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मीलों पानी ढोने वाली माएं खो देती हैं अपनी सेहत और बच्चे : रिसर्च

पहली बार पानी ढोने वाली महिलाओं के स्वास्थ्य प्रभाव को लेकर एक अंतरराष्ट्रीय शोध किया गया है। इसके परिणाम चिंताजनक हैं। 

By Vivek Mishra

On: Tuesday 03 September 2019
 
Photo: CSE
Photo: CSE Photo: CSE

आपने अभी तक यह तो सुना या देखा ही होगा कि देश में कई ऐसे इलाके हैं जहां पानी की जरूरत के लिए महिलाओं या लड़कियों को रोजाना दूर-दराज इलाकों से पानी ढोकर लाना पड़ता है। पनिहारन और पनघट की कहानियों में हम इसे सामान्य दैनिक गतिविधि समझ लेते हैं। पानी भरने और ढोने के इस रोजमर्रा के काम में एक भयानक पीड़ा भी छिपी है। पहली बार यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंजीला ने एक शोध प्रकाशित किया है। इस शोध के मुताबिक पानी लाने का काम करने वाली महिलाओं के स्वास्थ्य पर न सिर्फ खराब प्रभाव पड़ता है बल्कि यह काम उनके बच्चों की मृत्यु का कारण भी बन जाता है।

शोध के मुताबिक पानी इकट्ठा करने वाले व्यस्कों के बच्चों की मृत्यु का खतरा तो सबसे ज्यादा होता है वहीं, बच्चे यदि खुद पानी एकत्र करने के काम में लगे हैं तो उनकी डायरिया जनित मौत हो सकती है। इसके अलावा घर का कोई भी सदस्य यदि पानी भरने के काम में लगा है तो यह संभावना बेहद कम हो जाती है कि प्रसूति महिला स्वास्थ्य सुविधाओं की देखभाल में बच्चे को जन्म देगी। कोई महिला या लड़की यदि पानी भरने या एकत्र करने के काम में लगी है तो न सिर्फ उसके प्रसव पूर्व देखभाल में कमी हो जाती है बल्कि उनके पांच वर्ष से छोटे बच्चों को अकेले ही कई घंटे रहना पड़ता है। ऐसे में बच्चों के साथ दुर्घटना या किसी अनहोनी की आशंका कई गुना बढ़ जाती है। 

इस शोध के लिए 41 देशों के 27 लाख लोगों को शामिल किया गया। पहली बार पानी ढोने और स्वच्छ जल की पहुंच, स्वच्छता और माताओं व बच्चों की सेहत के बीच का संबंध जोड़ा गया है। इस संबंध की जांच के लिए यूनिसेफ के संकेतकों और आंकड़ों को भी इस्तेमाल किया गया है। यूईए के स्कूल ऑफ हेल्थ साइंसेज के प्रोफेसर हंटर और डॉक्टर जो गीर ने इन आंकड़ों का अध्ययन किया है।

यूईए नॉर्विच मेडिकल स्कूल के वरिष्ठ लेखक प्रोफेसर पॉल हंटर ने बताया कि लाखों की तादाद में लोगों को प्रतिदिन पानी ढोना पड़ता है। यह काम ज्यादातर बेहद गरीब घर की महिलाएं और लड़कियां करती हैं लेकिन अभी तक पानी ढोने  और उसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में बेहद कम जानकारी थी।

“हम दूर-दराज से पानी भरकर लाने के कारण स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को और अधिक जानना चाहते थे। साथ ही असुरक्षित जल आपूर्ति से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को और स्वच्छता के लिए अपर्याप्त पहुंच आदि का भी महिला और उसके बच्चे पर पड़ने वाले स्वास्थ्य प्रभावों को जांचना चाहते थे। हमने अपने शोध में पाया कि घर तक पानी को ढोना और स्वच्छता का बेहद निम्न स्तर माताओं और बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है।”

शोध से जुड़े डॉक्टर गीर ने कहा कि ऐसी माताएं जिन्हें पानी भरने बाहर जाना पड़ता है उनके पास दुविधा भरा विकल्प होता है कि या तो वे बच्चे को घर पर अकेला छोड़ जाएं या फिर उन्हें असुरक्षित रास्तों पर अपने साथ ले जाएं। ऐसे में पानी के स्रोत पर जाना, कतारों में लगना और पानी भरकर वापस लौटने में काफी समय लगता है। इस बीच बच्चे बिना निगरानी के रहते हैं। बिना निगरानी वाले ऐसे बच्चों में दुर्घटना या अचानक उत्पन्न हुई बीमारी के कारण मृत्यु का जोखिम सबसे ज्यादा होता है। यदि कोई मां बच्चे को अपने साथ लेकर जाना चाहती है तो उसे बेहद दुर्गम रास्तों से गुजरना होता है। जहां किसी हिंसा, ट्रैफिक या अतिशय पर्यावरणीय स्थितियों के कारण मां और बेटे दोनों को खामियाजा उठाना पड़ सकता है।

वहीं, पानी भरने और ढोने  में लगने वाली ऊर्जा व समय के कारण प्रसूति महिलाएं स्वास्थ्य सुविधा केंद्रों तक नहीं पहुंच पाती हैं। इस काम से महिलाओं में पोषण की भी जबरदस्त कमी होती है जिसका दुष्प्रभाव प्रसव और बच्चों को दूध पिलाने जैसी गतिविधियों पर भी पड़ता है। यह बच्चों की मृत्यु के जोखिम को भी बढ़ा देती हैं। कई रिपोर्ट पर गौर भी किया गया है कि पानी ढ़ोने का काम काफी थका देने वाला है।

स्वच्छ पानी तक पहुंच को सुविधाजनक बनाया जाए तो यह महिला और उसके बच्चे की सेहत के लिए काफी लाभप्रद हो सकता है। प्रोफेसर हंटर ने कहा कि इथोपिया में एक अन्य अध्ययन में यह पाया गया था कि घर के पास पानी का एक टैप लगा दिए जाने से महीने में होने वाली बच्चों की मृत्यु में फीसदी कमी आई। स्वच्छ पानी तक आसान तरीके से पहुंच एक बड़ा सुधार और अंतर पैदा कर सकती है।बिना फ्लश टॉयलेट वाले घर में भी बच्चों की मृत्यु का जोखिम 9 से 12 फीसदी ज्यादा होता है। वहीं, ऐसे समुदाय में जन्म लेने वाले बच्चे जहां पर स्वच्छ पानी की उपलब्धता है वहां बच्चों की मृत्यु में खराब स्वच्छता वाले इलाकों के मुकाबले 12 फीसदी कमी भी देखी गई है।

इस शोध को इंटरनेशनल जर्नल ऑफ हाईजीन एंड एनवॉयरमेंटल हेल्थ में "द एसोसिएशन ऑफ वाटर कैरेज, वाटर सप्लाई एंड सैनिटेशन यूसेज विद मैटर्नल एंड चाइल्ड हेल्थ – ए कंबाइंड एनालिसिसि ऑफ 49 मल्टीपल इंडीकेटर कल्स्टर सर्वेज फ्रॉम 41 कंट्रीज" नाम से छापा गया है।