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बड़ी खोज: प्रदूषण से होने वाली लाखों मौतों को रोका जा सकता है!

एक नए अध्ययन में दावा किया गया है कि जीवाश्म ईंधन उत्सर्जन को लगातार कम करने से आने वाले वर्षों में, असमय होने वाली लाखों मौतों को रोका जा सकता है, भारत में एक साल में हो रही हैं 12 लाख मौतें 

By Dayanidhi

On: Thursday 19 September 2019
 
File Photo: Prashant Ravi
File Photo: Prashant Ravi File Photo: Prashant Ravi

जीवाश्म ईंधन उत्सर्जन को लगातार कम करने से आने वाले वर्षों में, असमय होने वाली लाखों मौतों को रोका जा सकता है। इस बारे में ड्यूक और लीड्स विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के द्वारा नया विश्लेषण किया गया है।

ड्यूक निकोलस प्रोफेसर ऑफ़ एअर्थ साइंस एट ड्यूक निकोलस स्कूल ऑफ़ द एनवायरनमेंट के पृथ्वी विज्ञान के प्रोफेसर ड्रू शिंडल ने कहा, हमने दुनिया भर में जीवाश्म ईंधन से स्वच्छ ऊर्जा में बहुत तेजी से बदलते अलग-अलग समय के 42 परिदृश्यों का विश्लेषण किया है। इन सभी परिदृश्यों के तहत तापमान में किसी तरह की वृद्धि नहीं देखी गई, न कोई जलवायु प्रभाव था, और चरण की शुरुआत से लेकर अंत तक के इन दो दशकों में तापमान (वार्मिंग) की दरों में कमी देखी गई। यह अध्ययन नेचर पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।

शिंडल ने कहा कि ऊर्जा को स्वच्छ बनाने में कई दशक लगेंगे, लेकिन वास्तविक दुनिया में ऐसा होना आसान नहीं है। हाल के वर्षों में जलवायु वार्ताओं को इस नजरिए से देखा गया है कि जीवाश्म-ईंधन द्वारा उत्पन्न वायु प्रदूषण को तेजी से साफ करने से अनायास ही वायुमंडलीय तापमान में लगभग आधे डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होगी। जिसे कम अथवा पहले जैसा करने में एक सदी लग सकती है। अर्थात सन-ऑब्स्क्योरिंग एरोसोल जीवाश्म ईंधन की खपत के उत्सर्जन को वातावरण में फैलाती है, और यह अपेक्षाकृत जल्दी से साफ भी हो जाती है, लेकिन लंबे समय तक रहने वाली ग्रीनहाउस गैसें जैसे कार्बन डाइऑक्साइड गैस वातावरण बनी रहेंगी, जो तापमान को बढ़ाएगी।

स्मिथ ने कहा, जीवाश्म-ईंधन के बदले स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग करके हम हवा को साफ करते हैं, जिससे वातावरण ठंडा हो जाए। लेकिन हमें ग्रीनहाउस गैसों को वातावरण में उत्सर्जित करने की दर को भी कम करना होगा, ताकि भविष्य में तापमान को कम किया जा सके। उन्होंने कहा कि ये प्रभाव लगभग संतुलित हो जाएंगे, मौजूदा उत्सर्जन दर पर भी निकट-अवधि के तापमान के स्तर में वृद्धि काफी कम होगी।

शिंडल ने कहा, यह खोज लोगों के स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छी है, क्योंकि एयरोसोल पार्टिकुलेट अत्यधिक जहरीले होते हैं और इनकी वजह से हर साल लाखों लोगों की अकाल मृत्यु हो जाती है। इसलिए उत्सर्जन को कम करने और जलवायु परिवर्तन को धीमा करने के इस कदम से हम लाखों लोगों की जान बचा सकते है। शिंडल ने कहा, हम जानते हैं कि जीवाश्म ईंधन को जलाने के साथ जुड़े जोखिम बहुत अधिक हैं। यह काम क्या दर्शाता है, कि क्या यह सोचना गलत है कि स्वच्छ ऊर्जा में परिवर्तन के बड़े पर्यावरणीय जोखिम भी हो सकते हैं। यह जलवायु परिवर्तन को कम करने के साथ ही सार्वजनिक स्वास्थ्य को भी भारी लाभ पहुंचाता है।

स्मिथ ने जोर देकर कहा कि इस शोध ने इस भ्रांति को दूर किया है कि जीवाश्म ईंधन के स्वच्छ ऊर्जा में बदलने के वायु-गुणवत्ता और जलवायु लाभ अलग-अलग समय पर होते हैं। वायु प्रदूषण में कमी से जलवायु परिवर्तन कम नहीं होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग की निदेशक मारिया नीरा ने कहा, कि स्पष्ट रूप से यह देखना महत्वपूर्ण है कि जीवाश्म ईंधन के स्वच्छ ऊर्जा में बदलाव होने से पर्यावरणीय व्यापार प्रभावित नहीं होता, बल्कि जलवायु परिवर्तन से निपटने और वायु की गुणवत्ता में सुधार दोनों के लिए लाभ होता है।

भारत में हुई 12 लाख मौतें 

वायु प्रदूषण के मामले में भारत का परिदृश्य देखा जाए तो, हाल में हेल्थ इफेक्ट्स इंस्टीट्यूट (एचईआई) द्वारा प्रकाशित ग्लोबल एयर 2019 में बताया गया है कि सन 2017 में भारत में आउटडोर और इनडोर वायु प्रदूषण के कारण 12 लाख से अधिक मौतें हुई।