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पर्यावरण मुकदमों की साप्ताहिक डायरी: 29 जून से 3 जुलाई 2020 तक के खास मामले

डाउन टू अर्थ की खास पेशकश: जानें, सुप्रीम कोर्ट, विभिन्न हाई कोर्ट और एनजीटी में पर्यावरण सम्बन्धी मामलों में क्या कुछ हुआ इस सप्ताह

By Susan Chacko, Lalit Maurya, Dayanidhi

On: Saturday 04 July 2020
 

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने 29 जून, 2020 को निर्देश दिया है कि रिवालसर झील को बचाने के लिए अधिकारियों द्वारा निरंतर प्रयास किए जाएं| यह झील हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में स्थित है|

मंडी के जिला मजिस्ट्रेट ने एक रिपोर्ट के माध्यम से एनजीटी को सूचित किया है कि झील के आसपास के क्षेत्र को नगर पंचायत, रिवालसर द्वारा हर रोज साफ किया जाता है। साथ ही कचरे को झील में जाने से रोकने के लिए झील के चारों और नालियों का भी निर्माण किया गया है। जिनको नियमित रूप से साफ किया जाता है।

रिवालसर में होटल और घरों के अपने सेप्टिक टैंक हैं। गौरतलब है कि कस्बे के लिए 1.5 करोड़ रुपये की एक नई सीवरेज नेटवर्क योजना को स्वीकृत दी गई थी और वर्तमान में सिंचाई और जन स्वास्थ्य विभाग द्वारा इसका निर्माण किया जा रहा है। 


महुल और अंबापाड़ा में वीओसी के आकलन पर एनजीटी ने मांगी रिपोर्ट

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने 30 जून, 2020 को एक आदेश जारी कर महुल और अंबापाड़ा में हो रहे वायु प्रदूषण पर सीपीसीबी से रिपोर्ट तलब की है| अपने इस आदेश में एनजीटी ने सीपीसीबी से पूछा है कि वो महाराष्ट्र के महुल और अंबापाड़ा वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (वीओसी) की मात्रा का आंकलन किस तरह कर रहे हैं| यह मामला मुंबई के बाहरी इलाकों में अंबापाड़ा और माहुल के आसपास हो रहे प्रदूषण और उसके नियंत्रण के लिए उठाए जा रहे क़दमों से जुड़ा है|

गौरतलब है कि इस क्षेत्र में वायु प्रदूषण के लिए मुख्य रूप से लॉजिस्टिक सर्विसेज, तेल, गैस और रासायनिक वस्तुओं के भंडारण के साथ-साथ तेल कंपनियों द्वारा किया जा रहा उत्सर्जन जिम्मेवार है| इस इलाके में खतरनाक रसायनों की लोडिंग, भंडारण और अनलोडिंग के कारण वीओसी के साथ-साथ अन्य प्रदूषकों का उत्सर्जन हो रहा है।

इस मामले में इससे पहले सीपीसीबी ने 18 मार्च, 2020 को एक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। जिसमें प्रदूषण के कारण पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य को होने वाले नुकसान का मूल्यांकन किया गया था। साथ ही इसमें उस अनुपात के बारे में भी लिखा था जिस हिसाब से प्रदूषण फैला रही इकाइयों से जुर्माना वसूलना है। इस मामले में आवेदकों ने 1.5 करोड़ रूपए का हर्जाना मांगा था|

इस रिपोर्ट पर भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड और एजिस लॉजिस्टिक्स लिमिटेड ने कड़ी आपत्ति जताई थी । उनके अनुसार सीपीसीबी ने रिपोर्ट में जो उत्सर्जित वीओसी की मात्रा दिखाई है, वो सही नहीं है। साथ ही उन्होंने इस बात की मांग की थी कि सीपीसीबी ने किस तरह वीओसी की मात्रा का आकलन किया है उसके आधार का खुलासा करे। 


महेंद्रगढ़ में अवैध खनन का मामला

हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को अपनी रिपोर्ट सौंपी है, जिसमें बताया गया कि महेंद्रगढ़ के गढ़ी गांव में कोई खनन नहीं हो रहा है और हरियाणा माइनिंग कंपनी का संचालन बंद है। बोर्ड की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इस मामले की जांच के लिए गठित संयुक्त समिति ने 16 जून को साइट का निरीक्षण किया था।

एनजीटी में शिकायत की गई थी कि मेसर्स हरियाणा माइनिंग कंपनी, खसरा नंबर 122, पहाड़ गढ़ी, ग्राम गढ़ी, तहसील नारनौल, जिला महेन्द्रगढ़ के द्वारा अवैध खनन किया जा रहा है और भारतीय वन अधिनियम 1927, वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम 1981, जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम 1974 और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 का उल्लंघन किया जा रहा है। इस  शिकायत के आधार पर 6 मार्च को एनजीटी) ने आदेश दिए थे कि इस मामले की जांच की जाए।

नारनौल के खनन अधिकारी ने बताया कि हरियाणा खनन कंपनी की लीज को 10 जनवरी, 2020 को आवंटित क्षेत्र से बाहर अवैध खनन और रॉयल्टी न देने के कारण निरस्त कर दिया गया था। इसलिए लीज का अनुबंध करते समय सुरक्षा के रूप में जमा की गई राशि रु. 2,47,65,625 जब्त कर लिए गए हैं।

वन विभाग ने यह भी बताया कि उक्त लीज धारक ने खसरा नंबर 122, ग्राम गढ़ी, ने 18 जून, 2016 को अवैध खनन गतिविधियों को अंजाम देने के दौरान 597 पेड़-पौधों को नष्ट कर दिया था। विभाग द्वारा माइनिंग कंपनी के खिलाफ नुकसान करने की रिपोर्ट जारी की है और विशेष पर्यावरण न्यायालय, फरीदाबाद में कार्रवाई की गई।

इसके अलावा, 22 अप्रैल, 2019 के आदेश में अदालत ने कंपनी को मुआवजे के रूप में रु. 1,21,788 की राशि को अदालत में भुगतान करने को कहा था। रिपोर्ट में कहा गया है कि कंपनी को, हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने जल अधिनियम 1974 और वायु अधिनियम 1981 के प्रावधानों के तहत सहमति की शर्तों का पालन न करने के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था।


एनटीसीए ने जानवरों को सड़क हादसों से बचाने के लिए जारी की कार्य योजना

राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) ने अपनी संशोधित कार्य योजना प्रस्तुत की है| जो तीन वर्षों की अवधि के लिए है| इस योजना का उद्देश्य महाराष्ट्र में पर्यावरण और वन्य जीवन को बचाना है| इस योजना के अंतर्गत महाराष्ट्र में टाइगर कॉरिडोर के रास्तों पर उन सभी उपायों को करना है जिससे जानवरों को सड़क हादसों से बचाया जा सके| इसपर एनटीसीए और पर्यावरण मंत्रालय ने एक संयुक्त रिपोर्ट प्रस्तुत की है| जिसमें वन्य जीवो को बचाने के लिए संरचनात्मक और गैर-संरचनात्मक उपायों को किया जाना है| जिसके अंतर्गत यातायात के लिए नियम बनाना, वाहनों की गति को कम करने के उपाय करना, साइनबोर्ड के माध्यम से जानवरों की उपस्थिति को बताना, सड़क के उन हिस्सों की निगरानी करना जहां हादसे होने की सम्भावना ज्यादा है| इसके साथ ही रास्तों का उचित प्रबंधन करना शामिल है| इस रिपोर्ट को 3 जुलाई 2020 को एनजीटी की वेबसाइट पर अपलोड किया गया है। गौरतलब है कि टाइम्स ऑफ़ इंडिया में विजय पिनारकर ने एक न्यूज़ डाली थी, जिसमें जिक्र किया गया था कि महाराष्ट्र में जो नई सड़क परियोजना शुरू की जा रही है वो टाइगर कॉरिडोर को बीच में से काट देगी| इसी को आधार बनाकर एनजीटी में एक अर्जी दाखिल की गई थी| जिस पर जवाब मांगा गया था| जिसमें कहा गया था कि राज्य और सड़क परिवहन मंत्रालय द्वारा शुरू की गई नई सड़क परियोजनाओं के चलते टाइगर कॉरिडोर्स में रूकावट पैदा हो सकती है|