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मनरेगा जरूरी या मजबूरी-11: न बाजार को पसंद है न सरकार को!

कोरोना आपदा में दो कल्याणकारी योजनाओं की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है। एक है महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), 2005 और दूसरी राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013

On: Thursday 16 July 2020
 
MGNREGA
छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में सोशल डिस्टेंसिंग के साथ मनरेगा का काम चल रहा है। फोटो: मनीष चंद्र मिश्र छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में सोशल डिस्टेंसिंग के साथ मनरेगा का काम चल रहा है। फोटो: मनीष चंद्र मिश्र

2005 में शुरू हुई महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) योजना एक बार फिर चर्चा में है। लगभग हर राज्य में मनरेगा के प्रति ग्रामीणों के साथ-साथ सरकारों का रूझान बढ़ा है। लेकिन क्या यह साबित करता है कि मनरेगा ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी है या अभी इसमें काफी खामियां हैं। डाउन टू अर्थ ने इसकी व्यापक पड़ताल की है, जिसे एक सीरीज के तौर पर प्रकाशित किया जा रहा है। पहली कड़ी में आपने पढ़ा, 85 फीसदी बढ़ गई काम की मांग । दूसरी कड़ी में आपने पढ़ा, योजना में विसंगतियां भी कम नहीं । तीसरी कड़ी में आपने पढ़ा, - 100 दिन के रोजगार का सच । चौथी कड़ी में आपने पढ़ा, 250 करोड़ मानव दिवस रोजगार हो रहा है पैदा, जबकि अगली कड़ी में आपने पढ़ा, 3.50 लाख करोड़ रुपए की आवश्यकता पड़ेगी । इसके बाद आपने शंकर सिंह और निखिल डे का लेख पढ़ा। इसके बाद आपने अमित बसोले व रक्षिता स्वामी का लेख पढ़ा। अगली कड़ी में आपने करुणा वाकती अकेला का लेख पढ़ा। आपने आमोद खन्ना का आलेख  के बाद आपने उरमुल के निदेशक अरविंद ओझा का आलेख पढ़ा। आज पढ़ें,कामयानी स्वामी और आशीष रंजन का लेख -

बिहार की नेपाल सीमा के एक सुदूर गाँव में पासवान दम्पत्ति राधा देवी और दीपनारायण को इस साल मनरेगा में पिछले दो महीने में 21 दिन काम मिल चुका है और मजदूरी भी मिल गयी है। यह अपने में एक अनोखी बात है, क्योंकि बिहार में 2019-20 में एक जॉब कार्ड धारी परिवार को पूरे साल में औसत 42 दिन ही काम मिला था और आमूमन भुगतान में देरी होती है। 

कोरोना आपदा में दो कल्याणकारी योजनाओं की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है। एक है महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), 2005 और दूसरी राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 । हालांकि 2014 चुनाव आते-आते और इससे पहले भी इन दोनों कानूनों पर भारी हमला हो चुका था।

देश के पूंजीपति, अर्थशास्त्रियों का एक मजबूत खेमा, कांग्रेस का एक खेमा और भारतीय जनता पार्टी लगातार इस बात पर जोर दे रहे थे कि इन योजनाओं में बहुत भ्रष्टाचार है जिससे पैसे की बर्बादी होती है। उनके अनुसार इस तरह की वेलफेयर स्कीम नहीं चलानी चाहिए और अगर लोगों तक वेलफेयर पहुंचाना है तो उनके खाते में सीधा पैसा दिया जाए ना कि काम या अनाज। नीति निर्धारक मनरेगा की तरफ उदासीन हो चुके थे।

2014 की जीत के बाद, बजट सत्र के दौरान, 27 फरवरी 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसद में भाषण मनरेगा को ध्यान से देखने समझने वाले लोगों को हमेशा याद रहेगा। प्रधानमंत्री ने लोकसभा में कांग्रेस पर हमला करते हुए कहा था, “मेरी राजनीतिक सूझबूझ कहती है कि मनरेगा कभी बंद मत करो, मैं ऐसे गलती नहीं कर सकता हूं, क्योंकि मनरेगा आपकी (कांग्रेस की) विफलताओं का जीता जागता स्मारक है। आजादी के साठ साल बाद आपको लोगों को गड्ढे खोदने के लिए भेजना पड़ा, ये आपके विफलताओं का स्मारक है और मैं गाजे बाजे के साथ इस स्मारक का ढोल पीटता रहूंगा”।

ऐसे में यह हैरत की बात लगती है कि वित्त मंत्री के दोनों कोरोना राहत पैकेज में इन योजनाओं पर खर्च कुल “फिस्कल खर्च” का एक अच्छा खासा हिस्सा है। मनरेगा में 40 हजार करोड़ का अतिरिक्त आवंटन किया गया है। फलस्वरूप मनरेगा में इस साल का बजट 61,500 करोड़ से बढ़कर एक लाख एक हजार पांच सौ करोड़ रुपए हो गया है। पिछले साल यानी 2019-20 में करीब 68 हजार करोड़ रुपए का व्यय हुआ था।

अब सवाल यह पूछा जा रहा है कि क्या प्रवासी मजदूरों की सभी समस्याओं का हल मनरेगा है? किस प्रकार से मनरेगा ग्रामीण मजदूरों के लिए मददगार साबित होगा। यह सवाल लाजिमी है और पूछा भी जाना चाहिए। इसका जवाब ढूंढ़ने के लिए किस सन्दर्भ में मनरेगा कानून बना और उसकी स्थिति जानना जरूरी है।

नव उदारीकरण के दौर में जॉबलेस ग्रोथ से पीड़ित ग्रामीण अर्थव्यवस्था जब संकट से गुजर रही थी तो 2005 में यूपीए-1 के कार्यकाल में मनरेगा का कानून लाया गया, ताकि गांव में लोगों को काम मिल सके। चूंकि इसमें काम करने पर पैसा है, यह “डोल” नहीं वरण एक गरिमापूर्ण काम है। इस योजना में लाभुक स्वयं “फिल्टर” होकर आते हैं। इसलिए इसकी पहुंच सबसे गरीब तबके तक है। 2008 से यह कानून पूरे देश में लागू है।

मनरेगा का सफ़र शुरुआत से ही कठिन रहा है। मनरेगा मांग आधारित कानून है। यह 100 दिनों के काम का हक देता है। पर इसे मांग आधारित कानून कभी बनने नहीं दिया गया। इसका मुख्य कारण मजदूर वर्ग को काम का हक़ ना देने की सरकार की मंशा रही है । कुछ मिल जाये पर बहुत कुछ ना मिले, मजदूर जब चाहे काम ले ले यह ना पूंजीपतियों को भाता है, ना बाजार को भाता है, ना किसान को और ना सरकार को। इसलिए इसमें पैसे की हमेशा से किल्लत रही है।

मनरेगा बजट और सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी) का अनुपात 2009 में अधिकतम 0.6 था और 2019-20 में घटकर 0.35 रह गया। फण्ड की कमी, मजदूरी के भुगतान में देरी, मजदूरी दर का न्यूनतम मजदूरी दर से भी कम होना और काम की उपलब्धता की कमी के कारण मनरेगा पलायन को रोकने में सफल नहीं रहा।

बिहार जैसा राज्य जहां से सबसे अधिक मजदूर पलायन करते हैं और मजदूरों की संख्या अधिक है, वहां मनरेगा का बजट राजस्थान और तेलंगाना जैसे राज्यों से कम रहा है। बिहार में 1.8 करोड़ परिवारों के पास जॉब कार्ड है पर 2019-20 में सिर्फ 34 लाख परिवार ने काम किया और उन्हें औसतन 42 दिनों का काम मिला।

दरअसल सरकार ने इसे जानबूझ कर सीमित कर रखा है, इस योजना को फलने फूलने नहीं दिया गया। इसके पीछे नवउदारवादी मानसिकता रही है जो गरीबों के लिए कल्याणकारी योजनाओं पर भरोसा नहीं रखती। सरकार ने लोगों के काम के हक को कभी गंभीरता से नहीं लिया, बल्कि यह मानते रहे कि बाजार ही लोगों को काम मुहैया कराएगा।

कोरोना काल में जब बाजार ने करोड़ों मजदूरों को बिना मजदूरी के घर बैठने पर मजबूर किया है और सरकारें बाध्य हुई हैं कि उन्हें राहत पहुंचाई जाए तो सरकार के पास मनरेगा, खाद्य सुरक्षा योजनाओं के अलावा कोई और प्रभावशाली स्कीम नहीं है। अचानक कोई ऐसी स्कीम लागू भी नहीं की जा सकती जो लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुंच जाए। कैश ट्रान्सफर पर विश्वास करने वाले लोग भी मनरेगा की ओर देख रहे हैं । जाहिर है कि मनरेगा में अभी भी दम बचा है कि वह मुसीबत में काम आये । 

देश में करीब 15 करोड़ परिवार मनरेगा स्कीम में रजिस्टर्ड हैं । वर्ष 19-20 में कुल 5.5 करोड़ परिवारों ने काम किया था। कुल 265 करोड़ मानव दिवस सृजित हुए। अगर प्रति जॉब कार्ड देखेंगे तो औसत हर जॉब कार्ड धरी को 18.5 दिन काम मिला । और अगर उन्हीं लोगों का हिसाब लगाएंगे, जिन्हें एक दिन का भी काम मिला तो औसतन 48 दिनों का काम मिला।

इस योजना में आधे से भी ज्यादा काम महिला कामगार को मिला है। इस वर्ष (20-21) बीते 2.5 महीने में करीब 3.8 करोड़ परिवारों ने इस योजना में काम किया है। जाहिर है कि इस साल ज्यादा काम खोला गया है। बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड में मजदूरों की संख्या अधिक है और इन राज्यों से पलायन भी अधिक संख्या में होता है। इन राज्यों के आंकड़ों को देखते हैं ।

मई-2020 में उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे राज्य में लगभग 47 लाख, 18 लाख और 6 लाख परिवारों ने काम किया । 2019 के मई महीने में यही आंकड़ा लगभग 11 लाख, 10 लाख और 5 लाख था । जून-2020 में यह आंकड़ा और बढ़ गया और यह 55 लाख, 21 लाख और 9 लाख हो गया।

यानी अगर 2019 से तुलना की जाये तो मई महीने में उत्तर प्रदेश में 450%, बिहार में 80% और झारखंड में 20 % अधिक परिवारों ने काम किया । हालांकि अगर काम के दिन का हिसाब लगायेंगे तो इस साल (1 अप्रैल से आज तक) बिहार में काम करने वालों को औसतन 21 दिन उत्तर प्रदेश में 17 दिन और झारखंड में 20 दिन का ही काम मिल पाया है । देश के स्तर पर औसत 21 दिन का है । इन आंकड़ों के आधार पर निम्न बिंदु विचारणीय हैं :-


1. अगर 15 करोड़ रजिस्टर्ड लोगों को 100 दिनों का काम देना है तो 3 लाख करोड़ रु के लेबर बजट की आवश्यकता होगी । वर्तमान का एक लाख करोड़ रु का बजट लोगों को 100 दिनों का काम उपलब्ध कराने के लिए बहुत कम है।
2. करोड़ों परिवारों को इस दौरान काम की ज़रुरत पड़ी है और पिछले तीन महीने में काम करने वाले परिवारों ने करीब 4000 रु कमाया है । यह उनके भूख से बचने में कारगर साबित हुआ होगा ।
3. काम पाने वाले परिवारों की संख्या में मई-जून में पिछले साल के मुताबिक अच्छी खासी बढ़ोतरी हुई है। यह बढ़ोतरी सिर्फ प्रवासी मजदूरों के चलते नहीं है । यह बढ़ोतरी गाँव में मौजूद मजदूरों से हुई है । क्यूंकि ज्यादातर प्रवासी मजदूर मई में घर ही पहुँच पाए थे । उसके बाद उन्हें 21 दिनों के क्वारंटाइन में ही रहना था ।
4. पिछले तीन महीने में औसतन 21 दिनों का काम ही मिल पाया है, जबकि करोड़ों मजदूरों के पास कोई और काम नहीं है । मनरेगा का काम सबसे अधिक जून महीने में होता है । अगले कुछ महीनों में मानसून के आगमन के साथ काम की उपलब्धता कम होगी । इस दौरान मनरेगा को कारगर बनाने के लिए एक नई स्फूर्ति के साथ रजनात्मक ढंग से काम में लेना होगा I

निस्संदेह, कोरोना के समय मनरेगा एक कारगर स्कीम साबित हुआ है। अगर पिछले 15 सालों में मनरेगा को उपेक्षा की बजाय लगातार सुदृढ़ करने का काम चलता तो 15 करोड़ रजिस्टर्ड कार्ड धारियों को 100 दिनों का काम मिल सकता था। पर यह भी जाहिर है कि मनरेगा की सीमा क्या है। वैश्वीकरण के इस दौर में मेहनतकश के अधिकारों को सुरक्षित करने हेतु जीडीपी का एक बड़ा प्रतिशत ग्रामीण संरचना और अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में लगाना होगा। फिलहाल राधा देवी और दीपनारायण पासवान जैसे करोड़ों ग्रामीण मजदूरों के लिए जिन्हें काम मिल सका है मनरेगा भूख से बचने का एक सशक्त साधन है।

कामयानी स्वामी और आशीष रंजन मजदूर संघ जन जागरण शक्ति संगठन से जुड़े हैं और अररिया जिला में रहते हैं