8 सितंबर, 2020 को कोविड-19 की जांच के लिए एक नया निर्देश जारी किया है| इस निर्देश के अनुसार दिल्ली के किसी भी निवासी को जिसे कोरोनावायरस का पता लगाने के लिए रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन पोलीमरेज़ चेन रिएक्शन (आरटी-पीसीआर) जांच अपने खर्च पर करवानी है, उसे इसके लिए किसी डॉक्टर द्वारा दिया नुस्खा प्रस्तुत करना जरुरी है|

इसके लिए उस व्यक्ति को भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद द्वारा जारी फॉर्म को भरना होगा| साथ ही वह दिल्ली का नागरिक है इस बात को प्रमाणित करने के लिए अपना आधार कार्ड भी दिखाना होगा| इसके साथ ही दिल्ली हाई कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि जांच के लिए दिल्ली के हर जिले में चार वैन उपलब्ध होनी चाहिए| इन वैनों को उपयुक्त स्थानों या फिर प्रमुख डीएमआरसी टर्मिनलों के पास होना चाहिए|

दिल्ली सरकार द्वारा मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज के सहयोग से सितंबर माह में सीरो सर्विलैंस-3 आयोजित किया गया था। सीरो सर्विलैंस-3 के परिणाम आज भी आपस में मेल नहीं खा रहे थे| जिसे दिल्ली सरकार द्वारा कोर्ट के सामने प्रस्तुत की जाने वाली स्थिति रिपोर्ट के साथ रिकॉर्ड के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए| जिससे परिक्षण की ताजा स्थिति का पता चल सके|