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95 फीसदी ब्रह्मांड को हम नहीं जानते लेकिन क्यों?

आधुनिक खगोलविज्ञान की सबसे बड़ी खोज यह थी कि कि ब्रह्मांड का विस्तार हो रहा है। इस व्याख्या ने उस पुराने विचार को तोड़ दिया जिसमें कहा गया था कि ब्रह्मांड स्थिर है।

By Vivek Mishra, Akshit Sangomla

On: Saturday 02 May 2020
 
Photo: scitechdaily
Photo: scitechdaily Photo: scitechdaily

आधुनिक खगोलशास्त्र में सबसे अहम खोज 1930 में हुई थी। अमेरिकी खगोलविद एडविन हबल ने पहली बार वैज्ञानिक व्याख्या के साथ यह बताया था कि ब्रह्मांड का विस्तार हो रहा है। उन्होंने अपने पर्यवेक्षण में यह पाया कि हमसे काफी दूर आकाशगंगाएं समय के साथ गतिशील हैं। इस व्याख्या ने उस पुराने विचार को तोड़ दिया जिसमें कहा गया था कि ब्रह्मांड स्थिर है।

मुंबई स्थित होमी भाभा राष्ट्रीय संस्थान अनुबंधक प्राध्यापक आभास मित्रा ने कहा, “ब्रह्मांड विस्तार की गणितीय संरचना पहली बार रूस के वैज्ञानिक एलेक्जेंडर फ्रीडमैन ने 1924 में दी थी।” वहीं, ब्रह्मांड के विस्तार संबंधी नियम का विचार सूत्र पहली बार 1927 में बेल्जियन कैथलिक पादरी जॉर्ज लैमत्रे ने किया था। इसीलिए ब्रह्मांड संबंधी नियम को हबल और लैमत्रे के नाम से जाना जाता है।

लैमत्रे ने यह महसूस किया था कि ब्रह्मांड सिर्फ वर्तमान युग में ही नहीं विस्तारित हो रहा है बल्कि इसका विस्तार हमेशा से हुआ था। ऐसे में ब्रह्मांड का जन्म एक प्रचलित परमाणु अथवा एक ब्रह्मांडीय अंडे के विस्फोट से हुआ और जिसके कारण आकाशगंगाओं और तारों का उदय हुआ होगा। उन्होंने बताया कि इस सोच के बाद ही लैमत्रे ब्रह्मांड के प्रारंभ के नतीजे पर पहुंचे, जिसे हम आज महाविस्फोट (बिग-बैंग) सिद्धांत के नाम से जानते हैं। बिग-बैंग नाम का पहली बार इस्तेमाल ब्रिटेन के भौतिकविद फ्रेड होयल ने किया था।

1949 में एक रेडियो कार्यक्रम के दौरान फ्रेड ने इस नाम का इस्तेमाल तिरस्कार के भाव से किया था। वह इस सिद्धांत से सहमत नहीं थे। बहरहाल भौतिकविदों ने बिग-बैंग सिद्धांत का निर्माण किया और उसका सार निकाला कि वह स्थान जहां से ब्रह्मांड का विस्तार शुरु हुआ उस बिंदु को सिंगुलरैटी कहते हैं, जहां पर घनत्व और गुरुत्व दोनों अनंत हैं।

यह ब्रह्मांड की एक छवि है। इसमें असंख्य आकाशगंगाएं टिमटिमा रही हैं। इसे एक्सट्रीम डीप फील्ड के नाम से जाना जाता है (नासा)

मित्रा कहते हैं “हालांकि बिग बैंग यानी महाविस्फोट सामान्य नजर वाले विस्फोट से अलग है। यह किसी एक बिंदु पर नहीं हुआ बल्कि ब्रह्मांड की हर जगह ही एक बिंदु थी और सभी जगह एक साथ विस्फोट उठा था। इसके छोटे कण किसी बाहरी क्षेत्र में छितराए हुए नहीं थे या कि यह किसी कमरे में एक बिंदु पर हुए विस्फोट जैसा नहीं था।”

बिग-बैंग के एक सेकेंड के पहले अंश में ही ब्रह्मांड का विस्तार असाधारण दर से हुआ। आश्चर्य से भर देने वाले बेहद छोटे से पल में ब्रह्मांड परमाणु के नाभिक से शुरू होकर रेत के कण के आकार तक पहुंचा। यह प्रक्रिया कॉस्मिक इनफ्लेशन थी। जब विस्तार मंद हुआ तो वो ताकतें जो इस विस्तार का कारण थीं संभावित तौर पर वे पदार्थ और ऊर्जा में बदलकर ब्रह्रमांड में भर गईं। याद रखिए इनफ्लेशन ही वह कारण है जिससे ब्रह्मांड और सीएमबी सभी दिशाओं में एकसमान हैं। 

शुरुआती अवस्था में ब्रह्मांड बेहद गर्म, सघन था और उप-परमाण्विक कण (सबएटॉमिक पार्टिकल्स) जैसे प्रोटान, न्यूट्रॉन और इलेक्ट्रॉन से बना था। जब ब्रह्मांड ठंडा हुआ यह सारे कण एकसाथ जुड़े और इन्होंने पहले परमाणु का निर्माण किया जिसमें अधिकांश हाइड्रोजन और हीलियम थे। ब्रह्मांड में विशेषतौर पर तारों में अब भी सबसे ज्यादा यही पदार्थ है क्योंकि तारे की चमक का राज हाइड्रोजन और हीलियम ही है। तारे ब्रह्मांड के इसी रॉ मटेरियल का इस्तेमाल करके चमकते हैं।

सितारों का जन्म बिग-बैंग के 40 करोड़ (400 मिलियन) वर्ष बाद हुआ था, वहीं, आकाशगंगाएं एक अरब वर्षों के बाद आईं और सौर प्रणाली 8.7 अरब वर्षों के बाद बनी। ब्रह्मांड की कहानी में मनुष्य हाल ही में आया है मानव का पूरा इतिहास केवल ब्रह्मांडीय काल पर एक छोटी सी बिंदी के रूप में दर्शाया जा सकता है। फिर भी मानवजाति ने पिछले कुछ सौ वर्षों में ब्रह्मांड के बारे में बहुत कुछ ज्ञान इकट्ठा किया है। लेकिन वह सभी ज्ञान ब्रह्मांड के 5 प्रतिशत की प्रकृति के बारे में ही बताते हैं। ब्रह्मांड की शेष प्रकृति पूरी तरह से मानवता के लिए अज्ञात है या फिर अंधेरे में है।

हार्वर्ड विश्वविद्यालय के खगोल विज्ञानी अब्राहम लोएब ने डाउन टू अर्थ को बताया, “सभी पर्यवेक्षक इस बात से सहमत हैं कि ब्रह्मांड का विस्तार तेजी से हो रहा है और इसकी प्रकृति हमें डार्क एनर्जी व डार्क मैटर नामक पदार्थ के कारण समझ में नहीं आती है।” वैज्ञानिकों का अनुमान है कि लगभग 68 प्रतिशत ब्रह्मांड डार्क एनर्जी से बना है। 

विज्ञान के मतभेद 

अलबर्ट आइंस्टाइन का यह मत था कि ब्रह्मांड स्थिर है। यह न ही विस्तारित हो रहा है और न ही सिकुड़ रहा है। वे एक कॉस्मोलॉजिकल कॉन्स्टेंट के साथ आए थे, जिसे वैक्यूम की ऊर्जा के रूप में भी वर्णित किया गया है। 1930 ही वह वर्ष था जब आइंस्टाइन और हबल के बीच पहली मुलाकात हुई थी। वहीं, आइंस्टाइन ने यह स्वीकार किया कि कॉस्मोलाजिकल कॉन्स्टेंट उनकी सबसे बड़ी भूल थी। ब्रह्मांड विस्तार की बात को उन्होंने बाद में स्वीकारा। वहीं, कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि डार्क एनर्जी और कॉस्मोलॉजिकल कॉन्स्टेंट एक ही इकाई के दो अलग-अलग भाव हैं।

आकाशगंगाओं के समूहों की गति और पूरे ब्रह्मांड की संरचना को वृहत पैमाने पर समझाने के लिए डार्क मैटर का गुरुत्वाकर्षण प्रभाव बेहद जरूरी है। जबकि छोटे पैमाने पर यानी पृथ्वी या किसी भी सार्थक तरीके से मनुष्यों की उत्पत्ति और विकास की गति को प्रभावित करने के लिए डार्क मैटर का गुरुत्वाकर्षण प्रभाव बेहद कम है।

अब्राहम लोएब ने कहा कि ब्रह्मांड के विस्तार की दर संबंधी सीएमबी की माप और एडम रीस की माप विसंगति एक नई भौतिकी की ओर इशारा कर रही है। बिग-बैंग के 4 लाख वर्ष बाद पैदा हुई सीएमबी से लेकर आज तक की समय अवधि के बीच में यदि डार्क मैटर और डार्क एनर्जी का कोई अप्रत्याशित व्यवहार है तो इस बारे में हम अभी नहीं जानते हैं।

वहीं दूसरी तरफ आभास मित्रा ब्रह्मांड के विस्तार वाले बिग-बैंग सिद्धांत को नकारते हैं। उनका कहना है कि बिग-बैंग मॉडल की बुनियाद ठीक नहीं है क्योंकि बीते दो दशक से हमें ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है जिससे कहा जा सके कि डार्क एनर्जी नाम की कोई चीज है। वहीं, दूसरा कारण है कि डार्क मैटर को लेकर भी हमारे पास अब तक कोई सबूत नहीं है। तीसरी बात यह है कि हो सकता है यह दोनों न मौजूद हों। कॉस्मिक इन्फलेशन के तहत ब्रह्मांड की एकरूपता में भी कई बड़े टूट मौजूद हैं।

दरअसल ब्रह्मांड की शुरुआत के लिए बिग-बैंग का समर्थन करने वाले वैज्ञानिक इनफ्लेशन (नाभिक से रेत के कण आकार तक का शुरुआती ब्रह्मांड ) को मानते हैं। ऐसे वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि वृहत पैमाने पर ब्रह्मांड को देखा जाए तो उसकी एकरूपता टूटी हुई नहीं है। जहां भी यह एकरुपता टूटी हुई प्रतीत होती है वह नकारने योग्य है। जबकि बिग-बैंग की थ्योरी पर सवाल उठाने वाले वैज्ञानिक इसी पर जोर देते हैं कि यदि ब्रह्मांड की शुरुआत में इनफ्लेशन होता तो उसकी एकरूपता कहीं नहीं टूटती। बिग-बैंग के अस्तित्व पर वैज्ञानिकों के दो धड़ों की बहस इस एक बिंदु पर भी जारी है।

यह ब्लैक होल है जिसके होने का पक्का सबूत बीते वर्ष  10 अप्रैल 2019 को वैज्ञानिकों को मिला है। यह सम्भव है कि ब्लैक होल किसी नए ब्रह्मांड का एक रास्ता हो (नासा)

आभास मित्रा कहते हैं कि कई अध्ययन यह बताते हैं कि वास्तविक ब्रह्मांड बड़े पैमाने पर विसंगति भरा है। यह बिग-बैंग मॉडल की मूल मान्यता के विपरीत है ऐसे में यह अवलोकन किए गए ब्रह्मांड का भी प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है। न ही यह व्यावहारिक विकल्प हो सकता है। यदि ब्रह्मांड का विस्तार तेजी से हो रहा है तो इसका भविष्य क्या है? वैसे यह मानवता के भविष्य के लिए कई निहितार्थों के साथ एक ठंडा, अंधेरा और पृथक स्थान बनने जा रहा है।

कुछ अरब वर्षों में मिल्की-वे आकाशगंगा अपने एक पड़ोसी आकाशगंगा एंड्रोमेडा से टकराएगी। सबसे पहले यह नए तारों का गठन केंद्र या नेबुला पैदा करेगा और इसकी वजह से पृथ्वी के रात के आकाश में बहुत अधिक सितारे होंगे। यदि कोई भी मनुष्य या अन्य बुद्धिमान प्रजातियां उस समय तक जीवित बची रहती हैं। लेकिन समय के साथ सभी नए नेबुला की सक्रियता कम हो जाएगी। परिणामवश मौजूदा तारे खुद-ब-खुद मर जाएंगे क्योंकि उन्हें जीवित रखे रहने वाला ईंधन या कच्चा माल (हाइड्रोजन और हीलियम) खत्म हो जाएगा। यह सब होने से बहुत पहले पृथ्वी मरते हुए सूर्य के जरिए निगल ली जाएगी। यह सूर्य विस्तारित होकर एक लाल दानव तारे में बदल जाएगा। हर तारा जब मरने को होता है तो वह काफी हद तक फैलता है और फिर उसमें सुपरनोवा जैसा विस्फोट होता है। यह भी एक संभावना है कि सूर्य और एक दूसरे तारे के बीच में कोई क्षुद्रग्रह (एस्टरॉइड) अपने पथ से भटककर पृथ्वी से टकरा जाए। इसका मतलब होगा कि पृथ्वी पर जीवन और मानवता खत्म हो जाए। बचने की एक ही संभावना है कि मनुष्य ताकतवर आर्टिफिशियल इंटलिजेंस की बदौलत किसी और सुरक्षित और जीवन वाले सौर ग्रह को खोजकर उसे अपना डेरा और ठिकाना बना ले। यह सभी परिस्थितियां अनुमान भर हैं और भी कई अलग तरह की घटनाएं घटित हो सकती हैं।

भविष्य के बारे में अधिक से अधिक जाना जा सकता है अगर मनुष्य इस सवाल का जवाब दे कि ब्रह्मांड आखिर क्यों मौजूद है और इसका उद्देश्य क्या है? कई प्राचीन सभ्यताओं और आधुनिक धर्मों ने ब्रह्मांड का मकसद बताया है। हमारे पूर्वज अपनी-अपनी समझ से इस सवाल से जूझते रहे हैं। ज्यादातर पुरानी समझ मिथक आदि के मुताबिक ब्रह्मांड निर्माता भगवान हैं इसलिए ब्रह्मांड और मनुष्य के होने का भी एक निश्चित मकसद है। मिसाल के तौर पर केंद्रीय अफ्रीका के प्राचीन समूह बोशंगो की मान्यता थी कि सबसे पहले केवल अंधेरा, पानी और महान देवता बुंबा थे। एक दिन बुंबा के पेट में दर्द हुआ और उन्होंने उल्टी करते हुए सूर्य को जन्म दिया। सूर्य ने कुछ पानी सुखा दिया इससे जमीनें तैयार हुईं और बाद में चंद्रमा, तारे, जानवर भी बुंबा ने उल्टी के जरिए निकाले। सबसे अंत में उसने इंसान को पैदा किया। लेकिन इन मिथकों से विज्ञान का तरीका और दृष्टि बिल्कुल अलग है। ब्रह्मांड की उत्पत्ति क्यों है? यह सवाल सबसे जटिल है और अधिकांश वैज्ञानिकों ने इसे छोड़ दिया है।

जॉन व्हीलर 20वीं सदी के साहसी भौतिकविद हैं और वे आइंस्टाइन व नील बोर के सहयोगी रहे हैं। उन्होंने कुछ रास्ते सुझाए हैं जिससे ब्रह्मांड से जुड़े सवालों की गुत्थी शायद सुलझाई जा सकती है। व्हीलर ब्रह्मांड की क्वांटम दुनिया का निर्माण करने वाले मौलिक कणों की बात करते हैं। वह मानते हैं कि वस्तुपरक विज्ञान और मानव की चेतना के बीच कोई रास्ता निकल सकता है। मनुष्य जितना अपनी सोच फिर पर्यवेक्षण और प्रयोग से ब्रह्मांड को जान पाया है, दरअसल उसने उतना ब्रह्मांड बना लिया है। अब भविष्य में वह अपनी चेतना और विज्ञान के सहारे जितना ब्रह्मांड के बारे में जानेगा वह भविष्य में ज्ञात होने वाला ब्रह्मांड होगा। व्हीलर कहते हैं कि प्रयोग के जरिए बाहर आने वाला परिणाम इस पर निर्भर करता है कि पर्यवेक्षण तंत्र का सेटअप कैसे किया गया है। व्हीलर के दिमाग की यह परिकल्पना है कि आकाशगंगा एक बड़े लेंस हैं जो प्रकाश को भी तिरछा कर देते हैं। वह मानते हैं कि दरअसल आपका पर्यवेक्षण प्रयोग को प्रभावित करता है। बाद में एक वास्तविक प्रयोग के जरिए यह सत्य पाया गया।

2002 में डिस्कवर मैग्जीन में व्हीलर कहते हैं कि हमारा पर्यवेक्षण असल में भौतिक तौर पर सच में बदल जाता है। हम सिर्फ किसी ब्रह्मांडीय अवस्था पर साधारण आस-पास नहीं खड़े हैं, हम इसके निर्माता हैं और रचनाकार भी, हम एक साझेदारी वाले ब्रह्मांड के साथ रह रहे हैं। 

इसलिए मानव चेतना की प्रकृति को सही से जाने बिना यह पूरी तरह असंभव है कि हम ब्रह्मांड के सही रहस्य को भी समझ जाएं। शायद मानव दिमाग की कार्यप्रणाली की समझ यूनिवर्स के 95 फीसदी अंधकार के बारे में हमें कुछ बता पाए।

 

ब्रह्मांड का कैलेंडर 

वैज्ञानिकों ने भविष्य की संभावित खगोलीय घटनाओं का अनुमान लगाया है। इस ब्रह्मांड पर कब क्या घटित हो सकता है : 

36 हजार वर्ष बाद सूरज का नया पड़ोसी

रॉस 248 (एक बौना तारा) पृथ्वी से 3.024 प्रकाश वर्ष की दूरी से गुजरेगा। इस दौरान सूर्य इसका सबसे नजदीकी पड़ोसी होगा

1 लाख वर्ष बाद वीवाई महाश्वान को श्रद्धांजलि

इस समय ब्रह्मांड के सबसे बड़ा तारा वीवाई केनिस मेजोरिस (वीवाई महाश्वान) की मृत्यु होगी। सुपरनोवा से भी ज्यादा ऊर्जा के साथ इसमें विस्फोट होगा

10 लाख वर्ष बाद सूरज का प्रतिस्पर्धी 

लाल महादानव तारे के नाम से पहचाने जाने वाले बीटलगीज में सुपरनोवा की घटना होगी। इस विस्फोट को दिन के समय देखा जा सकेगा

80 लाख वर्ष बाद मंगल ग्रह को मिलेगी अंगूठी 

मंगल ग्रह का चंद्रमा पृथ्वी ग्रह से 7000 किलोमीटर की दूरी पर होगा। मंगल ग्रह के चारों ओर वलय बन जाएगा। शायद हम मंगल के चांद पर डेरा डाल पाएं

1 करोड़ वर्ष बाद पृथ्वी को बड़ा खतरा

पृथ्वी की उल्का पिंड से एक जोरदार टक्कर संभव है। बिल्कुल 6.5 करोड़ वर्ष पहले एक उल्का-पिंड के चलते के-पीजी विलुप्ति जैसी टक्कर संभव है

1 अरब वर्ष बाद पृथ्वी का अंत समीप 

धधकते हुए सूरज की ऊष्मा पृथ्वी को रहने लायक नहीं छोड़ेगी। औसत तापमान 47 डिग्री सेल्सियस होगा। बहुत कम पानी और जिंदगी बच पाएगी

3.5 अरब वर्ष बाद अलविदा पृथ्वी 

पृथ्वी जिसे हम घर कहते हैं वह समाप्त हो चुका होगा। आज जैसा शुक्र ग्रह है यह वैसी ही होगी। समुद्र नहीं होगा। हमारी पृथ्वी प्रभावी तौर पर मर चुकी होगी

4 अरब वर्ष बाद सूरज बन जाएगा लाल तारा

सूरज को हाइड्रोजन की सप्लाई बंद होगी। वह हीलियम का इस्तेमाल शुरु करेगा। सूरज का द्रव्यमान कम होगा। आज का सूरज तब एक लाल तारे की तरह बन जाएगा

4.4 अरब वर्ष बाद सफेद बौना सूरज 

सूरज का प्रारंभिक विस्तार खत्म होते ही वह सिकुड़ना शुरु होगा, अंत में यह सफेद शक्ल वाला पृथ्वी के आकार का होगा

5 अरब वर्ष बाद दो आकाशगंगाओं का मिलन 

हमारी मिल्की-वे आकाशगंगा और एनड्रोमेडा आकाशगंगा टकराएंगी। इससे एक नई आकाशगंगा बनेगी, जिसे मिल्कड्रोमेडा कहेंगे

5.1 अरब वर्ष बाद मिलेकड्रोमेडा में तारो का निर्माण

नई-नवेली सर्पीली आकाशगंगा में तारों के बनने की शुरुआत होगी। एक केंद्रीय प्रकाश स्रोत से निकले विकिरण ऐसा करेंगे। यह गतिविधियां केंद्रीय ब्लैक होल में होंगी

10 अरब वर्ष बाद ब्रह्मांड का खात्मा 

बिग बैंग से शुरु हुआ ब्रह्मांड बिग क्रंच पर जाकर खत्म हो सकता है। यह 10 से 20 अरब वर्ष के बीच हो सकता है

100 अरब वर्ष बाद गायब होगा कन्या आकाशगंगा महासमूह

यदि ब्रह्मांड सिकुड़ता (बिग क्रंच) नहीं है और विस्तार जारी रहता है तो इस समय तक वर्गो सुपरक्लस्टर यानी कन्या आकाशगंगा महासमूह गायब हो जाएगा

450 अरब वर्ष बाद आकाशगंगाओं का मिलन 

डार्क एनर्जी की परेशानी के बावजूद गुरुत्वाकर्षण सर्वोच्च होगा, जिसके चलते कई आकाशगंगाओं का मिलन होगा और एक बड़ी आकाशगंगा बनेगी

1 खरब वर्ष बाद मिट जाएगा ब्रह्मांड का सबूत

ब्रह्मांड के विस्तार के चलते बिग-बैंग का सबसे अहम सबूत मिट जाएगा। वहीं, 100 खरब वर्ष बाद ब्रह्मांड पूरी तरह समाप्त हो सकता है