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मनरेगा जरूरी या मजबूरी-4: 250 करोड़ मानव दिवस रोजगार हो रहा है पैदा

आरोप लगाया जाता है कि मनरेगा के तहत पैसा व्यर्थ किया जाता है, लेकिन हकीकत यह नहीं है

By Sachin Kumar Jain

On: Monday 06 July 2020
 
MGNREGA Work
राजनांदगांव में मनरेगा के तहत किया जा रहा कार्य। फोटो: मनीष चंद्र मिश्र राजनांदगांव में मनरेगा के तहत किया जा रहा कार्य। फोटो: मनीष चंद्र मिश्र

2005 में शुरू हुई महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) योजना एक बार फिर चर्चा में है। लगभग हर राज्य में मनरेगा के प्रति ग्रामीणों के साथ-साथ सरकारों का रूझान बढ़ा है। लेकिन क्या यह साबित करता है कि मनरेगा ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी है या अभी इसमें काफी खामियां हैं। डाउन टू अर्थ ने इसकी व्यापक पड़ताल की है, जिसे एक सीरीज के तौर पर प्रकाशित किया जा रहा है। पहली कड़ी में आपने पढ़ा, 85 फीसदी बढ़ गई काम की मांग । दूसरी कड़ी में आपने पढ़ा, योजना में विसंगतियां भी कम नहीं । तीसरी कड़ी में आपने पढ़ा, - 100 दिन के रोजगार का सच । पढ़ें, चौथी कड़ी-

साल भर के बजट राशि से एक साल में मजदूर वनीकरण के 40 हजार काम करते हैं। इन कामों से लगभग 40 से 50 करोड़ पेड़ लगाए और संरक्षित किए जाते हैं। इससे विकास के नाम पर छील दी गयी धरती को वस्त्र मिलते हैं। इससे मॉनसून व्यवस्थित होता और पृथ्वी का तापमान भी थोड़ा नियंत्रण में आता है। ये पेड़ यात्रियों को छांव भी देते हैं और पंछियों को आशियाना भी। और ये काम करते हैं मनरेगा के मजदूर।

भारत सरकार के इस आवंटन से वर्ष 2020-21 में साढ़े पांच करोड़ मजदूरों ने पानी के भण्डारण और संग्रहण के 1.27 लाख स्रोत बनाए। वे छोटे-छोटे तालाब बनाते हैं, खेतों की मेड़ें बनाते हैं। जिन गांवों में पानी का संकट है, वहां पुराने कुएं और बावड़ियां साफ़ करते, उनकी मरम्मत करते हैं। इससे धरती के पेट में पानी जाता है।

भारत ने पिछले 30 सालों में पानी के 40 लाख स्रोतों को खत्म किया है। तालाब सुखाकर उन पर इमारतें बना ली हैं। बड़ी-बड़ी सड़कें बन गयी हैं, उन पर सरपट महंगी गाड़ियां दौड़ रही हैं, लेकिन हमें यह आभास नहीं है कि गाड़ियां सड़कों पर नहीं, खेतों, जंगल और तालाबों की कब्र पर दौड़ती हैं।

चूंकि यह अहसास खत्म हो गया है, इसलिए भारत के अमीरों और मध्यमवर्गीय परिवारों को ऐसा महसूस होता है कि सरकार उनसे टैक्स लेकर इन मजदूरों को मुफ्त में लुटाये दे रही है, किन्तु सच तो यह है कि अमीरों और मध्यमवर्गीय समाज के अपराधों से खड़े हो रहे संकट को दूर धकेलने की काम करते हैं, मनरेगा के मजदूर।

7.8 करोड़ लोग 8 घंटे शारीरिक श्रम करते हैं, तब जाकर मजदूर को कर्नाटक में 270 रुपये, बिहार में 194 रुपये, उत्तर प्रदेश में 201 रुपये राजस्थान में 167 रुपये, पश्चिम बंगाल में 194 रुपये छत्तीसगढ़ में 168 रुपये और मध्यप्रदेश में 180 रुपये का ही पारिश्रमिक मिल रहा है। 

मनरेगा इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि इसमें विकलांगता से प्रभावित लोगों को भी कोई न कोई काम देने का प्रावधान किया गया है। संभवतः मनरेगा भारत में विकलांगता से प्रभावित सबसे अधिक लोगों को रोजगार देने वाला कार्यक्रम भी है। इस योजना में पिछले चार सालों में हर साल औसतन 4.67 लाख विकलांग लोगों को भी रोजगार मिला।

औसतन 250 करोड़ मानव दिवस का रोजगार मनरेगा के तहत सृजित किया गया। इसमें से हर साल 50 करोड़ दिनों का रोजगार आदिवासी समुदाय के और 42 करोड़ दिवस रोजगार अनुसूचित जाति के समुदाय से जुड़े लोगों को मिला। महिलाओं के जीवन को भी यही कार्यक्रम व्यवस्थागत हक उपलब्ध करवाता है। महिलाओं को लगभग 56 प्रतिशत अवसर मिलता है। ऐसे कार्यक्रम को बंद किए जाने या कमजोर किए जाने के षडयंत्र का समर्थन करना वाजिब है क्या? 

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